भारत का गौरवशाली प्राचीन वंश : राठौड़

भारत का गौरवशाली प्राचीन वंश : राठौड़

राठौड़ों के गोत्रादि
1. गोत्र-
(1) गौतम (राजस्थान में बीकानेर के अलावा)
(2) कश्यप (बीकानेर वालों का तथा उत्तर प्रदेश व उससे आगे)
(3) अत्रि-दक्षिण
2. प्रवर तीन-मोनक, अंगिरा और समाद
3. गुरु-शुक्राचार्य
4. कुलदेवी पंखनी, विंध्यवासिनी, राटेश्वरी, नागणेची (सब एक ही हैं)
5. वेद- यजुर्वेद (राज.) सामवेद (उत्तर प्रदेश आदि में)
6. शाखा-माध्यान्दिनी (राज.), कौथुमी (उत्तर प्रदेश आदि में)
7. सूत्र-गोभिल गृहल
৪. पक्षी-श्येन (बाज)
9. वृक्ष-नीम, बड़ (उत्तर प्रदेश आदि में)
10. पुरोहित-सिवड़ (सोड़)
11. शाखा-दानेसुरा (राजस्थान में)
12. बारहठ-रोहड़िया
13. तलवार-रणथली
14 गऊ-कपिला
15. नगारा-रणजीत
16. निशान-पचरंग
17. ढोल-भंवर
18. ढोली-देधड़ो
  

राठौड़ों की उत्पत्ति

रठिक, रटिक, , रिष्टिक, राष्ट्रिक आदि शब्द राष्ट्रकूटों के लिए ही प्रयोग में आए हैं, जिसका आगे चलकर राठवर, राठउड़ और राठौड़ हो गया। यह किसी न किसी रूप में लगभग सभी विद्वान मानते हैं। डा. हटलज मानते हैं कि राठेक अथवा रटिक ही पंजाब के आरट्ट थे। यह
उन्होंने अपनी पुस्तक ‘कार्पस इन्सक्रिप्सन इण्डिकेरम’ भाग- 1, पृ. 56 पर लिखा है । रेउ भी इसे इसी रूप में स्वीकार करते हैं तथा उन्होंने ‘राष्ट्रकूटों के इतिहास’ में इनका बलूचिस्तान में सिकन्दर से मुकाबला होना लिखा है। अगर इसे माना जाता है तो यह सिद्ध होता है कि मौर्यकाल से पूर्व इनके उत्तर-पश्चिमी भारत में स्वतंत्र राज्य थे। अशोक के गिरनार के लेख में रिष्टिक शब्द दिया है। शाहबाज गढ़ी ने ‘हूल्स कार्पस इन्सक्रिप्सन
इण्डिकेरम भाग-1, पृष्ठ-8 में राष्ट्रिक तथा मानेसर के लेख में राष्ट्रका दिया है। अलूटेकर इन सब रूपों को समान ही मानते हैं तथा इनकी उत्पत्ति संस्कृत शब्द ‘राष्ट्रिक’ से होना मानते है। ये अशोक के समय मौर्यों के अधीन हो चुके थे, जैसा कि अशोक के लेखों से
सिद्ध होता है। अलूटेकर मानते हैं कि ये अशोक के समय में उत्तर- पश्चिमी भाग में छोटे- छोटे दायरों में सामंतों के रूप में राज्य कर रहे थे। ऐसी सम्भावना है कि पंजाब से चलकर ये राजस्थान में आए और वर्तमान में अलवर जिले के नीमराना आदि क्षेत्र, जो राठ क्षेत्र कहा जाता है, वहाँ राज्य कायम किया। इस क्षेत्र की गाएँ भी राठी कहलाती हैं।

काठियावाड़ के राठीज, राष्ट्रिका व राठाज ने, जो पंजाब से आए थे, दक्षिण में जाकर एक बड़ा राज्य स्थापित किया। इनका यह राज्य काठियावाड़ से बड़ा राज्य होने के कारण इसका नाम महाराष्ट्र पड़ा। डा. भडारकर ने (बो.गे.- Vo.I Part I P. 143)
भी यही माना है। दक्षिण के राष्ट्रकूट शासक के शक सं. 836 (वि.971, ई.914) के नवसरी से मिले ताम्रपत्र में उसके प्रपतिमाह अमोधवर्ष का ‘रट्टकुल लक्ष्मी’ का उदय करने वाला लिखा है। देवली के ताम्रपत्र में लिखा है कि इस वंश का मूल पुरूष ‘रट्ट था। उसका पुत्र राष्ट्रकूट’ हुआ। डा. फतहसिंह ‘राठौड़ वंश री विगत’ में मानते हैं कि रट्ट, राठ, रास्टेक, लट्टू, लाट आदि शब्द संस्कृत राष्ट्र के रूपान्तर हैं। दक्षिण के कृष्ण तृतीय के देवली के
दानपत्र में दिया है कि इस वंश की उत्त्पत्ति ‘तुंग’ से हुई, जिसका वंशज रट्ट था। ईसा की प्रारम्भिक सदियों में राठि आदि कर्नाटक के कुछ हिस्सों में भी थे। राष्ट्रकूटों में सबसे प्राचीन लेख (‘E.I. 8 P.163’) अभिमन्यु का मिलता है, जिसमें उसके पड़दादा का नाम मानक दिया है और उसे राष्ट्रकूटों में प्रमुख लिखा है। इस लेख का संवत् नहीं है, परन्तु लिपि के आधार पर अलूटेकर इसे सातवीं सदी का मानते हैं तथा डा. भगवानलाल इन्द्रजी इसे पाँचवीं सदी का ठहराते हैं।

राष्ट्रिक आदि नामों के तथा अभिमन्यु व कुछ अन्य लेखों में इसी वंश राष्ट्रिक, राष्ट्रकूट आदि का ही वर्णन किया है, परन्तु इनकी उत्पत्ति का किसी में भी उल्लेख नहीं है।
दक्षिण के राष्ट्रकूट गोविन्द तृतीय के श.सं. 730 जिसका विक्रम 865 (ई.808) होता है, के दानपात्र में लिखा है-
यस्मिन्सर्वगुणा श्रये क्षितिपतौ
श्री राष्ट्रकूटान्वयो- जाते यादव वंश जन्म
धुरियावासी दलध्यः परैः।।  इसका रेउ ने अर्थ किया है कि जिस प्रकार श्रीकृष्ण के उत्पन्न होने पर यदुवंश शत्रुओं से अजय हो गया, उसी प्रकार इस गुणी राजा के उत्पन्न होने पर राष्ट्रकूट वंश भीनशत्रुओं से अजय हो गया। अलुटेकर भी इसका ऐसा ही अर्थ लेते हैं। दक्षिण के कलचुरी राजा विज्जल के वि.सं. 1218 (ई.1161) के भानगोलीनके लेख में राठौड़ों को दैत्यवंशी लिखा है। बुगलाना के नारायणशाह के कवि रूद्र ने वि. 1653(ई.1596) में ‘राठौड़ वंश’ महाकाव्य में लिखा है कि कन्नौज के सूर्यवंशी राजा नारायण को लातनादेवी ने पुत्र दिया, जिसका नाम ‘राष्टड़’ रखा। रम्भा मंजरि नाटक में नयनचन्द्र सूरी ने जयचन्द को इक्ष्वाकु वश का तिलक लिखा है (प्रबन्ध चिन्तामणि केवलराम शास्त्री द्वारा सम्पादित, पृष्ठ-186) ‘राजस्थान रत्नाकर’ के लेखक ने इन्हें हिरण्यकश्यप का वंशज लिखा है ।


     राठौड़ अपने को सूर्यवंशी मानते हैं तथा राम के पुत्र कुश की शाखा में बतलाते प्रयाग के पंडे की बही में इन्हें भारत के पुत्र पुष्कल के वंश के सूर्यवंशी लिखा
गजगुण रूपक बध जो जोधपुर के राजा गजसिंह के समय में लिखा गया था, उसमें कवि ने राठौड़ों को ‘रघुवंशी’ लिखा है।
    
     महाराजा अभयसिंहजी जोधपुर के समय में कवि करणीदान ने वृहद् इतिहास ग्रन्थ ‘सूरजप्रकास’ लिखा था: उसमें राठौड़ों का सूयवंश में राम के पुत्र की औलाद लिखा ‘कल्पसूत्र’ की एक प्रति मोहनलाल ज्ञान भण्डार सूर्यपुर में है उसकी प्रशस्ति वि. 1546 (ई.1489) की है। उसमें दिया है कि ‘क्षत्रिय वंश के राष्ट्रकूट जयचन्द के
वंश में आसथान ने राज्य स्थापित किया’। दयालदास ने राठौड़ों को सूर्यवंशी लिखा है। डॉ. बर्नेल दक्षिण की रेडी जाति को राष्ट्रकूटों की शाखा मानता है। डॉ. डी.आर. भंडारकर राष्ट्रकूटों को महाराष्ट्र निवासी मानता है। सी. वी.वैद्य ने राष्ट्रकूटों को दक्षिणी आर्य माना है। डा. अल्टेकर इन्हें कनाडी मानता है, वह इसलिएनकि राष्ट्रकूटों के यहाँ कनाडी साहित्य को बड़ा प्रोत्साहन मिला था। वह इनका दक्षिण से उत्तर में जाना मानता है।

   फ्लीट इन्हें मध्य प्रदेश के मानता है तथा इनके उत्तर से दक्षिण में जाने का अनुमान करता है। इससे इनका आर्य होना सिद्ध होता है। वह राष्ट्रकूटों से राठौड़ों का
निकास मानता है। रामकरण आसोपा ने पंजाब के राष्ट्रिकों को जो उस सदी (ईसा पूर्व) में थे, उन्हें राम के भाई भरत के पुत्र पुष्कल की औलाद माना है। इस प्रकार वे इन्हें सूर्यवंशी मानतेनमालानी प्रान्त के नगर स्थान के रावल जगमाल के वि. 1686 (ई.1629) के लेख में सींहा को सूरजवंशी कन्नौजिया राठौड़ लिखा है (Indian Antiguary July, 1911 P. 181-183)

निष्कर्ष


    ऊपर शिलालेखों तथा अलग-अलग विद्वानों के जो विचार हैं, वे प्रस्तुत किए हैं। इनका अध्ययन करने व देखने के बाद जो निष्कर्ष निकलता है, वह इस प्रकार है-
1. रट्ट, राठिक आदि तथा राष्ट्रकूट और राठौड़ सब एक ही हैं, ऐसा सभी
विद्वानों का मत है।
2. अशोक के लेखों में इनका वर्णन आने से यह सिद्ध होता है कि उस समय ये
पंजाब में थे।
3. जिन विद्वानों ने इन्हें दक्षिण के दानपत्रों के आधार पर यादव माना है। उनमदानपत्रों में कहीं भी चन्द्रवंशी नहीं लिखा है, यह विचारणीय है। सात्यकि को भी यादव
नहीं लिखा है। उसे यादव आजकल के विद्वानों ने ही मान लिया है। हो सकता है।।सात्यकि राष्ट्रकटों का ही कोई पूर्वज हो, जैसे अभिमन्यु का भी शिलालेख मिला है।
दूसरा प्रश्न यह है कि अगर ये यादव शाखा के होते तो फिर इनकी यादवों व उनकी शाखा भाटियों में शादी-विवाह क्यों नहीं होते ? इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि।चन्द्रवश की यादव शाखा से राष्ट्रकूट नहीं निकले थे।
4. मान्यताओं, शिलालेखों आदि को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि अयोध्या के राम के भाई भरत के वंशजों में राष्ट्रकूट या राठौड हो सकते हैं। भरत को पंजाब वनउसके पश्चिम का राज्य मिला था। उसी के वंशज राष्ट्रि आदि कहलाए। रामकरण आसोपा
भी यही मानते हैं। इस प्रकार इनका सूर्यवंशी क्षत्रिय होना ही सिद्ध होता है तथा प्रारम्भममें पंजाब से राजस्थान होकर गुजरात में आना सिद्ध होता है।

राठौड़ों का दक्षिण साम्राज्य

    ऐतिहासकि दृष्टि से भारत (उत्तर भारत और दक्षिण भारत) दो भागों में विस्तृत रहा है। अभी तक प्राप्त विद्वानों के निष्कर्षों, शिलालेखों आदि के आधार पर यह प्रामाणिकन रूप से कहा जा सकता है कि विक्रम की छठी शताब्दी में दक्षिण में राष्ट्रकूटों का राज्य था। गुजरात के दक्षिणी भाग लाट से राष्ट्रकूटों की एक शाखा ने दक्षिण की ओर जाकरनवर्तमान महाराष्ट्र में अपना राज्य स्थापित कियान महाराष्ट्र इनका राज्य दक्षिण के बड़े शासकों के अधीन था। वहाँ राष्ट्रकूटनशासकों के नाम अभिमन्यु, कर्क आदि मिलते हैं। ई. 400 के करीब राष्ट्रकूटों ने चालुक्यों को परास्त कर अपना राज्य कायम किया, जिनमें दो शासकों के नाम कृष्ण और इन्द्र मिलते हैं। इन्द्र के वंश में दन्तिदुर्ग राष्ट्रकूट हुआ, जिसकी जागीर चालुक्य साम्राज्य केनउत्तरी भाग में थी। वह बड़ा योग्य सेनापति तथा सफल कूटनीतिज्ञ था। दन्तिदुर्ग ने अपनी शक्ति का इस चातुर्य से विस्तार किया कि वह चालुक्य सम्राटों के संघर्ष में न आए। पहले इसने अपने राज्य का मालवा और लाट में विस्तार किया, ये दोनों ही राज्य चालुक्य साम्राज्य में नहीं थे। इसके साथ ही वह चालुक्य सम्राटों के कांची के पल्लवों तथा अरबों के विरुद्ध जो सैन्य अभियान चल रहे थे, उसमें भी भाग लेता रहा।
इस राजनीतिक खेल चतुरता के बीच ही योग्य चालुक्य सम्राट विक्रमादित्य की ई. 747 में मृत्यु हो गई। विक्रमादित्य के पुत्र कीर्तिवर्मन द्वितीय ने सम्राट बनने पर राष्ट्रकूट दन्तिदुर्ग की शक्ति को कुचलना चाहा, जिसमें वह असफल रहा तथा राष्ट्रकूटों की विजय हुई। दन्तिदुर्ग का युवावस्था में ही ई. 756 में नि:सन्तान निधन हो गया, तब इसका चाचा कृष्णराज प्रथम राष्ट्रकूट राज्य का शासक हुआ। कृष्णराज प्रथम ने कर्नाटक में शेष बचे चालुक्य राज्य को भी समाप्त कर दिया। कृष्णराज अपनी युद्ध विजयों से भी अधिक ऐलौरा’ के मन्दिर निर्माण के लिए प्रसिद्ध है। दक्षिण हैदराबाद की ऐलापुर (ऐलौरा) की प्रसिद्ध गुफाओं में पर्वत काटकर कैलाश भवन नामक शिव मन्दिर कृष्णराज प्रथम ने बनवाया था। यह मन्दिर आज भी अपनी कारीगरी के लिए भारत भर में प्रसिद्ध है। यहीं इसने अपने नाम पर कन्नेश्वर नामक एक ‘देवकुल’ भी बनवाया था, जिसमें अनेक विद्वान रहा करते थे इसके अतिरिक्त इसने 18 शिव मन्दिर और भी बनवाए थे। इससे सिद्ध होता है कि कृष्णराज परम शैव था। कृष्णराज प्रथम के बाद उसका पुत्र गोविन्दराज द्वितीय राज्य का उत्तराधिकारी हुआ। वि.सं. 827 (ई. 770) के ताम्रपत्र से प्रकट होता है कि इसने वेंगि (गोदावरी 191
     
        कृष्णा नदियों के बीच के पूर्व समुद्र तट के देश) को जीता था। गोविन्दराज द्वितीय के बाद कृष्णराज प्रथम के पुत्र और गोविन्दराज द्वितीय के भाई ध्रुवराज ने अपने भाई को गद्दी से हटाकर स्वंय अधिकार कर लिया। ध्रुवराज बड़ा प्रसिद्ध शासक हुआ, जिसने दक्षिण के समस्त राज्यों पर विजय हासिल की। इसने उत्तर भारत पर भी हमला किया । उसके बाद उसका छोटा पुत्र गोविन्द तृतीय राष्ट्रकूट राज्य का ध्रुवराज शासक हुआ। यह भी अपने पिता की तरह बड़ा निपुण शासक और सुदक्ष सेनानायक था। इसने दक्षिण भारत को पूर्णरूप से अपने नियन्त्रण में कर लेने के पश्चात् अपने पिता की तरह उत्तरी भारत पर सैन्य अभियान प्रारम्भ किया। विन्ध्याचल को पार कर जब यह कन्नौज की ओर बढ़ा तब राजस्थान में वत्सराज परिहार के पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने इसकी सेना पर आक्रमण किया यह युद्ध वर्तमान टौंक और उनियारा के बीच ककोड़ नामक स्थान पर जो कि पहले मालवा की राजधानी थी, में हुआ। युद्ध के दौरान कुछ देर बाद नागभट्ट ने अनुभव किया कि राष्ट्रकूट सेना उस पर बहुत भारी पड़ रही है तब वह अपने पिता वत्सराज प्रतिहार की तरह शक्ति नष्ट न करना उचित समझकर अपनी सेना के साथ मृत्यु सुरक्षित राजस्थान की ओर लौट आया। गोविन्द तृतीय भी इसका पीछा न करके कन्नौज की ओर बढ़ गया । कन्नौज में उस समय इन्द्रायुद्ध का पुत्र चक्रायुद्ध शासक था, जिसने गोविन्द राष्ट्रकूट के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इसी समय दक्षिण भारत में गोविन्द तृतीय द्वारा पराजित कुछ राजाओं ने इसके विरुद्ध एक संगठन खड़ा किया। इसका समाचार प्राप्त होते ही यह वापस दक्षिण की ओर लौट गया। उत्तर भारत के इस अभियान में गोविन्द तृतीय को असीम धन प्राप्त हुआ। इसने दक्षिण पहुँचते ही अपने विरोधी राजाओं को परास्त किया।

    गोविन्द तृतीय की तीसरी पीढ़ी बाद इन्द्र तृतीय ने भी दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् अपने पूर्वजों की भाँति उत्तर भारत पर चढ़ाई की। इसने कन्नौज के प्रतिहार सम्राट् महीपाल को परास्त किया था। इन्द्र तृतीय के बाद अमोधवर्ष द्वितीय तथा इसके बाद इसका छोटा भाई गोविन्दराज चतुर्थ गद्दी पर बैठा। गोविन्दराज की असमय मृत्यु हो जाने पर कृष्णराज द्वितीय का पौत्र अमोधवर्ष तृतीय राज्य का शासक हुआ। उसके बाद क्रमश: कृष्णराज तृतीय, अमोधवर्ष तृतीय, खोट्टिगदेव और कर्कराज द्वितीय राज्य के शासक हुए। कर्कराज के पूर्व के शासक खोट्टिग और मालवे के परमार राजा सीयक द्वितीय के युद्ध के परिणामस्वरूप राष्ट्रकूटों का राज्य शिथिल पड़ गया था राष्ट्रकूट राज्य को बनाए रखने के लिए कर्कराज के बाद इन्द्रराज चतुर्थ को राजगद्दी पर बिठाने की कोशिश की गई, जो असफल रही। इस तरह दक्षिण राष्ट्रकूट साम्राज्य का अन्तिम शासक कर्क द्वितीय हुआ तथा लगभग दो सौ पच्चीस वर्षों के बाद वि.सं. 1030 (ई.973) के लगभग राष्ट्रकूट साम्राज्य समाप्त हो गया।

राठौड़ों का राजस्थान आना

     चौदहवीं सदी में राठौड़ों का एक दल राव सीहा के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश से राजस्थान आया तथा पाली के पास के क्षेत्र में रहा। सीहा वि.सं. 1330 (ई.1273) में
पाली के पास बीठू गाँव में मुसलमानों से युद्ध करता हुआ काम आया। यह उसके स्मारक लेख से ज्ञात होता है। सीहा के पुत्र आसथान ने ‘खेड़’ जो उस समय गोहिलों के अधिकार में थी, को विजय कर अपनी राजधानी बनाया ‘खेड़़’ राजस्थान में राठौड़ों की प्रथम राजधानी स्थापित हुई। आसथान के बाद क्रमश: राव धूहड़, राव रायपाल, राव कान्हपाल, और जालणसी यहाँ के शासक हुए। राठौड़ों का सातवाँ शासक छाडा ‘खेड़’ से अपनी
राजधानी ‘महेवा’ में ले गया । छाडा के पुत्र तीडा के समय सीवाना पर मुसलमानों ने आक्रमण किया। वहाँ का चौहान शासक सातल इसका भानजा था। इसलिए यह उसकी सहायता पर गया और युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ। तीडा के बाद क्रमश: राव कान्हड़देव और राव त्रिभुवनसी शासक हुए। त्रिभुवनसी के छोटे भाई सलखा के पुत्र मल्लीनाथ ने मुसलमानों की सहायता से इसे परास्त कर महेवा पर अधिकार कर लिया। मल्लीनाथ के शासन में एक बड़ी मुसलमान सेना ने उस पर चढ़ाई की, परन्तु इसने उसे परास्त कर दिया। मल्लीनाथ बड़ा पराक्रमी और सिद्धपुरुष था, इसका ग्यारह सौ गाँवों पर अधिकार था। मल्लीनाथ के पुत्र जगमाल के समय गुजरात की मुसलमान सेना सावन में महेवा की लड़कियों को पकड़कर ले गई। उन्हें छुड़ाकर लाते समय जगमाल गुजरात के सुल्तान की लड़की गींदोली को भी ले आया। गुजरात की सेना ने इस पर आक्रमण किया, जिसे इसने परास्त कर दिया।

   उस समय मल्लीनाथ के छोटे भाई वीरम के पुत्र चूंडा का प्रभाव चारों और फैला हुआ था। मांडू के सूबेदार ने ईंदा शाखा के पड़िहारों से राज्य छीनकर मंडौर पर अधिकार कर लिया। तब ईंदों ने चूंडा से सम्पर्क कर कहा कि आप मंडौर को विजय करो, हम आपकी मदद करेगें तथा उन्होंने अपने मुखिया राजा उगमसिंह ईंदा की पौती का विवाह चूंडा से कर दिया। चूंडा ने ईंदों की मदद से मंडौर पर अपना अधिकार कर लिया। इस  प्रकार मंडौर राजस्थान में राठौड़ौं की तीसरी राजधानी हुई। चूंडा के चौदह पुत्र थे। रिड़मल सबसे बड़ा पुत्र था लेकिन चूंडा की इच्छानुसार उसका छठा पुत्र कान्हा उसके बाद मंडौर का स्वामी हुआ। कान्हा के बाद चूंडा के ज्येष्ठ पुत्र रिड़मल ने मंडौर पर अधिकार कर लिया। रिड़मल के 26 पुत्र थे। ओझा के ‘जोधपुर राज्य का इतिहास’ (प्रथम भाग) के अनुसार उनके पुत्रों में सबसे बड़ा अखैराज और दूसरा जोधा था। राव जोधा का जन्म वि.सं. 1472 (ई. 1416) में हुआ था| राव रिड़मल के भानजे मेवाड़ के महाराणा मोकल की एक षड्यन्त्र रचकर हत्या कर दी गई थी। रिड़मल मोकल की हत्या का बदला लेने मेवाड़ गया और महाराणा मोकल के पुत्र महाराणा कुम्भा के साथ मांडू पर हमला किया। वहाँ मोकल के हत्यारे छुपे हुए थे। इस युद्ध में रिडमल ने माडू (मालवा) के सुल्तान को कैद किया। कुछ समय बाद रिड़मल को चित्तौड़ में धोखे से मार दिया गया। अन्तत: मंडौर पर मेवाड़ का अधिकार हो गया।


राठौड़ों के 15 वर्ष के कड़े संघर्ष तथा उस समय के बड़े प्रसिद्ध और प्रभावशाली व्यक्ति हरभू (हरिब्रह्म) सांखला की मदद से वि.सं. 1510 (ई.1453) में मंडौर पर फिर
से राठौड़ों का अधिकार हो गया। इस संघर्ष में रिड़मल के पुत्रों में सबसे अधिक प्रयास और परिश्रम जोधा का था। इसलिए उसके बड़े भाई अखैराज ने महान आदर्श उपस्थित कर जोधा को ही मंडौर की गद्दी पर बैठाया । मेवाड़ की ओर से निश्चिन्त होने के बाद जोधा ने वि.सं. 1516 (ई.1459) में चिड़ियाटूरंक नामक पहाड़ी पर किले की नींव लगाई और पहाड़ के नीचे अपने नाम से जोधपुर नगर बसाया तथा अपनी राजधानी मंडौर
से जोधपुर में स्थानान्तरित की। जोधा के कई पुत्र थे, जिनमें एक बीका नाम का बड़ा वीर और होनहार पुत्र था। बीका ने अपने चाचा कांधल की सहायता से नया राज्य कायम किया, जो आगे चलकर बीकानेर राज्य कहलाया। बीका के साथ उसका भाई बीदा भी था। इन दोनों भाइयों के वंशज बीका और बीदावत कहलाते हैं। जोधपुर के राठौड़ राव जोधा के बाद उनका पुत्र सातल जोधपुर की गद्दी पर बैठा। राव सातल को समय मांडू के सुल्तान नासिरशाह ने सूबेदार मल्लू खाँ, जो अजमेर में रहता था, के सेना देकर जोधपुर भेजा। मल्लू खाँ पीपाड़ को लूटते हुए गौरी की पूजा करने वाली लड़कियों को पकड़कर ले गया। उसने कोसाना में पड़ाव किया। इस घटना की राव सातल को सूचना मिलते ही उसने मुसलमानी सेना पर चढ़ाई की। इस युद्ध में मल्लू खाँ परास्त होकर भागा और उसका सेनापति लिया, लेकिन युद्ध में अधिक घायल होने के कारण उसी रात वि.सं. 1549 (ई.1492) में उसका स्वर्गवास हो गया। उसकी सातों राणियां उसके साथ सती हुई। उसकी एक राणी हरखबाई की आज भी पूजा होती है । युद्ध में मारा गया। सातल ने अपहृत लड़कियों को छुड़ा सातल के बाद, सूजा जोधपुर की गद्दी पर बैठा । सूजा के पुत्र बाघा की सूजा की मौजूदगी में ही मृत्यु हो गई थी, इसलिए सूजा के बाद उसका पौत्र गांगा जोधपुर का शासक हुआ। गांगा के बाद राव मालदेव जोधपुर की गद्दी पर आसीन हुआ। राव मालदेव वि.सं. 1589 (ई. 1532) में सोजत में गद्दी पर बैठा, उस समय इसके अधीन जोधपुर और सोजत ही थे। मालदेव के पास बड़े प्रसिद्ध और शक्तिशाली सामंत थे जिनकी ताकत से उन्होनें अपने राज्य का बहुत विस्तार कर लिया था। मालदेव के समय जोधपुर राज्य जितना विस्तृत था, उतना विस्तार किसी  भी शासक के समय में नहीं था।

    मेड़ता के सगोत्रीय शासक राव वीरम से मालदेव की द्वेषता चलती थी। उन्हीं दिनों गुजरात के सुल्तान से राव वीरम ने अजमेर छीन लिया। मालदेव ने पहले तो मेडता
से वीरम को परास्त कर निकाल दिया फिर उससे अजमेर भी छीन लिया, वीरम उसके बाद रणथम्भौर होता हुआ शेरशाह के पास दिल्ली चला गया । मुसलमान शासकों ने कई बार नागौर पर कब्जा करने की कोशिश की लेकिन राव मालदेव के सामने सफल न हो सके। वि.सं. 1600 (ई. 1543) में शेरशाह ने 80 हजार सैनिकों की सेना लेकर मालदेव पर चढ़ाई की। मालदेव की एक बड़ी सेना लेकर उसके मुकाबले पर आया। शेरशाह का पड़ाव सुमेल स्थान पर था और मालदेव की गिर्री में । मालदेव की शक्ति देखकर शेरशाह की हिम्मत हमला करने की नहीं हुई। शेरशाह ने धोखे से मालदेव के दिमाग में यह बात जमा दी कि उसके सब सरदार उसके खिलाफ हो गए हैं। इसलिए मालदेव ने पीछे हटना शुरू किया। इस पर उसके सामंत – वीरवर कूंपा, जैता और पंचायण ने 60 हजार सैनिकों के साथ शेरशाह की 80 हजार सैनिकों की फौज पर हमला किया और एक बार उसकी सेना को हिला दिया, परन्तु अन्त में कम संख्या होने के कारण सब के सब युद्ध में मारे गए। युद्ध के बाद शेरशाह ने कहा- ‘खुदा का शुक्र था कि में युद्ध जीत गया, वरना मुट्ठी भर बाजरे के लिए दिल्ली की सल्तनत खो देता। इस युद्ध के परिणाम के बाद मालदेव सीवाना की ओर चला गया। वि.सं. 1602 (ई.1545) में शेरशाह का काल्लींजर में देहान्त हो गया तब राव मालदेव के प्रधान जैसा चांपावत ने फिर जोधपुर पर अधिकार कर लिया। मालदेव की मृत्यु वि. 1619 (ई. 1562) में हुई।
  
     मालदेव की मृत्यु के बाद उसका एक पुत्र चन्द्रसेन जिसको उन्होंने नामजद किया था, वि.सं. 1619 (ई.1562) में जोधपुर का शासक बना। वि.सं. 1620
(ई.1563) में बादशाह अकबर ने जोधपुर पर भारी सेना भेजकर आक्रमण कराया। एक दिया लेकिन दुबारा आक्रमण में जोधपुर पर मुगल सेना का अधिकार हो गया चन्द्रसेन मारवाड़ के दक्षिण हिस्से के पहाड़ी किले सीवाना चला गया। वि.सं. 1631(ई.1574) में बादशाह ने अपनी सेना चन्द्रसेन के विरूद्ध सीवाना भेजी। चन्द्रसेन सीवाने के किले का भार पत्ता राठौड़ को सौंपकर पहाड़ों में चला गया बादशाही सेना सीवाने पर अधिकार नहीं कर पाई तब बादशाह ने इसकी मदद के लिए एक सेना और भेजी, परन्तु उसका भी कोई परिणाम नहीं निकला। वि.सं. 1632 में बादशाह ने जलालखाँ को सेना लेकर सीवाना भेजा। चन्द्रसेन ने जलालखौँ पर हमला किया और वह मारा गया । क्रुद्ध बादशाह ने शाहबाजखाँ को बड़ी सेना देकर बार तो चन्द्रसेन ने मुगल सेना को परास्त भेजा। कई महीनों तक चलते युद्ध के बाद जब भोजन सामग्री समाप्त हो गई तो पत्ता राठौड़ किला छोड़कर चन्द्रसेन के पास पहाड़ों में चला गया। यहाँ भी बादशाही सेना ने पीछा किया तो वह सिरोही, डूंगरपुर, बांसवाड़ा होता हुआ मेवाड़ में कोटड़ा पहुँचा और करीब 3 वर्ष मारवाड़ से बाहर महाराणा प्रताप के पास कोटड़ा रहा। चन्द्रसेन महाराणाप्रताप का बहनोई था। मारवाड़ के सामन्तों ने मिलकर चन्द्रसेन को वापस बुलाया वि.सं. 1636 (ई.1579) में चन्द्रसेन ने सोजत विजय की तथा उसने हिस्से पर भी अधिकार कर लिया। बादशाह को यह खबर मिलते ही उसने फिर अपनी सेना भेजी। चन्द्रसेन सुरक्षा की दृष्टि से सिचियाई के पहाड़ों में चला गया, जहाँ वि.सं. 1638 (ई.1581) में उसकी मृत्यु हो गई । चन्द्रसेन की मृत्यु के बाद उसके पुत्र रायसिंह ने वि.सं. 1639 (ई.1582) में गद्दी संभाली तथा बादशाह की अधीनता स्वीकार कर ली। बादशाह ने इसे सोजत का परगना और राव का खिताब दिया। राव रायसिंह के बाद चन्द्रसेन के एक बड़े भाई उदयसिंह (मोटाराजा) ने बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली। बादशाह ने इसे जोधपुर का राज्य तथा राजा का खिताब दिया। यह शारीरिक रूप से मोटा होने के कारण ‘मोटाराजा कहलाया।

भारत का गौरवशाली प्राचीन वंश : राठौड़
भारत का गौरवशाली प्राचीन वंश : राठौड़

मारवाड़

    राजा उदयसिंह के बाद उनका पुत्र शूरसिंह जोधपुर का राजा हुआ तथा शूरसिंह के बाद गरजसिंह ने जोधपुर का शासन संभाला। गरजसिंह बड़ा वीर था इसलिए बादशाह ने इसे दलथम्भन का खिताब दिया। गजरसिंह का बड़ा पुत्र अमरसिंह बड़ा वीर और उच्छुंखल था। जिससे गजसिंह ने नाराज होकर जोधपुर की गद्दी से उसका हक हटा दिया। तब अमरसिंह बादशाह शाहजहाँ के पास दिल्ली गया। बादशाह ने अमरसिंह को राव का खिताब, मनसब तथा नागौर का इलाका जागीर में दिया। इसने मुगलों के अनेकनयुद्धों में भाग लिया। बादशाही वख्शी सलावतखाँ तथा इसमें वैमनस्य था। एक रोज आगरा में सलावतखाँ ने दरबार के अन्दर बादशाह की मौजूदगी में अमरसिंह को अपशब्द कह दिए। इस पर अमरसिंह ने दरबार में ही कटारी से सलावतखाँ को मार डाला। बादशाही मनसबदारों ने अमरसिंह को भी वहीं मार डाला। इस पर नाराज होकर बादशाह ने हुक्म दिया कि अमरसिंह की लाश को किले के चौक में डाल दिया जाए। उधर अमरसिंह की रानियों ने जब इस दुर्घटना के बारे में सुना, तब वे सती होने को तैयार हो गई। इस पर बल्लू चांपावत जो अमररसिंह के साथ जोधपुर से आया था तथा बाद में बादशाही सेना में प्रविष्ट हो गया था, अपनी हवेली से घोड़े पर चढ़कर किले में आया और अमरसिंह की लाश को उठाया। तब उस पर चारों ओर से बादशाही सेना के हमले हुए। बल्लू ने बुर्ज पर जाने के खुर्रे से घोड़े को बुर्ज पर चढ़ा दिया तथा उसे वहाँ से कुदाया। घोड़ा किले से नीचे आकर गिरा (जिसे आजकल लोग अमरसिंह का घोड़ा कुदाना कहते हैं)। इनके साथी जो नीचे खड़े थे, उन्होंने बल्लू को दूसरा घोड़ा दिया तथा उसने यमुना में जाकर रानियों को, जो सती होने को तैयार बैठी थीं, अमरसिंह की लाश सौंपी। इसके बाद अमरसिंह की रानियाँ सती हो गई। थोड़ी देर बाद बादशाही फौज वहाँ आई, जिससे युद्ध करता हुआ बल्लू चापांवत भी वीरगति को प्राप्त हुआ। इस युद्ध में बल्ल के कई राठौड़ सहयोगी मारे गए।

     महाराजा जसवन्तरसिंह प्रथम राजा गजसिंह का छोटा पुत्र था और ईस्वी 1638 में गजसिंह की मृत्यु के बाद वह जोधपुर का राजा हुआ। इसे बादशाह ने महाराजा का खिताब दिया। यह बड़ा वीर तथा योग्य शासक था। इससे प्रजा तथा सामत भी बहुत खुश
थे। यह बड़ा उच्चकोटि का राजस्थानी कवि था तथा उसे वैदान्त का भ बड़ा गहरा ज्ञान था| बादशाह शाहजहाँ के बीमार पड़ने पर जब उसके बड़े पुत्र दाराशिकोह और औरंगजेब के बीच युद्ध हुआ तब इसने दाराशिकोह की ओर से उसकी सेना का उजैन में संचालन किया। इस युद्ध में जसवन्तरसिंह औरंगजेब से हार गया था। औरंगजेब के बादशाह बनने के बाद यह उसके साथ रहा, परन्तु औरंगजेब ने इसका कभी पूरा विश्वास नहीं किया।
इसकी मनसब सात हजारी हो गई थी जो कि हिन्दू राजाओं में बहुत कम को थीं। अन्त में भारत की उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर जमरूद के थाने पर वि.सं. 1735 (ई.1678) में महाराजा जसवन्तरसिंह की मृत्यु हुई। महाराजा जसवन्तसिंह की मृत्यु के बाद उसके
स्वामीभक्त सरदार दुर्गादास राठौड़, इनकी रानियों को लेकर दिल्ली की ओर चले। मार्ग में इनकी जादौन रानी जो कि गर्भवती थी, उसके अजीतसिंह का जन्म हुआ। दिल्ली पहुँचने पर बादशाह औरंगजेब चाहता था कि सरदार लोग महारानी और शिशु महाराजा अजीतसिंह को उसे सौंप दें। परन्तु जब जोधपुर के सरदार महारानी और ‘शिशु महाराजा को बादशाह को सौंपने के लिए तैयार नहीं हुए तब बादशाह ने फौज भेजकर दिल्ली स्थित किशनगढ़ की हवेली, जहाँ ये सब ठहरे हुए थे, को घेर लिया। महाराजा जसवन्तरसिंह के सेना से भारी संघर्ष किया। इसी बीच शेष सामंत प्रधान भाटी महारानी को लेकर मुगल सेना को चीरते हुए निकल गए। शिशु महाराजा अजीतसिंह को गुप्त रीति से पहले ही दिल्ली से बाहर भेज दिया था औरंगजेब ने सेनाएँ भेजकर जोधपुर पर अधिकार कर लिया। उधर राठौड़ बादशाह से कड़ा संघर्ष कर रहे थे। इसी बीच के रघुनाथदास ने मुगल महाराणा राजसिंह भी राठौड़ों के साथ शामिल हो गए, जिससे युद्ध का दायरा उदयपुर पूरे दक्षिणी राजस्थान में फैल गया। इस पर बादशाह औरंगजेब भारी सेना के साथ अजमेर आया। युद्ध बड़ा लम्बा चलता रहा। इसी समय महाराणा राजसिंह की मृत्यु हो गई। तब दुर्गादास राठौड़ और सोनग चांपावत जो बड़े प्रचण्ड वीर थे, दोनों ने प्रयास करके औरंगजेब के अपनी सेना और राठीड़, सीसोदियों की सेना साथ लेकर अजमेर पर हमला किया, परन्तु औरंगजेब ने अपनी चतुराई से इनकी सेना में षड्यन्त्र फैलाकर विभाजन करा दिया। औरंगजेब ने दुर्गादास को भी अनेक तरह के बड़े से बड़े लालच देने की कोशिश की। पुत्र अकबर को पिता के विरुद्ध बगावत पर तैयार कर लिया। अकबर ने आत्याचार किया लेकिन दुर्गादास अपने स्वामी को छोड़कर औरंगजेब से नहीं मिला। तब दुर्गादास अकबर सम्भाजी के की सुरक्षा की दृष्टि से अकबर को दक्षिण में मराठा शासक शिवाजी के पास ले गया| तब औरंगजेब भी अजमेर में कुछ सेना छोड़कर शेष सेना के साथ दक्षिण की ओर रवाना हुआ। दुर्गादास चाहता था कि सम्भाजी इनके साथ एकजुट होकर दिल्ली पर आक्रमण कर दें पर इसके लिए सम्भाजी तैयार नहीं हुए। तब दुर्गादास ने अकबर को जहाज में बैठाकर ईरान भेज दिया तथा खुद वापस मारवाड़ लौट आया। जब दुर्गादास व अकबर दक्षिण में गए थे, तब अकबर के लड़के और लड़की राजस्थान में ही राजपूतों की देखरेख में थे। अब जब कि उनकी उम्र कुछ बड़ी हो गई थी इसलिए दुर्गादास ने उनको दक्षिण में औरंगजेब के पास भिजवा दिया। औरंगजेब ने उन्हें इस्लाम की तालीम देने का हुक्म दिया, परन्तु बादशाह को यह जानकर बड़ा आश्चर्य। कंठस्थ करा दी थी। इस पर औरंगजेब, दुर्गादास से बड़ा प्रभावित हुआ तथा उन्हें मनसब पुत्र हुआ कि दुर्गादास ने उन्हें कुरान दी।


उसके के बाद अजीतसिंह ने दुर्गादास राठौड़ तथा अन्य सरदारों की मदद से जोधपुर पर अधिकार कर लिया। जब औरंगजेब का पुत्र मौज़म बहादुरशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा, तब उसने आमेर महाराजा सवाईजयसिंह से तथा जोधपुर महाराजा अजीतसिंह से खालसे कर लिए। इसके बाद वह अपने भाई कामबख्श के विरुद्ध बड़ी सेना लेकर दक्षिण की ओर रवाना हुआ। इस अभियान के समय बादशाह साथ सवाईजयसिंह आमेर, महाराजा अजीतसिंह जोधपुर और वीरवर दुर्गादास राठौड़ नर्वदा तक इस उम्मीद से गए कि जोधपुर और आमेर उन्हें वापस लौटा दिए जाएंगे। परन्तु बहादुरशाह ने जब ऐसा नहीं किया तथा नर्वदा पार कर गया, तब ये दोनों महाराजा अपनी फौजों के साथ वापस लौटकर उदयपुर महाराणा अमररसिंह द्वितीय के पास आए। महाराणा ने भी अपनी सेना इनके साथ कर दी, जिससे इन्होंने जोधपुर पर अधिकार कर लिया। फिर सवाईजयसिंह आमेर ने दुर्गादास राठौड़, दीवान रामचन्द्र और खंगारोत श्यामसिंह को सेनाएँ देकर आमेर विजय करने को भेजा, जिन्होंने आमेर को विजय कर लिया। बाद में इनका बादशाही सूबेदार सैयदों से सांभर में  भीषण युद्ध हुआ, जिसमें नरुकों की बहादुरी से इनकी विजय हुई। जब बहादुरशाह अपने भाई कामबखत को परास्त करके वापस उत्तर में लौटा तब उसने बूंदी के राव राजा बुद्धिसिंह की मध्यस्थता से इन दोनों राजाओं से सन्धि की तथा इन्हें जोधपुर और आमेर वापस लौटा दिए। महाराजा अजीतरसिंह के व्यवहार से असन्तुष्ट होकर दुर्गादास राठौड़ मारवाड़ छोड़कर महाराणा उदयपुर के पास चले गए तथा वहाँ से उज्जैन चले गए। उजैन में ही इनकी मृत्यु हुई। बहादुरशाह के दो पीढ़ी बाद फरुर्खशियर बादशाह के समय में महाराजा अजीतसिंह ने फिर मुगलों का विरोध शुरू किया तथा अजमेर पर अधिकार कर लिया। महाराजा ने अपने पुत्र कुमार अभयसिंह क़ो सेना देकर दिल्ली पर भेजा, परन्तु उसे हरियाणा से वापस लौटना पड़ा। बादशाह फरुखंशियर ने अपने मुख्य बख्शी सैयद हसनखाँ को एक बहुत औरंगजेब की मृत्यु बहादुरशाह की बड़ी सेना देकर अजीतसिंह के विरूद्ध अजमेर भेजा। अजीतसिंह तो सेना आने से पूर्व ही जोधपुर लौट गया, परन्तु इनके सेनापति अमरसिंह उदावत नीमाज ने मुगलों का जमकर
मुकाबला किया। अन्त में सैयद हसन खाँ ने अमरसिंह को यह आश्वासन दिया कि वह अजमेर का किला छोड़ दें तो हसन खां उसका पीछा नहीं करेगा अब और कोई चारा
ने देखकर अमरसिंह भी अजमेर का किला खाली करके नगारा बजाते हुए जोधपुर की ओर लौट गया। बादशाह फरुरखशियर की जब सैयदों से अनबन हो गई, तब अजीतसिंह ने प्रधानमन्त्री सैयद अब्दुला खाँ तथा मुखर्य बख्शी सैयद हसन खौ से मिलकर बादशाह फरुर्खशियर को मरवा दिया। जब बादशाह मोहम्मदशाह दिल्ली के सिंहासन पर बैठा तब उसने सवाई जयसिंह आमेर की मदद से सैयदों को खत्म किया। बादशाह ने बाद में धोखे
से महाराजा अजीतसिंह जोधपुर को मरवा दिया। इसके बाद अजीतरसिंह का बड़ा पुत्र अभयसिंह जोधपुर का राजा हुआ। अपने छोटे भाई बखतसिंह को महाराजा अभयसिंह ने नागौर का राज्य तथा ‘राजाधिराज’ का खिताब दिया| बादशाह मोहम्मदशाह के समय में
गुजरात का सूबेदार सरबुलन्द खाँ बड़ा ताकतवर हो गया था वह बादशाह की भी परवाह नहीं करता था। ऐसे समय में बादशाह ने राजा अभयसिंह को गुजरात को सूबेदार बनाया। तब अभयसिंह ने अपने छोटे भाई बखतरसिंह तथा राठौड़ों की बड़ी सेना लेकर गुजरात पर आक्रमण किया। काफी घमासान युद्ध के बाद सरबुलन्द खाँ हारकर भाग गया तथा गुजरात पर अभयसिंह का अधिकार हो गया। इस युद्ध में बखतसिंह ने बड़ी वीरता का परिचय दिया तथा वह घायल भी हो गया महाराजा अभयसिंह के बाद उसका पुत्र रामसिंह जोधपुर का राजा हुआ। वह बड़ा अयोग्य शासक था। रामसिंह और उसके काका बखतसिंह के बीच कई युद्ध हुए। मल्हार राव होल्कर रामसिंह की मदद कर रहा था, परन्तु फिर भी उसे हारकर भागना पड़ा तथा जोधपुर पर बखतसिंह का अधिकार हो गया। बखतसिंह के बाद उसका पुत्र विजयसिंह जोधपुर का राजा हुआ। इसके समय में ग्वालियर के शासक महादजी सिंधिया ने जयपुर के महाराजा सवाई प्रतापसिंह पर चढ़ाई की। विजयसिंह ने अपनी सेना प्रतापसिंह की मदद हेतु भेजी। इन दोनों सेनाओं का सोनड़ (तुंगा) के पास प्रसिद्ध युद्ध हुआ, जिसमें महादजी को परास्त होकर पीछे हटना पड़ा। महाराजा विजयसिंह के बाद उसका पौत्र भीमसिंह जोधपुर का राजा हुआ तथा भीमसिंह के बाद मानसिंह जोधपुर का राजा हुआ महाराजा मानसिंह के समय में यशवन्तराय होल्कर अंग्रेजों से हारकर जोधपुर महाराजा मानसिंह के पास आया। महाराजा ने उसे जोधपुर में रखा, फिर वह पंजाब चला गया बाद में महाराजा मानसिंह की अंग्रेजों से सन्धि हो गई। इनके समय में नागपुर का भोंसला शासक मधुराजदेव अंग्रेजों द्वारा गर्दी से हटाए जाने पर भागकर मानसिंह के पास जोधपुर आया। अंग्रेज उसे लेना चाहते थे, परन्तु महाराजा मानसिंह ने यह कहकर उन्हें उनके सुपुर्द नहीं किया कि मैं आपका (अंग्रेजों) का मित्र हूँ। इसके मेरे पास होते हुए आपको कोई खतरा नहीं है । अग्रेजों के काफी दबाव के बाद भी ये अटल रहे। महाराजा मानसिंह के कोई पुत्र नहीं था। इसलिये अंग्रेजों ने इनकी राय से अहमदनगर के तखतरसिंह को, जो महाराजा अरजीतसिंह के वंशज थे, जोधपुर का राजा बनाया। महाराजा तखतसिंह के समय में सन् 1857 का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम हुआ।


इसमें आउवा ठिकाने के ठा. कुशालसिंह चांपावत, आसोप के ठा. शिवनाथसिंह कूंपावत, आलनियावास के अजीतरसिंह मेड़तिया, गूलर के बिशनसिंह तथा कुछ अन्य जागीरदारों ने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध छेड़ा। आउवा के युद्ध में जोधपुर का अंग्रेज रेजीडेंट मारा गया। वहाँ परास्त होकर एरनपुर छावनी के अंग्रेजों से बदले हुए सैनिक अजीतसिंह आलनियावास के साथ दिल्ली की ओर रवाना हुए। दिल्ली की ओर जाते हुए वे शेखावटी होते हुए गुजरे, जहाँ अजीतसिंह आलनियावास के दामाद ठा. आनन्दसिंह मण्डावा ने इनका स्वागत किया। आगे हरियाणा पहुँचने पर अंग्रेजों ने इन्हें परास्त कर भगा दिया। तब ये वापस शेखावटी लौट आए। अजीतसिंह आलनियावास ने स्वतन्त्रता संग्राम के प्रसिद्ध सेनापति तांत्या टोपे को शेखावाटी में बुलाया, परन्तु अंग्रेज सेना ने सीकर के पास उसे परास्त कर दक्षिण की ओर भगा दिया। ठा. अजीतसिंह की मृत्यु के बाद उसके पुत्र उदयसिंह आलनियाबास ने अपने बहनोई आनन्दसिंह मण्डावा की मदद से आलनियावास पर वापस अधिकार कर लिया। महाराजा तखतसिंह के बाद जोधपुर के राजा क्रमश: जसवन्तरसिंह द्वितीय, सरदारसिंह तथा सुमेरसिंह हुए ।

   जोधपुर महाराजा सुमेरसिंह के कोई पुत्र न होने से उनके छोटे भाई उम्मेदसिंह जोधपुर के राजा हुए। जसवन्तरसिंह द्वितीय से लेकर महाराजा उम्मेदसिंह के समय तक महाराजा जसवन्तसिंह के छोटे भाई सर प्रतापसिंह (जिन्हें अंग्रेजों ने ईडर का राज्य देनदिया था) ने ही जोधपुर राजपूत स्कूल चौपासनी बनवाई। सर प्रताप ने दिल्ली में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के अधिवेशन की अध्यक्षता की थी। महाराजा उम्मेदसिंह बहुत ही समझदार तथा अच्छी प्रवृत्ति के राजा थे इनकी मृत्यु के बाद इनके बडे पुत्र हनुमन्तसिंह जोधपुर के राजा हुए। महाराजा हनुमन्तसिंह बड़े ही विलक्षण बुद्धि के व्यक्ति थे। इनके समय में जोधपुर राज्य का विलय राजस्थान यूनियन में हुआ। जब सरदार पटेल जयपुर आये और उन्होंने यूनियन का उद्घाटन किया तो उसमें राजस्थान के सभी राजाओं को बुलाया गया। उस सम्मेलन में जोधपुर के महाराजा हनुमन्तरसिंह काला साफा बांधकर आए और उन्होंने कहा कि आज मेरे राज्य का अन्त हो रहा है, इसलिए मेरे लिए यह शोक का दिन है। इनके समय में 1952 का प्रथम विधानसभा चुनाव हुआ, जिसमें इन्होंने जोधपुर क्षेत्र से अपने निर्दलीय उम्मीदवार कांग्रेस के विरुद्ध खड़े किये। उनमें से 31 उम्मीदवार जीते तथा कांग्रेस को जोधपुर क्षेत्र से सिर्फ 4 स्थानों पर विजय मिली। चुनाव समाप्त होने के समय इनका हवाई दुर्घटना से देहावसान हो गया, वरना राजस्थान में ये कांग्रेस की सरकार कदापि नहीं बनने देते । वर्तमान में इनके पुत्र गजसिंह द्वितीय हैं जो हैरिटेज होटल एसोसियेसन, मेयो कालेज सारा शासन चलाया। सर प्रतापसिंह ने ही जोधपुर की प्रसिद्ध  जनरल काउन्सल इज बोर्ड आफ गवर्नर तथा राजस्थान टूरिज्म के अध्यक्ष हैं।

बीकानेर के राठौड़

जोधपुर नगर के संस्थापक राव जोधा का एक पुत्र बीका था। वह अपने चाचा कांधल एवं छोटे भाई बीदा सहित सेना साथ लेकर उत्तर की ओर चला। उन दिनों जोधपुर राज्य के उत्तर में सांखलों तथा जाटों के राज्य थे। इन राज्यों पर मुसलमानों के आक्रमण हो रहे थे, जिससे ये राज्य निर्बल होते जा रहे थे सांखलों में एक प्रसिद्ध व्यक्ति नापा सांखला था, जिसने बीका को सलाह दी कि हमारे राज्यों पर मुसलमान अधिकार कर लेंगे, अत: इन राज्यों पर आप अधिकार कर लें। इस पर बीका ने अपने चाचा कांधल की मदद से जोधपुर से उत्तर में स्थित इस सम्पूर्ण भू-भाग पर अधिकार कर लिया। बीका ने वैशाख सुदि 2 रविवार 13 अप्रैल ई. 1488 को अपने नाम पर बीकानेर शहर बसाया और यहाँ पर अपने नए राज्य की राजधानी कायम की। बीका ने आसपास केनकई अन्य क्षेत्रों को भी जीत लिया। निव्वाण चौहानों के खंडेला राज्य पर भी बीका ने आक्रमण किया तथा उन्हें परास्त किया इनके चाचा कांधल ने साहबा में अपना निवास स्थापित किया और हिसार के क्षेत्रों में अआक्रमण करता रहा। हिसार के सूबेदार सारंगखाँ ने एक बार अकस्मात् काधल पर आक्रमण किया जिसमें कांधल वीर गति को प्राप्त हुआ। तत्पश्चात् राव जोधा, बीका तथा बीदा और दूदा ने मिलकर सूबेदार सारंगखाँ पर आक्रमण किया और उसे मार कर कांधल का वैर लिया। राठौड़ों के इस नवीन बीकानेर की नींवडालने का श्रेय कांधल को ही है। राव बीका का आश्विन सुदि 3 वि.सं. 1561 में स्वर्गवास हुआ।

   बीका की मृत्यु के बाद उसका पुत्र लूणकरण बीकानेर का स्वामी हुआ। यह भी बड़ा वीर था। इसने अपने राज्य का विस्तार किया। लूणकरण ने फतेहपुर के नवाब
कायमखानी ( चौहान, जो मुसलमान बन गए थे) को परास्त करके उसके कुछ भाग को अपने राज्य में मिलाया। यह क्षेत्र चूरू जिले का हिस्सा है। राव लूणकरण ने नारनौल पर चढ़ाई की। नारनौल से तीन कोस पहले ढोसी नामक स्थान पर इनका नवाब के साथ युद्ध हुआ, जिसमें यह अपने तीन पुत्रों सहित युद्ध भूमि में लड़ता हुआ मारा गया। राव लूणकरण के बाद इसका पुत्र जैतसिंह बीकानेर की गद्दी पर बैठा। वह भी पिता की तरह बड़ा वीर था। उसके समय में दिल्ली के मुगल बादशाह हुमायूँ के भाई कामरान ने बीकानेर पर चढ़ाई की मार्ग में आने वाले भटनेर के किले को मुगल ने जा घेरा। भटनेर का प्रसिद्ध दुर्ग भाटियों ने बनाया था और इन दिनों यह किला कांधल राठौड़ के बंशज खेतसी के अधिकार में था। अन्त में खेतसी को जौहर करना पड़ा, समस्त राजपूत रक्षको के मारे जाने के पश्चात् कामरान का भटनेर के किले पर अधिकार हो गया। वर्तमान में यह किला हनुमानगढ़ के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ से आगे बढ़कर कामरान ने बीकानेर पर आक्रमण किया वि.सं. 159 । मार्गशीर्ष बदि 4 (ई.1534  अक्टूबर 26) को रात्रि के समय जैतसिंह ने कमरान की सेना पर आक्रमण किया, जिसमें कामरान परास्त होकर भागा उसके भागते हुए का छत्र जैतसिंह के हाथ लगा कुछ समय बाद जोधपुर के राव मालदेव ने बीकानेर पर चढ़ाई की उस युद्ध में राव जैतसिंह मारा गया और बीकानेर पर राव मालदेव का अधिकार हो गया| इसके पश्चात् जैतसिंह का पुत्र कल्याणमल दिल्ली के सूरी सुल्तान शेरशाह के पास चला गया। शेरशाह ने जब जोधपुर के राव मालदेव को गिरी के युद्ध में परास्त किया, तब कल्याणमल को बीकानेर वापस मिला। अकबर के समय में इसने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी।


     इसका पुत्र रायसिंह बादशाह अकबर का मनसबदार था। इसका छोटा भाई पृथ्वीराज राठौड़ भी बादशाही मनसबदार था। वह बड़ा उच्च कोटि का कवि था, जिसने महाराणा प्रताप को प्रसिद्ध दोहे लिखकर भेजे थे रायसिंह के पुत्र दलपतसिंह ने जहाँगीर के बादशाह बनने पर विद्रोह किया था जो युद्ध में धोखे से पकड़ा गया और अजमेर में कैद कर लिया गया जहाँ से हाथीरसिंह चांपावत राठौड़ ने उसे छुड़ाया। तत्पश्चात् दोनों ही
योद्धा मुगल सेना से बीकानेर के शासक कर्णसिंह का छोटा पुत्र पदमरसिंह बड़ा वीर था और तलवार- बाजी के युद्ध में अद्वितीय था। कर्णसिंह का बड़ा पुत्र अनोपसिंह जब शाही सेना में दक्षिण में नियुक्त था, तब उसने वहाँ के ब्राह्मणों से संस्कृत के ग्रंथ बादशाह ₹ औरंगजेब द्वारा नष्ट कर दिए जाने की आशंका के कारण बड़ी संख्या में खरीदे और उन्हें हाथियों पर लाद कर बीकानेर लाया। उन्हीं ग्रंथों से बाद में बीकानेर का प्रसिद्ध अनोप पुस्तकालय (अनूप संस्कृत लायब्रेरी) बनाया गया अंग्रेजों के समय में बीकानेर का महाराजा गंगासिंह बहुत ही योग्य शासक हुआ। जब यह गर्दी पर बैठा, तब बीकानेर की आय इक्कीस लाख थी। जब इसकी मृत्यु हुई तब बीकानेर की आय दो करोड़ से ऊपर थी। प्रथम विश्व युद्ध के बाद जब वायसराय संधि हुई, तब उसमें इन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया था। जब देश की आजादी के संबंध में लंदन में राउन्ड टेबल कॉन्फ्रेंस हुई, जिसमें महात्मा गाँधी, महामना मदनमोहन मालवीय आदि गए थे, उसमें महाराजा गंगासिंह को भी भेजा गया था। वहाँ पर इन्होंने राष्ट्रीय विचार व्यक्त किए थे।
युद्ध करते हुए मारे गए। महाराजा सर गंगासिंह की मृत्यु ई. 1943 में हुई। महाराजा गंगासिंह के समय।में राज्य में प्रत्येक स्तर पर बड़ी उन्नति हुई। आपने पंजाब की तरफ से सतलज नदी की एक नहर ई. 1921 से गंगनहर नामक शुरू की जिससे यह क्षेत्र हराभरा हो गया है।
महाराजा गंगासिंह के पुत्र महाराजा शार्दूलसिंह के समय में बीकानेर राज्य का।विलय राजस्थान संघ में हुआ। शार्दूलसिंह के पुत्र करणीसिंह तीन बार लोकसभा सदस्य
हेतु निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विजयी हुए थे। ये निशानेबाजी में भी बड़े दक्ष थे।
      इन्होंने ओलंपिक खेलों में निशानेबाजी की भारतीय. टीम का प्रतिनिधित्व किया और अनके पदक जीते। करणीसिंह के उत्तराधिकारी नरेन्द्रसिंह है।

किशनगढ़ के राठौड़

   किशनगढ़ राज्य के संस्थापक राजा किशनसिंह थे, जो जोधपुर नरेश राजा उदयसिंह ( मोटाराजा) के आठवें पुत्र थे। किशनसिंह का जन्म ई. 1580 में हुआ था। इनको बादशाह जहाँगीर ने अजमेर के पास सेठोलाव का परगना ई. 1605 में जागीर में दिया था वि.सं. 1666 में इसी सेठोलाव स्थान के पास पूर्व में अजमेर से 16 मील दरमपहाड़ियों के बीच इन्होंने अपने नाम पर किशनगढ़ बसाया था। वि.सं. 1672 में किशनसिंह वीर गति को प्राप्त हुए। इनके पश्चात् क्रमशः सहसमल्ल ने दो वर्ष, जगमाल ने म्यारह वर्ष तथा हरिसिंह ने सोलह वर्ष किशनगढ़ पर शासन किया।।राजा हरिसिंह के कोई पुत्र न होने के कारण उनके भाई भारमल्ल के पुत्र रूपसिंह किशनगढ़ की गद्दी पर बैठे। राजा रूपसिंह ने बादशाह शाहजहाँ की ओर से कई युद्धों में भाग लिया जिसमें वि. सं. 1702 में बल्ख, वि.सं. 1704 में काबुल, वि.सं. 1706,।1709 और 1710 के कंधार के युद्ध उल्लेखनीय हैं। अन्त में बादशाह के अस्वस्थ रहने के समय उसके शाहजादों में आपस में युद्ध प्रारम्भ हो गए । शाहजहाँ के निर्देश पर राजा रूपसिंह ने दाराशिकोह की तरफ से सामूगढ़ (धौलपुर) के युद्ध में भाग लिया। इस युद्ध में रूपसिंह ने बड़ी तेज गति से औरंगजेब के तोपखाने पर हमला किया और उसे चीरता हुआ हरावल को भी पार कर गया तथा आगे बढ़कर औरंगजेब के हाथी तक जा पँहचा। वहाँ इसका घोड़ा मारा गया तब यह पैदल होकर शाहजादे के हाथी पर झपटा और हाथी के हौदे का तंग काटकर औरंगजेब को नीचे गिराने के प्रयास में वीर गति को प्राप्त हुआ।।पिता के में मारे जाने के समय मानसिंह बहुत कम उम्र के थे। इन्होंने अपनी युवावस्था बादशाह के सान्निध्य में ही बिताई। इसी बीच इनकी बहन चंचलकुमारी से बादशाह औरंगजेब ने विवाह करना चाहा। किशनगढ़ राजघराने की होने के कारण वह धार्मिक प्रवृत्ति की थी। उसने उदयपुर के महाराणा को लिखकर भेजा कि मैं एक मुसलमान से शादी नहीं करना चाहती। इससे आप आकर और विवाह कर मुझे उदयपुर ले चलो। अगर आप नहीं आए और बादशाह की फौज आई तो मैं जहर खाकर मर जाऊँ गी। जिसका पाप आपको लगेगा। इस पर महाराणा राजसिंह ने अपने प्रमुख सरदार सलूम्बर के चूंडावत सरदार को मुगल सेना को रोकने हेतु भेजा, जब तक कि महाराणा चंचलकुमारी से विवाह करके रखाना न हो जाएँ। चूंडावत सरदार का उस वक्त नया ही विवाह हुआ था। युद्ध में जाते समय उन्होंने अपनी नव विवाहित हाड़ी रानी को कहलाया कि तुम्हारी निशानी भेजो। इस पर हाड़ी रानी ने सोचा कि इनका मन मेरे में रहेगा और ये युद्ध नहीं करेंगे, इसलिए उसने अपना सिर काटकर भेज दिया, जिसे चुंडावत सरदार ने गले में पहनकर रूपनगढ़ के पूर्व में मुगल सेना से भीषण युद्ध किया तथा महाराणा राजसिंह जब तक विवाह करके वापस नहीं लौट गए, तब तक मुगल सेना को वहीं रोके रखा और अन्त हुए वीर गति को प्राप्त हुए। आज भी रूपनगढ़ से कुछ मील पूर्व में उस करते
चूंडावत सरदार का चबूतरा है और उसे जनता लोक देव मानकर पूजती है।  राजा मानसिंह के बाद राजसिंह ने किशनगढ़ का शासन संभाला। इनके समय में किशनगढ़ राज्य का बहुत विस्तार हुआ। वि.सं. 1805 में इनका स्वर्गवास हो गया ।


    इनकी मृत्यु के समय इनके पुत्र कुंवर सामंतरसिंह बादशाह के पास दिल्ली थे बादशाह ने सामंतसिंह को टीका दिया, परन्तु पीछे से इनके छोटे भाई बहादुरसिंह ने किशनगढ़ और रूपनगढ़ पर कब्जा कर लिया तथा अभयसिंह महाराजा जोधपुर को अपना मददगार बना
लिया। बादशाह ने अजमेर के शाही अधिकारी को इनकी मदद के लिए भेजा। राजाधिराज बखतसिंह नागौर भी इनकी मदद पर थे। इन्होंने किशनगढ़ और रूपनगढ़ पर कई जगह अपने थाने बिठा दिए और रूपनगढ़ को जा घेरा। इसी बीच महाराजा अभयसिंह की मृत्यु हो गई और उनका अयोग्य पुत्र रामसिंह गद्दी पर बैठा। उसके और राजाधिराज बखतसिंह के आपस में युद्ध छिड़ गया। इधर सामंतसिंह ने भी गलती कर अपने रामसिंह की मदद हेतु भेजा, जिससे बखतसिंह इनके विरुद्ध हो गया बखतरसिंह जब जोधपुर का राजा हुआ तो सामंतरसिंह निराश होकर वृन्दावन चला गया। संघर्ष के अन्त में सरदारसिंह और बहादुरसिंह के बीच सुलह हो गई जिसके अनुसार रूपनगढ़ सामंतरसिंह को और किशनगढ़ बहादुरसिंह को मिला। सामंतसिंह इस सुलह के बाद भी वृन्दावन ही पुत्र सरदारसिंह को रहे। ये कृष्ण के बड़े भक्त थे। इनके कृष्ण भक्ति परक अत्यंत ही सरस पद और अन्य कविताएँ हैं।

    वि.सं. 1823 में सरदारसिंह के नि:सन्तान परलोक सिधारने पर दोनों राज्य एक हो गए। कुछ पीढ़ी बाद मदनसिंह किशनगढ़ राज्य के शासक हुए। मदनसिंह को
पोलो का बड़ा शौक था तथा वे स्वयं पोलो के एक अच्छे खिलाड़ी थे। इनके कोई पुत्र नहीं होने के कारण इनके काका महाराज जवानीसिंहजी के पुत्र यज्ञनारायणसिंह किशनगढ़ के राजा हुए। यह बड़े योग्य और धर्म-प्रेमी शासक थे। महाराजा यज्ञनारायणसिंह के जीवनकाल में ही उनके राजकुमार का निधन हो गया था । सुमेरसिंह आखेट प्रिय, खिलाड़ी और सहृदय महाराजा थे यह राजस्थान विधानसभा के सदस्य रहे। वर्तमान में इनके पुत्र ब्रजराजसिंह हैं।

अजमेर के राठौड़

अजमेर- (मेवाड़) प्रदेश में राठौड़ों के कई राज्य थे। ये राज्य मुगल बादशाह ने इन्हें दिएनथे। अंग्रेजों के अजमेर लेने के बाद यह राज्य सीधे उनके अधीन हो गए थे। इन ठिकानोंनमें  प्रमुख ठिकाने इस प्रकार हैं-

भिनाय- भिनाय के शासक जोधपुर के राव चन्द्रसेन के वंशज थे। चन्द्रसेन के पुत्र को बादशाह अकबर ने यह क्षेत्र जागीर में दिया था। भिनाय के राजा कल्याणसिंह बड़े मिलनसार तथा समाजसेवी थे।

मसूदा- मसूदा का ठिकाना मेड़तिया जगमाल के पुत्र हनुवंतसिंह को जागीर में मिला था।मइसमें से एक ठिकाना वागुसरी निकला। मसूदा के राव विजयसिंह बड़े प्रगतिशील विचारोंमके थे। इन्होंने मसूदा की अच्छी तरकी की।
खरवा- खरवा का ठिकाना जोधपुर के मोटेराजा उदयसिंह के पुत्र शक्तिर्सिंह के वंशजोंनका था। यहाँ अंग्रेजों के समय में राव गोपालसिंह थे जिन्होंने रासबिहारी बोस की ई.1918नकी क्रान्ति में राजस्थान का नेतृत्व किया था । अंग्रेजों ने इन्हें कैदकर ठिकाना जब्त कर लिया था फिर इनके पुत्र गनपतसिंह को यह ठिकाना वापस दिया था। इसी प्रकार जोधा राठौड़ों के पींसागन, वांदनवाड़ा, वघेरा, कैरोठ और जूनियां आदि ठिकाने थे।।खरवा के राव केशवसेन उच्चकोटि के निशानेबाज थे इन्होंने ओलंपिक में बन्दूक की निशानेबाजी में भारत की टीम का प्रतिनिधित्व किया था।

गुजरात के राठौड़

ईडर- गुजरात प्रांत की माहीकांठा एजेन्सी में ईडर सबसे बड़ा राज्य था। मारवाड़ केमराठौड़ों के मूल पुरुष राव सीहा के द्वितीय पुत्र सोनंग ने यहाँ के कोली राजा को मारकरमईडर पर वि.सं. 1339 के करीब कब्जा किया था। बाद में जोधपुर नरेश महाराजा।अजीतसिंह के 8वें और 9वें पुत्र आनन्दसिंह और रायसिंह ने वि.सं. 1783 में ईडर पर।अधिकार कर लिया।
राजा आनन्दरसिंह के बाद ईडर के राजा के लड़का नहीं होने पर अंग्रेजों नेमके महाराजा जसवन्तरसिंह जी द्वितीय के छोटे भाई महाराजा सर प्रतापसिंह को जोधपुरमईडर का राजा बना दिया था। इनके भी पुत्र नहीं होने पर इन्होंने दौलतसिंह को गोद लियामतथा उसे ईडर के राज्य का कार्यभार सौंप दिया तथा खुद जोधपुर में ही प्रशासक के रूपममें रहे। दौलतसिंहजी के पौत्र दलजीतसिंहजी राजस्थान क्षत्रिय महासभा के अध्यक्ष रहे थेनतथा समाज सुधार, शिक्षा आदि के कार्यों में बड़ी दिलचस्पी लेते थे ।नगुजरात में एक छोटा राज्य विजयनगर भी राठौड़ों का था।

मध्यप्रदेश के राठौड़ राज्य

अलीराजपुर- यह राज्य दक्षिणी मालवा में था कन्नौज नरेश महाराजा जयचन्द्र के छटठे वंशज अभयपाल के दो पुत्र थे- प्रजापाल और मदनपाल। बडा पुत्र तो खोर में ही रहा तथा छोटा पुत्र मदनलाल मालवा में आया । उसके प्रपौत्र देवपाल ने वि.सं. 1402 के करीब नीमाड़ में प्रसिद्ध नगर मान्धाता पर चौहान शासक को पराजित करके उस पर अधिकार कर लिया। बाद में चौहान शासक के सेनापति ने उसे मार डाला। उसका पुत्र जगदेव भाबरा परगना के गाँव मोटीपाल में जा बसा। इसके वंशज जगावत राठौड़ कहलाते हैं। इससे कुछ पीढ़ी बाद हेमचन्द्र हुआ वह मालवा के सूबेदार दिलावरखाँ गौरी से युद्ध केशरदेव पुत्र करता हुआ ई.1402 में काम आया। बाद में चंचलदेव हुआ। उसके छोटे ने पिता की मौजूदगी में ही ई.1464 के करीब जोबट राज्य की स्थापना की। मुख्य शाखा में प्रतापसिंह हुआ, उसने वि.सं. 1855 चैत्र बदि 8 शनिवार को अलीराजपुर को।अपनी राजधानी बनाया। यह राजा अंग्रेजों के अधीन हुआ। देश के स्वतंत्र होने के बाद
यह राज्य मध्यप्रदेश में विलीन हो गया ।

झाबुआ- इस राज्य का मूल पुरुष भीमसिह जोधपुर के राव जोधा से छठी पीढ़ी पर था ।मवि.सं. 1641 में बादशाह अकबर ने भीमसिंह को बदनावर का परगना जागीर में दिया।मइसके पुत्र केशवदास के कार्य से प्रसन्न होकर बादशाह जहाँगीर ने इसे राजा की पदवी दी। देश के आजाद होने के बाद इस राज्य का मध्यप्रदेश में विलयमहुआ।

रतलाम- इस राज्य के मूल पुरुष रतनसिंह जोधपुर नरेश मोटाराजा उदयसिंह के पौत्र महेशदास जिसकी जागीर में जालोर था, उसके पुत्र रतनसिंह को बादशाह शाहजहाँ ने
मालवा में जागीर दी। ई. 1658 में यह बागी शाहजादें औरंगजेब से उज्जैन के पास धर्मत।में लड़ते हुए काम आए। रतलाम के राजा सज्जनसिंहजी पोलो के अच्छे खिलाड़ी थे।नरतनसिंह के वंशज रतनोत जोधा कहलाते हैं। रतनसिंह के छोटे भाई फतहसिंह भी धर्मत में काम आए थे। उनके वंशज फतहसिंहोत जोधा कहलाते हैं, उनके मालवा में युद्ध कई ठिकाने थे । जिनमें मुख्य बिड़वाल, कोद, पचलाणां, रुणीजा आदि थे।

सीतामऊ- यह राज्य रतनसिंह के वंश में है जो कि रतलाम के राजा थे रतनसिंह से चौथे शासक केशवदास के समय में उनके एक अधिकारी ने रतलाम में जजिया कर वसूल करने वाले मुगल अधिकारी को मार डाला था। इस पर बादशाह औरंगजेब ने केशवदास को रतलाम की गद्दी से हटा दिया। केशवदास फिर भी मुगल सेवा करता रहा। कुछ समय बाद इनके काम से प्रसन्न होकर बादशाह औरंगजेब ने इन्हें नई जागीर और मनसब दिया। तब
इन्होंने सीतामऊ को अपनी राजधानी बनाया। बाद में मराठाकाल में ग्वालियर ने सीतामऊ पर अधिकार कर लिया था । अंग्रेजों से जब सीतामऊ की सन्धि हुई तब उन्होंने ग्वालियर को हटा दिया। सीतामऊ के राजा रामसिंहजी बड़े ही योग्य शासक थे। ये कई वर्षों तक
राजस्थान क्षत्रिय महासभा के अध्यक्ष रहे थे इनके बड़े महाराज कुमार रघुबीरसिंहजी इतिहास और हिन्दी साहित्य के बड़े विद्वान थे । इन्होंने ग्रंथों आदि का जो संग्रह किया वह बड़ा अद्वितीय है। इन्होंने सीतामऊ मे श्री नट नागर शोध संस्थान नामक संस्था की स्थापना की थी। यह राजस्थानी सहित्य, राजपूत इतिहास और संस्कृति का एक उल्लेखनीय संस्थान है।

सैलाना- यह राज्य रतलाम के राजा छक्रसाल के छोटे पुत्र प्रतापसिंह के वंशजों का है। उनकेनपुत्र जयसिंह ने वि.सं. 1773 में सैलाना को अपनी राजधानी बनाया। राजा
दलीपसिंहजी अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा में बड़ा सक्रिय भाग लेते रहे हैं।
जोबट- इस राज्य के संस्थापक केशवदास अलीराजपुर के राजा चंचलदेव के पुत्र थे।
इन्होंने वि.सं. 1521 में जोबट राज्य की स्थापना की थी।
ई.1194 में राव जयचन्द राठौड़ के पुत्र जजपाल कन्नौज से खोर (उत्तरप्रदेश)।आकर बस गए थे तथा ‘खोर के आसपास के क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। जजपाल
के पुत्र हरिशचन्द्र ‘महोई’ आकर बस बए थे। ई. 1226 में शम्सुद्दीन अल्तमस ने खोर पर आक्रमण किया और खोर का नाम बदलकर अपने नाम पर शमसाबाद रख दिया। इसके बाद जजपाल राठौड़ ने अपनी राजधानी ‘उसैत’ जिला बदायूं को बनाया उसैत में क्रमश: 19 राठौड़ राजाओं ने शासन किया ई.1555 के आसपास राजा प्रतापरुद्र ने विलासगढ़ (विलसड़) को अपनी राजधानी बनाया इनका उत्तराधिकारी इनका ज्येष्ठ पुत्र
वीरसिंह हुआ। विलसड़ से निकले राजपूत विलसड़िया राठौड़ कहलाते हैं। राजा वीरसिंह।के छोटे भाई राव उदयचन्द ने गढ़ी बनाकर फरुखाबाद जिले में ई. 1580 में मौधा नामक राज्य की स्थापना की।

फर्रुखाबाद जिले में जहाँ आज खमसेपुर आबाद है, राव उदयचन्द के मौधा शासन के समय सघन वन था। इस वन में शिकार के लिए घूमते समय मौधा के राजा उदयचन्द इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने वहाँ गढ़ी बनाने का आदेश दिया तथा खमसेपुर नामक गाँव बसाया। जब गढ़ी बनकर तैयार हो गई तब ई. 1590 के करीब राव
उदयचन्द मौधा छोड़कर खमसेपुर की गढ़ी में आ गए और उसे अपनी राजधानी बना ली। उत्तरप्रदेश में खमसेपुर की गढ़ी ही एक मात्र राठौड़ों की वह जगह थी जहाँ स्थापना सेनकरीब 300 वर्षों तक किसी मुगल, मराठा, पठान, नवाब और अंग्रेजों का आक्रमण
करने का साहस नहीं हुआ।

रायबरेली जिले के जायस गाँव में रहने के कारण वहाँ के निवासी या वहाँ से निकले राजपूत जायस राठौड़ कहलाते हैं। जायस राठौड़ उत्तरप्रदेश के रायबरेली, मथुरा आदि जिलों में बसते हैं। टहला के कुंवर जगन्नाथसिंह ने अपने नाम पर जगन्नाथपुर नामक
राठौड़ों का एक प्रसिद्ध गाँव बसाया था। जो उत्तरप्रदेश के जिला इटावा में स्थित है। राजा रामसहायसिंह ने 16वीं सदी में रामपुर नाम का नगर (जिला -एटा) बसाया था, जो राठौड़ों की प्रसिद्ध रियासत खमसेपुर के समकालीन थी। सुजरई नाम की उत्तरप्रदेश के राठौड़ों की रियासत जिला मैनपुरी थी। कन्नौज के चांदापुर, कीरतपुर, बरहुली,।जलेसर तथा नजरापुर आदि 24 गाँवों में रैकबार राठौड़ों की जागीरें धीं। इस तरह उत्तरप्रदेश में ‘रामपुर’जिला एटा, ‘खिमसेपुर’ जिला- र्फरुखाबाद, ‘सुजरई’ जिला-मैनपुरी राठौड़ों के प्रमुख ठिकाने थे। राठौड़ बंश का एक प्रमुख ठिकाना ‘रामपुरधमेड़ी’ जिला
बाराबंकी में था। जिला मिर्रजापुर में विजयपुर राठौड़ों का राज्य था। इस वंश के मूल पुरुष राजा उग्रसेन थे जो मणिकपुर के गहड़वाल राजा गूदनदेव के पुत्र थे। यहाँ के स्वामी मुगल बादशाहों के अधीन रहे थे इस राज्य से निकले हुए अन्य राठौड़ राज्य नौ गाँव खारेहट,
डाढीराज आदि थे। पंजाब में राठौड़ं का राज्य जुब्बल था। उड़ीसा में सराईकेला और खरसवान राठौड़ राज्य थे, इनका मानना है के इनके पूर्वजों ने दक्षिण भारत से आकर उड़ीसा में सिंहभूम इलाके में अपने राज्य स्थापित किए थे। इससे प्रतीत होता है कि दक्षिण भारत में राष्ट्रकूटों का जो महान साम्राज्य था उसके किसी राजकुमार ने वहाँ से आकर ये राज्य स्थापित किए होंगे। इनके वर्णनों में यह भी मिलता है कि आमेर के राजा भान जब बिहार उड़ीसा के सूबेदार थे, तब उन्होंने भी इनकी मदद की थी।

रेकवार

    रैकवार सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं। इनका गोत्र-भारद्वाज तथा प्रवर-भारद्वाज, बाह्हस्पत्य और आश्रिरस है। वेद-यजुर्वेद, शाखा-वाजसनेयी और सूत्र-पारस्कर गृह्यसूत्र है। ठाकुर बहादुरसिंह बीदासर लिखित क्षत्रिय वंशावली के अनुसार रैकवार, राठौड़ों में से निकले हैं। ये गुजरात से 15वीं सदी में अवध में गए । ये नीम की दांतौन नहीं करते हैं। प्राचीनकाल से कश्मीर राज्य में जम्बू के रैकागढ़ निवासी होने के कारण इन्हें रैकवार
क्षत्रिय कहा जाने लगा वर्तमान में इस वंश के क्षत्रियगण बाराबंकी, उन्नाव, हरदोई,नसीतापुर, बहराईच, फैजाबाद, गोरखपुर और आजमगढ़ जिलों में पाए जाते हैं। ये लोग भैरवानन्द की पूजा करते हैं।

राजस्थान में राठौड़ों की प्रसिद्ध शाखाएँ

  जोधा- ये जोधपुर के राव जोधा के वंशज हैं। इनके प्रसिद्ध ठिकाने जोधपुर में भाद्राजूण,
खैरवा, पाटोदी आदि थे।
महेचा- ये मल्लीनाथ के वंशज हैं। पहले ये स्वतंत्र थे तथा बाद में जोधपुर राज्य के अधीन हुए। इनके जसोल, बाड़मेर, नगर, सिंरोदरी गुड़ा आदि प्रसिद्ध ठिकाने थे।
चांपावत- ये राव जोधा के छोटे भाई चांपा के वंशज हैं, इनके प्रसिद्ध ठिकानों में जोधपुर में पोकरण था, जहाँ के सवाईसिंह बहुत प्रसिद्ध हुए। दूसरा एक ठिकाना आउवा
था, जहाँ के ठाकुर कुशालसिंह ने ई. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध किया था तथा जोधपुर के रेजीडेण्ट को मारा था। चांपावतों के जय
गीजगढ़, सांथा, कानौता तथा नायला के ठिकाने थे।
मेड़तिया- ये जोधा के पुत्र दूदा के वंशज हैं। इनका मेड़ता पर राज्य होने के कारण ये मेड़तिया कहलाए। इस वंश में भक्तवर मीरांबाई उत्पन्न हुई थी। इतिहास प्रसिद्ध वीरवर
जयमल इसी मेड़तिया वंश का था, जो बादशाह अकबर से लड़कर वीर गति को प्राप्त हुआ था। पहले मेड़तिया मुगलों के अधीन थे, जो बाद में जोधपुर राज्य के अधीन हुए। जोधपुर में इनके प्रसिद्ध ठिकाने रियां, आलनियावास (जहाँ के ठाकुर अजीतसिंह ने राज्य में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरूद्ध युद्ध किया था), कुचामन, बूड़सू तथा धाणेराव थे। धाणेराव उदयपुर राज्य के 16 प्रमुख ठिकानों में अतिप्रमुख माना जाता था। मेवाड़ में बदनौर इनका बड़ा ठिकाना था। उदावत- जोधपुर के राव सूजा के पुत्र उदा के वंशज होने से यह उदावत कहलाए। इनके प्रमुख ठिकाने रास, निमाज तथा रायपुर थे। कूंपावत- राव जोधा के बड़े भाई अखैराज के पुत्र कूंपा के वंशज कूंपावत कहलाए। इनका जोधपुर में मुख्य ठिकाना ‘आसोप’ था । आसोप के ठाकुर शिवनाथसिंह ने देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (सन् 1857) में अंग्रेजों से युद्ध किया था। जैतावत-राव जोधा के बड़े भाई अखैराज के एक पुत्र जैता के वंशज जैतावत राठौड़ कहलाते हैं। मारवाड़ में इनका मुख्य ठिकाना बगड़ी था।

कर्मसोत- राव जोधा के पुत्र कर्मसिंह के वंशज होने से ये कर्मसोत कहलाए। जोधपुर में इनका मुख्य ठिकाना खींवसर था।

करणोत- राव जोधा के पुत्र करण के वंशज करणोत राठौड़ कहलाते हैं। इस वंश में प्रसिद्ध देशभक्त वीर दुर्गादास राठौड़ हुए। इनका समदड़ी, वाघावास जोधपुर में तथाननटवाड़ा व सोडा जयपुर में दो ठिकाने थे।

बीका- राठौड़ों की बीका शाखा के वंशज बीकानेर में हैं। ये बीका के वंशज होने केनकारण बीका कहलाए। इनके मुख्य ठिकाने ‘महाजन और सांखू थे।

बीदावत- राव जोधा का एक पुत्र बीदा था, जो अपने बड़े भाई बीका के साथ बीकानेर का नया राज्य स्थापित करने आया था। बीदा के वंशज बीदावत कहलाते हैं। इनका
मुख्य ठिकाना बीदासर था।

कांधलोत- जोधपुर के राव जोधा का एक भाई कांधल था, जो अपने भरतीजे बीका केमसाथ गया था तथा उसने बीकानेर का नया राज्य स्थापित कराने में मुख्य भूमिका निभाई थी। कांधल के वंशज कांधलोत कहलाते हैं। कांधल के एक वंशज खेतसिंह का भटनेर।पर अधिकार था, जो अब हनुमानगढ़ कहलाता है। खेतसिंह को मुगल बादशाह हुमायू केनभाई कामरान ने घेरा था, तब खेतसिंह ने जौहर किया और युद्ध करते हुए वीर गति कोनप्राप्त हुआ। काधलोतों के मुख्य ठिकाने रावतसर, चूरू और भादरा थे। उड़ीसा में सिंहभूमि के राठौड़ इस वंश में दो राज्य मुख्य हैं-सराईकेला और खरसवान । इनके प्राचीन लेखादि से ये मानते हैं कि यह राठौड़ वंश सिंहभूमि में संवत् 750 में दक्षिण से आया। इससे यह प्रतीत होता है कि ये दक्षिण के राष्ट्रकूट वंश से सम्बन्धित हैं। इसके बाद दूसरे राठौड़ वंश का वर्णन मिलता है जो सिंहभूमि में आए। इनमे पहला व्यक्ति द्रपनारायणसिंह था। इस क्षेत्र में जो वंश राज कर रहा था, वह एक प्राचीन वंश था। उसी वंश का एक राजा महाभारत के युद्ध में अर्जुन के हाथ से मारा गया था। इस समय जो इस वंश का राजा था, उसके कोई संतान नही थी। द्रपनारायणसिंह ने इस भू-भाग पर अधिकार कर सिंहभूमि में राठौड़ राज्य की स्थापना वि.सं. 1262 (ईस्वी 1205) में की। इसके पौत्र काशीरामसिंह ने पोरहट का किला वि.सं. 1272 में बनाया।

    इसके कई पीढ़ियों बाद नरपतसिंह प्रथम हुआ, जो लक्ष्मीनारायणसिंह द्वितीय का पुत्र था। इसके समय में काला-पहाड़, जो एक ब्राह्मण था, इसने उड़ीसा की एक नवाब की लड़की से विवाह कर लिया था। फिर उसने ब्राह्मणों से कहा कि उसको भी हिन्दू बना लो, परन्तु ब्राह्मणों ने इसको भी हिन्दू धर्म से निकाल दिया तब यह मुसलमान बन गया। इसने हिन्दुओं के बहुत से मन्दिर तोड़े और अनेक ब्राह्मणों का मारा। कालापहाड़ ने जयपुर (उड़ीसा का) के शासक मुकन्ददेव पर हमला किया और उसे परास्त करके मार डाला। फिर इसने जगन्नाथपुरी के मंदिर पर आक्रमण किया| पुजारियों ने जगन्नाथजी की
मूर्ति को चिलका की झील में ले जाकर छिपा दिया। इसने जगन्नाथपुरी में काफी लोगों का कत्ल करवाया। राजा नरपतसिंह के समय में कालापहाड़ का काफी आतंक चलता रहा। नरपतरसिंह की चार पीढ़ी बाद रणजीतसिंह राजा हुआ। इसके समय में भी काफी बगावतें हुईं तथा इनके कई चाचाजनों को मार डाला गया और इनके जयपुर एंव पोरहाट के राजमहलों को जला दिया गया । रणजीतसिंह उड़ीसा से भागकर राजस्थान में जोधपुर
में मोटाराजा उदयसिंह के पास मदद के लिए पहुँचा।।उदयसिंह ने कोई मदद नहीं दी और उससे कहा कि तुम आगरा बादशाह अकबर के पास जाओ। इसकी आगरा में आमेर के।राजा मानसिंह कच्छवाहा से भेंट हुई, उन्होंने रणजीतसिंह को बड़ा आश्वासन दिया और बादशाह अकबर से भेंट करवाई। बादशाह की आज्ञा से उड़ीसा को विजय करके रणजीतसिंह को सिंहभूमि का फिर से स्वामी बनाया गया । यह वि.सं. 1647 (ईस्वी 1590) में स्वामी हुआ। इसके दो विक्रमसिंह ने सराईकेला का अलग राज्य कायम किया। सराईकेला राज्य में से ही अलग खरसवान का राज्य निकला। ईस्वी 1205 से देश के आजाद होने के बाद राज्यों के।विलय होने तक राठौड़ों के ये दोनों राज्य सराईकेला और खरसवान कायम रहे। पुन: राजा बना । इससे आठ पीढ़ी बाद जगन्नाथसिंह तृतीय सिंहभूमि का पुत्र थे- बड़ा पुरुषोत्तमसिंह द्वितीय और छोटा विक्रमसिंह प्रथम ।

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