राजपूत का इतिहास

राजपूत का इतिहास

भारतीय इतिहास में भारत के लिए हिन्दुस्तान शब्द का प्रचलन मुस्लिम काल में हुआ । इसी प्रकार सनातन धर्म को हिन्दूधर्म कहा जाने लगा तथा क्षत्रियों के लिए राजपूत शब्द काम में लिया जाने लगा । राजपूत या रजपूत शब्द संस्कृत के राजपुत्र का अपग्रंश अर्थात् लौकिक रूप है । प्राचीन काल में राजपुत्र शब्द जातिवाचक नहीं, अपितु क्षत्रिय राजकुमारों या राजवंशियों का सूचक था, क्योंकि बहुत प्राचीन काल से प्राय: सारा भारतवर्ष क्षत्रिय वर्ण के अधीन था । कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ , कालिदास के काव्यों एवं नाटकों अश्वघोष के ग्रन्धों बाणभट्ट के हर्ष चरित तथा कादम्बरी आदि पुस्तकों एवं प्राचीन शिलालेखों तथा दान-पत्रों में राजकुमारों और राजबंशियों के लिए राजपुत्र शब्द का प्रयोग होना पाया जाता हे ।

महमूद गजनवी के समय तक राजपूत शब्द प्रचलन में नहीं था । क्योंकि उसके साथ अलबेरुनी भारत आया था, जो बडा विद्वान था । उसने भारत से सम्बन्धित करीब बीस पुस्तकें अरबी में लिखी हैं । उसने भारत की विद्याओं, धर्मों, रीति-रिवाजाँ आदि का बड़ा अध्ययन किया था । उसने अपने ग्रन्थ ‘अलबेरुनी का भारत’ में क्षत्रियों का वर्णन किया है, परन्तु उसने कहीँ भी ‘राजपूत’ शब्द का प्रयोग नहीं किया है । उसने मालव नरेश भोज के वंश का उज्जैन से जाना लिखा है तथा विक्रमादित्य का भी वर्णन किया है, हूणों तथा क्षत्रियों दोनों का उसके ग्रंथ में जिक्र हैँ।

अलबेरुनी की मृत्यु ई. 1048 में हुई थी । गोरी आदि के समय में राजवंशी होने के कारण उन्हें ‘राजपूत’ नाम से सम्बोधित किया जाने लगा । इसके बाद धीरे-धीरे यह शब्द जातिसूचक होकर मुगलों के समय अथवा उससे कुछ पूर्व सामान्य रूप से प्रचार में आने लगा ।

History of rajput
History of rajput

आर्य क्षत्रियों में तीन वंश थे-सूर्यबंषज्जा, चन्द्रबंश और नागवंश, जिसका वर्णन पूर्व में किया जा चुका है । बौद्ध-धर्मं के पतन के समय ऋषियों ने आबूपर्वत पर अग्नि से जिन क्षत्रियों को संस्कारित कर बौद्ध-धर्म से पुन: हिन्दू बनाया, वे अग्नि वंशी कहलाए। इनमें क्रमश: चार वंश थे-परमार, प्रतिहार, सोलंकी और चौहान । इस वर्णन को देखकर विदेशी विद्वानों की धारणा हुईं कि ये वंश विदेशों से आने बाली जातियों में थे, जिन्हें अग्नि द्वारा संस्कारित कर हिन्दू बनाया गया । उनकी इस मान्यता क्रो कुछ हिन्दुस्तानी विद्वानों ने भी मानना शुरू कर दिया । आगे चलकर यह मान्यता इतनी बढती गई कि वे इन चारों के अलावा अन्य राजपूत वंशों को भी विदेशी ही मानने लगे; कुछ विदेशी और कईं भारतीय विद्वान इस मान्यता को सही नहीं मानते, बल्कि राजपूतों को आर्य क्षत्रियों कीं ही सन्तान मानते हैँ ।

पहले यहाँ उन विद्वानों के विचार की बात करते है जो राजपूतों को विदेशी शक, कुशान और हूणों के वंशज मानते हैं । कर्नल जेम्स टोंड पहला व्यक्ति था, जिसने राजस्थान का इतिहास वर्तमान ढंग से लिखा। जब राजस्थान का इतिहास लिखने के लिए उसने अध्ययन प्रारम्भ किंया,तब उसे राजपूतों के अनेक रीति-रिवाज शकों के समान प्रतीत हुए। वह लिखता है कि राजपूत सूर्य की उपासना करते हैँ जो कि शक भी करते थे । राजपूत अश्वमेध यज्ञ करते थे, जो शक भी करते थे । इन दोनों में ही सती प्रथा थी । राजपूतों को घोडा व तलवार बडे प्रिय थे तथा वे इनकी पूजा करते थे । इसी प्रकार शक भी उन्हें पूजते थे । राजपूत मदिरा प्रिय हैं और शक भी मदिरा प्रिय थे । शकों की पुरानी कथा इनकी पौराणिक कथा से मिलतीजुलती है । इन सब प्रमाणों को देखने से यह प्रतीत होता है कि राजपूत और शक एक ही वंश से निकले है ।

विलियम क्रुक : टॉड के ग्रन्थ का सम्पादन करते समय क्रुक ने राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में लिखा, ‘ अब यह निश्चय हो गया है कि बहुतसे वंशों की उत्पत्ति विदेशी विजेता शक और कुशानों से हुई । अधिक निश्चित यह है कि वे हूणों से उत्पन्न हुए, जिन्होंने गुप्त साम्राज्य को ई. 480 में समाप्त किया था । पूजर जो हूणों से सम्बन्धित थे, जब हिन्दू हो गए, तब उनके जो मुखिया थे, वे उच्व कुल के राजपूत हो गए। टोंड का ईं. 19.0 के संस्करण की प्रस्तावना ।

ए. एम. टी. जैक्सन – इसने कुक से प्रेरणा लेकर यह माना कि अग्नि कुल कहलाने वाले गूजर हैं । वह उसका आधार यह मानता है कि ‘ पंजाब दूर होते हुए भी वहॉ उनमें और खानदेश के गूजरों में कुछ पंवार कहलाते हैं और कुछ चहुआन । ‘ इसलिए दूसरे अग्नि कुल के दो वंश प्रतिहार ओर सोलंकी भी पूजर होने चाहिए। ये उन पूजरों में से होने चाहिए जिन्होंने दूसरे विदेशियों का नेतृत्व किया था ।

जे. केम्पबेल ने भी जेक्सन की तरह ही इस मान्यता को स्वीकार कर लिया कि अरब लेखक लिखते हैं, ‘खजर’ जोरजियन थे, वह मान्यता अब भी है । दक्षिणी आर्मोनियन पूर्व की और बढे थे, परन्तु वह खुद भी राजपूतों की गूजरों से उत्पत्ति के बारे में पूर्ण विस्वास नहीं करता था । उसने लिखा ‘आबू के पर्वत पर यज्ञ से जो चार आगणि कुल ब्राह्मणों को बौद्धों को विरुद्ध मदद करने के लिये शुद्ध किए गए थे, वे गूजर थे । उसका कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है ।

भांडारकर – भारतीय विद्वानों में भण्डारकर मुख्य है जिसने राजपूतों कौ हूणों के साथ आए गूजरों के वंश का माना है । वह यह तो मानता है कि कन्नौज के प्रतिहार घराने ने अपने लेखों में कहीं भी अपने को गूजर नहीं कहा (वैद्य 38) । वह कहता है कि राजोर में मिले एक लेख में एक गौण प्रतिहार घराने ने अपने को गुर्जर प्रतिहार कहा है । वह दूसरा प्रमाण देता है कि राष्ट्रकूट अपने लेखों में और अरबों ने अपने यात्रा-वर्णनों में कन्नौज के प्रतिहारों को गुर्जर कहा है ।

वह स्वीकार करता है कि चालुक्यों के सम्बन्ध में शिलालेखों में कोई प्रमाण नहीं मिलता, परन्तु यह देखते हुए कि बर्तमान गुजरात का गुजरात नाम तभी से हुआ, जबसे चालुक्यों ने उसे अपने अधिकार में कर वहाँ राज्य करमा आरम्भ किया । तब हमें मानना पड़ता है कि चालुक्य अवश्य ही गूजर थे । वह परमारों के विषय में कहता है, ‘हम नहीं जानते, परमार क्सि वंश के हैँ, परन्तु हमारी बुद्धि यही विस्वास दिला रही है कि वे विदेश से आए हुए लोगों के ही वंशज हैँ । चौहानों की उत्पत्ति भी गूजरों से हुई-ऐसा भण्डारका मानता है । इसके समर्थन में वह प्रमाण देता है कि उत्तर भारत में कुछ सिक्के मिले हैं, जिन पर नागरी में ‘ श्री वासुदेव बहमन’ और पेहलवी लिपि में ‘तक्कान् जाबुलिस्तान सर्पर्द लक्षन लिखा है, उसने वहमन को चहमन माना और इस कारण यह तर्क दिया कि प्राचीन समय में व और च में इतना साम्य था कि एक के बदले दूसरे अक्षर का लिखा जाना सम्भव है ।

यह कहने की आवश्यकता नहीँ थी, चहमन ही चाहमान है और सिक्के में उल्लेखित वासुदेव चाहमान वंश का ही है । ‘पृथ्वीराज विजय’ में लिखा है कि शाकम्भरी वंश का जनक वासुदेव था । अत: वासुदेव और सिक्के का चहमन वासुदेव एक ही है । राजशेखर ने ‘प्रबन्ध कोष’ में वासुदेव को चाहमान वंश का जनक कहा है ओर उसका समय विक्रम 608 बताया है । कोष में कुछ पहले का सन् दिया गया है, परन्तु इस सिक्के से जिस पर ई. 6 27 के आसपास के दूसरे परवेज खुशरू के सिक्के की हूबहू प्रतिमा देखकर यह सन् 628 ही मानना ठीक है ।

उसने हिमालय के शिवालीक प्रदेश में अहिच्छत्रपुर नगर और सपादलक्ष देश को माना है । वह यह भी कहता है कि इसी भ्रू-भाग से ब्राह्मण और क्षत्रिय दक्षिण की ओर बढकर सर्वत्र फेल गए ।

भण्डारकर मानता है कि पंजाब के फिरोजपुर इलाके के गूजर मानते हैँ कि वे धार से आए इसलिए परमार गूजर हैं । इसी प्रकार अन्य तीनों अग्नि वंश भी गूजर हैँ ।

भण्डारकर राजपूतों को गुर्जरवंश से उत्पत्र हुआ मानता है, परन्तु गुर्जरवंश कोई राजवंश नहीं था, क्योंकि शक, हूम आदि वंशों के वर्णन शिलालेखों में मिलते हैँ, साहित्यिक ग्रंथों में भी मिलते हैं, और उनके सिक्के भी उपलब्ध हैं, परन्तु गुर्जरबंश के किसी शासक का न तो शिलालेखों में कहीं वर्णन है न साहित्य में है तथा न इनके कोई सिक्के उपलब्ध हुए हैँ । कुछ लेखकों ने यह गलत धारण बना ली है । अत: जब इनका कोई प्रमाण ,मिलता है तो हम गुर्जरों का शासक होना नहीं मान सकते ।

भगवानलाल इन्द्रजी का मानना है कि राजपूत गूजरों से निकले हैँ । वह गूजरों का भारत में आना कनिष्क के समय में मानता है । बी. ए. स्मिथ लिखता है कि प्राचीन लेखों में हूणों के साथ वर्तमान के गूजरों के नाम भी मिलते हैँ, इससे अनुमान होता है कि प्राचीनकालीन गूजर बाहर से आए हुए थे और उनका श्वेत हूणों से निकट का सम्बन्थ होना सम्भव है । उन्होंने राजपूताने में अपना राज्य स्थापित कर भीनमाल को अपनी राजधानी बनाईं । समय पाकर भीनमाल के गूजर प्रतिहार राजाओ ने कत्रोज क्रो जीतकर भारत में अपने साम्राज्य की स्थापना की । भडीच का छोटा राज्य भीनमाल की एक शाखा थी ।

यहां उस विषय की ओर ध्यान देना आवश्यक हैं जिनके विषय में बहुत दिनों से संदेह था, परन्तु अब प्रमाणों द्वारा निश्वित हो गया है कि राजपूताना और गंगा नदी के उत्तरी प्रदेश में वहां के निवासियों के साथ लडाई-झगडे रहने पर भी गुर्जरों का राज्य बिल्कुल नष्ट नहीं हो गया था । यद्यपि बहुतसे नष्ट हुए, परन्तु कई बचे भी रहे थे, जो वहां के निवासियों में मिल गए और अब भी उनकी बहुतसी सन्तानें मौजूद हैँ । इनसे पहले शक और पूची (कुशान) लोग भी इस विदेशी जाति की तरह शीघ्र ही हिन्दू धर्म में मिलकर हिन्दू बन गए । पडिहार और उत्तर के कई दूसरे प्रसिद्ध राजपूत वंश इन्हीं जंगली समुदायों से निकले हैँ जो ईस्वी शताब्दी कीं पाँचवी या छठी शताब्दी में हिन्दुस्तान में आए थे ।

उत्तरी भारत के प्राचीन और मध्ययुगीन इतिहास में अन्तर डालने वाली मुख्य बात राजपूत वंशों की प्रधानता होने से उसके स्पष्टीकरण की इच्छा उत्पन्न होती है । प्रश्न करना सहज है, परन्तु उत्तर देना सहज नहीं है, और यह विषय बिल्कुल अनिश्चित होने से उसका सन्तोषजनक निर्णय नहीं किया जा सकता । आठवीं और नवीं शताब्दी में राजपूत राज्यों का एकाएक उद्गम एक आश्चर्य की बात है । प्राचीन राजवंशों के वर्ण या जाति के बारे में कुछ भी पता नहीं है । अशोक और समुद्रगुप्त के कुटुम्ब किस हिन्दू समाज के थे, यह भी ठीकठीक नहीं बतलाया जा सकता। पिछले समय के सब राजपूत अपने को प्राचीन क्षत्रिय वर्ण का होना मानते हैं । वास्तव में पिछले राजपूतों के वंशों के समान क्षत्रिय वंश भी प्राचीन काल में विद्यमान थे । इस मध्यकाल कीं तरह पहले भी नए… नए राज्य बने, परन्तु उनके लिखित प्रमाण नष्ट होते गए, फिर भी कुछ नामी वंशों की यादगार मात्र बनी रही । ‘क्षत्रिय’ शब्द सदा से संशयात्मक अर्थ का द्योतक रहा है । उससे केबल

राज्य करने वाली जाति का ही बोध होता है, कभीकभी ब्राह्मण जाति के भी राजा हुए, परन्तु राज दरबार में ब्राह्मण विशेषकर राजा नहीं, बल्कि मंत्री ही हुआ करते थे । चन्द्रगुप्न मौर्य को क्षत्रिय ही माना गया है । उसका मम्बी कौटिल्य ब्राह्मण ही था ।

प्राचीन और मध्यकाल में वास्तविक अन्तर यही है कि अब केबल मध्यकाल कीं दन्त कथाएँ ही देखने को मिलती हैँ । मौर्य और गुप्त वंशों के बारे में विशेष कुछ पता नहीं चलता, केवल पुस्तकों, शिलालेखों और सिक्कों के ही आधार से उनकी स्मृति मात्र शेष है, जबकि मध्यकाल के राजवंशों कीं असलियत बहुत कुछ प्राप्त है । टॉड और दूसरे प्राचीन लेखकों ने लिखा है कि राजपूत विशेषकर शक हैँ । आजकल के यथेष्ट शोध से भी उनके कथन की पुष्टि होती है और यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि कईं मुख्यमुख्य राजपूत वंशों में विदेशियों का रुधिरमिश्रण है । उन जातियों से राजपूतों का निकट सम्बन्ध पाया जाता है । ईसा पूर्व की दूसरी शताब्दी में बाहर से आने वाली जाति, जिसके विषय में इतिहास साक्षी देता है, शक थी । उसके बाद पूची या कुशान जाति ईसा की पहली शताब्दी में इधर आई । इन जातियों तक तो वर्तमान राजपूत वंश अपनी वंशपरम्परां का ठीक से तारतम्य नहीं जोड सकते । निरसंदेह शक और कुशान बंशी राजाओं ने जब हिन्दूधर्म स्वीकार कर लिया, तब वे हिन्दू जाति की प्रथा के अनुसार क्षत्रियों में मिला लिए गए। अब तक यहीँ जानने में आया है कि बहुत काल पीछे वे हिन्दुओं में मिला लिए गए हों, किन्तु इसके लिए हमारे पास कोई प्रमाण नहीं है ।

ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार शक और कुशान के बाद तीसरी बाहरी जातियों में हूण या श्वेत हूण थी, जो ईसा की पाँचवीं या छठी शताब्दी में भारत में आई । हूणों ने हिन्दू संस्थाओं और हिन्दू राजनीति को अधिकतर हिला दिया था । फिर उक्त महाशय ने यह निष्कर्ष निकाला है कि हूण जाति ही विशेषकर राजपूताना और पंजाब में स्थायी रूप से आबाद हुईं, जिसका बड़ा विभाग पूर्जर थे, जो अब पूजर कहलाते हैँ ।

उन विदेशियों में से जो साधारण श्रेणी के थे, पूजा कहलाए, जो राजपूतों की अपेक्षा हीन कुल के माने गए। सुदूर दक्षिण में भिन्नभिन्न जो एतद्देशीय अथवा प्राचीन जातियों के घराने रहते थे, वे भी उसी प्रकार हिन्दू बन गए और उनका भी ३ गौरव बढा, जिस कारण गौड, खरवास, चंदेल, गहरवार तथा अन्य प्रसिद्ध राजपूत वंशों के नाम से प्रसिद्ध हुए । इन वंशों ने अपने उच्च वंशज होने के प्रमाण में वंशावलियॉ तैयार कीं, जिनके हिसाब से वे सूर्य और चन्द्र की सन्तान हैं। क्षत्रिय या राजपूत जाति अपने युद्ध कर्म से ऐसी कहलाई और उसमें समस्त प्रकार के वंश हैँ, जिन्होंने हिन्दू रस्यों को मानका राज्य शासन का कार्य हाथ में लिया । इसीलिए राजपूतों में भित्र-भिन्न वंशों के लोग इकट्ठे हो गए। वर्तमानकाल के राजपूत वंश या तो पाँचवी-छठी शताब्दी में आए हुए विदेशी आक्रमणकारियों की -संतान में से हैँ अथवा गोड या भर नामक आदिम निवासी लोगों की संतान है । ‘

उपर्युक्त विद्वानों के अतिरिक्त और भी कुछ ऐसे विद्वान हैं जो राजपूतों की गुर्जरों से उत्पत्ति मानते हैं ! हनंमैं प्रमुख कनिंघम , होनंरेल , बैडनं पाउंलं , बागेही आदि हैं!

प्रमुख विदेशी तथा भारतीय विद्वानों के विचारों से पाठकों को अवगत कराने के उपरांत अब हम राजपूतों क्रो विदेशी शकों, कुशरनों और हूणों की सन्तरन नहीं मरन कर उन्हें विशुद्ध भारतीय आर्य क्षत्रिय मानने वाले विद्वानों के विचार प्रस्तुत करते हैँ । हन विद्वानों में प्रमुख हैँ-वैद्य, ओझा, कृष्णास्वामी अरयगर, डर दशरथ शर्मा, डर. मंगोली, मुन्सी, भाटिया अरदि ।

राजस्थान के इतिहास के प्रकाण्ड विद्वान डर. गौरीशंकर हीररचन्द ओझर अपने ‘राजपूताने के इतिहास’ के प्रथम भरम में लिखते हैँ…’राजपूतो को विदेशी मानने वालों में अरज तक कोई भी विद्वान सप्रमाण यह नहीं बतला सका कि शक, कुशान या हूणों से अमुक-अमुक राजपूत वंशों की उत्पत्ति हुईं । एक समय राजपूतों को गूजर मानने कर प्रवाह ऐसे वेग से चला कि कई विद्वानों ने चरवड़र, पडिहरर (प्रतिहार) , परमरर, चौहान, तंवर, सोलंकी, कछवाहा आदि राजपूतों को पूजर होनर बतलाने के सम्बन्ध में कई लेख लिख डाले, परन्तु अपनी मनमानी कल्पना की घुड़दौड़ में किसी ने इन बातों कर तनिक भी बिचार नहीं किया कि प्राचीन शिलालेख आदि में उनके वंश परिचय के विषय में क्या लिखा है । दूसरे समकालीन राजवंश उस बिषय में क्या मानते थे? हेनसांरर ने उनको किस वंश कर बतलाया है? और यही कहते गए कि ये तो पीछे से अपने को क्षत्रिय मानने लग गए हैँ । ऐसे प्रमाणरहित काल्पनिक कथन जब तक सप्रमाण यह न बतला सके कि अमुक राजपूत जाति, अमुक समय, अमुक गूजर वंश से निकली तब तक स्वीकार नहीं किए जर सकते ।

कुछ विद्वान वर्तमान राजपूत वंशों को आर्य क्षत्रिय न मानने में यह भी प्रमाण उपस्थित करते है कि पुराणों में लिखा है कि शिशु नागवंश के अन्तिम राजा महानदी के पीछे प्राय: शूद्र और अधर्मी राजा होंगे । इस प्रश्न क्रो पाठकों के ध्यान में सम्यक प्रकरर से बताने के लिए इतनर कहना उचित समझते हैं कि वास्तव में पुराणों में इस विषय में क्या लिखा है और काल पाकर उस लेख ने कैसर रूप धारण कर लिया है? मत्स्य, वायु, ब्रह्माण्ड, भागवत और विष्णु पुराण में लिखा है कि ‘महानदी कर पुत्र’ पहरपदृम (नंद) शुद्रा स्त्री से उत्पन्न होकर अपने 88 बर्ष के शासन काल में क्षत्रियों को नष्ट करेगा । उस महापद्म के सुभाल्य आदि आठ पुत्र 12 वर्ष राज्य करेंगे । तत्पश्चात् कौटिल्य ( विष्णुगुप्त, चाणक्य) ब्ररह्यण इन नव नंदों को नष्ट करेगा और मौर्य (चन्द्रगुम) राजा होगा । जग्गय पेट के शिलालेख में जो दिसं. की तीसरी शताब्दी के आस-पास कर है, माढ़री पुत्र श्री वीर पुरुषदत्त को इक्ष्वाकु वंशी बतलाया है । इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि नंद और मौर्य वंश के पीछे भी क्षत्रिय राजवंश विद्यमान थे । शक संवत् 310 (वि.सं. 44 5 ई. सन् 388) से लगाकर वि.सं. की 1 6 वीं शताब्दी तक सोलंकियों के अनेक दानपत्र, शिलालेख तथा कई ऐतिहासिक ग्रन्थ मिले हैं, जिनमें उनका चन्द्रवंशी और पांडवों कीं सन्तान होना जगहजगह बतलाया है । दक्षिण में बादामी के सोलंकी राजा पुलकेश के वर्णन में चीनी यात्री हेनसांग लिखता है कि राजा जाति का क्षत्रिय है, उसका नाम पुलकेशी है ।

राजपूत मात्र पें स्वदेश भक्ति और स्वामी-धर्म ये दो उत्कृष्ट गुण प्राचीन काल से चले आ रहे है । राजपूताने के इतिहास में ऐसे सैकडों उदाहरण मिलते हैं कि तन-मन और धन से अपने स्वामी का साय देने और अपने देश की रक्षा करने में हजारो राजपूत सरदारों ने अपने प्राण न्यौछावर किए हें ।

स्वामीधर्म से बंधे हुए सुप्रसिद्ध सरदार दुर्यादाप्त आदि ने अनेक आपत्तियाँ सहकर भी अपने स्वामी महाराजा अजीतसिंह कीं रक्षा की । शेरशाह यूरी के भय से मारवाड़ के राव मालदेव के रणभूमि से हट जाने पर भी उनके सामंत जैता व कूंपा आदि राठौड सरदारों ने सहसो राजपूतों सहित समरागण में वीर राति पाई ।

राजपूत प्राचीन क्षत्रियों के ही वंशधर हैँ और जो लेखक ऐसा नहीं मानते, उनके कथन प्रमाण-शून्य हैँ ।

चिन्तामणि विनायक वैद्य राजपूतों को भारतीय आर्य ही मानते हैँ । उनके विचार इस प्रकार हैं, ‘इस समय में जिनका उदय हुआ और जिन्होंने कम से कम चार सौ बर्ष तक मुसलमानों के आक्रमण का प्रतिकार किया, वे राजपूत कौन थे और कहौं से आए? वे भारतवासी आर्य और वैदिक आर्यों के अत्यन्त प्रतापी वंशज थे । उन्होंने बडी वीरता से अपने सनातन धर्म की रक्षा की । इसलिए उम्हें ‘हिन्दू धर्म रक्षक’ कहना अनुचित न होगा । कितने ही यूरोपीय और इस देश के भी इतिहास संशोधक कहते हैँ कि राजपूत मलेच्छ थे, जिन्होंने हिन्दू धर्म स्वीकार किया, अर्थात् वे हूण, शक, यूची अथवा जीटी जातियों के बचे बचाए लोग थे ।
अपने पूर्वजों के घर्म की रक्षा के लिए वैदिक आर्यों के अतिरिक्त और कौन लोग प्राण हथेली पर लेकर लड सकते है? राजपूत वेदिक आर्यों के ही वंशज हैं, उनकी परम्परा भी यही बता रही है कि वे सुप्रसिद्ध तूर्य और चन्द्रकुल में उत्पन्न हुए थे । तीसरा प्रमाण यह है कि सन् 1909 (वि. 1 966) की जनगणना के समय मानव जाति शास्त्र के अनुसार चेहरा और सिर नापने पर राजपूत आर्यों के ही वंशज सिद्ध हुए । उनकी उठी हुई और सरल नासिकाएँ, लम्बे सिर और ऊँचे कव आर्यत्व के द्योतक हैं । समस्त पृथ्वीतल पर आर्यों की यही पहचान मानी जाती है । नेसफील्द, इबेरसन आदि यूरोपीय विद्वानों को इस सिद्धान्त की सत्यता में बिल्कुल सन्देह नहीं है कि राजपूत आर्य हैं और वैदिक काल में हिन्दुस्तान में बसे हुए प्राचीन क्षत्रियों के वंशज हैं ।
परन्तु मानव भेद शास्त्र परम्परा और सम्भव-असम्भव की उपेक्षा कर कुछ यूरोपीय इतिहासकार और इस देश के भी कुछ इतिहाससंशोधक यहीँ समझ रहे हैँ कि हिन्दुस्तान के इतिहास की रंगभूमि पर अभी अवतीर्ण हुए ये क्षत्रिय विदेशी असंस्कृत वंश से उत्पन्न हुए हैँ । इसी मत को पुष्ट करने का वे प्रयत्न भी करते रहते हैं । इसका प्रथम प्रसार राजपूतों के प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल टोंड ने किया । उसके समय में इतिहाससंशोधन और मानव जाति शास्त्र आरम्भिक अवस्था में थे । कदाचित् उस समय उनका जन्म भी नहीं हुआ था । परन्तु यह आश्चर्यजनक ही नहीं, शोकजनक बात है कि अब तक ऐतिहासिक साधनसामग्री भरपूर उपलब्ध होने और मानव जाति शास्त्र के फूर्गोंन्नत होने पर भी सर विसेपट स्मिथ जैसे इतिहासकार इसी कल्पना पर डटे हुए हैं ।

मध्ययुगीन और अर्वाचीन काल के हिन्दुस्तान के इतिहास में जिन्होंने कीर्ति सम्पादन की, वे राजपूत वंश पूल में आर्यवंशीय थे या सीथियन अथवा द्राविडी-वास्तव में यह महत्वपूर्ण नहीं है । उनकी शूरता और दाक्षिण्यप्रियता में किसी का मतभेद नहीं हो सकता। उनकी पूर्व परम्परा को हीन मान लेने पर भी उनका महत्व घट नहीं सकता। हम तो इस प्रश्न को केबल ऐतिहासिक दृष्टि से देखते हैं । देखना यही है कि राजपूतों की उक्त परम्परा ऐतिहासिक दृष्टि से सही है या नहीं ।
गुर्जर विदेशी थे और पाँचवी सदी के लगभग हूणों के साथ इस देश में आए थे । स्मिथ ने भी स्वीकार किया है कि गुर्जरों के उस समय (पाँचवी-छठी शताब्दी) बाहर से भारत में आने का अनुमान करने योग्य प्रमाण भी नहीं मिले, उसे सिद्ध करना तो दूर की बात है । इसके अतिरिक्त गुर्जरों के पूर्वज माने गए खजरों के इतिहास से भी यह सिद्ध होता है कि वे स्वदेश छोडकर कभी नहीं आए ।” उनके वर्णनों से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि दोनों के स्वभाव परस्पर विरोधी थे । खजर अपने घरों में ही रहकर व्यापार द्वारा जीविकानिर्वाह करते थे और गुर्जर परिभ्रमणशील होते हुए पशुपालन और चरवाहे का कार्य करते थे । हिन्दुस्तान के गुर्जरों के रूपरंग से भी उनके आर्य होने में कोई सन्देह नहीं रह जाता । सारत: गुर्जरों के विदेशी होने की धारणा की नीति पर जो मत निश्चित किए गए हैं, वे सब निराधार हैं । जब ईस्वी सम् के कोई 300 बर्ष पूर्व ( वि. पू. 357) मेगस्थनीज भारत में आया था, उसने स्पष्ट लिखा है ‘भारतीयों में अपनी जाति को छोडकर अन्य जातियों में विवाह करने कीं आज्ञा नहीं है और कोई अपने पूर्वजों का पेशा छोडकर दूसरा काम नहीं कर सकता। तत्त्वज्ञान पुरुष इस नियम के अपवाद हैं । अपने गुणों से उन्होंने यह अधिकार प्राप्त किया है ।’ (मैंक क्रिण्डल कृत एनशेन्ट इण्डिया, पेगस्थनीज, पृष्ठ 8 586) इससे ज्ञात होता हे कि मेगस्थनीज के समय में जातियों के चारों ओर अनुछंघनीय सुदृढ प्राचीर का निर्माण किया जा चुका था । फिर यह केसे सम्भव है कि पेगस्थनोज के पश्चात् शकों का समावेश हिन्दू ” जाति में कर लिया गया?
अग्नि कुल के घरानों में सबसे प्रमुख घराना प्रतिहारों का है । कन्नौज़ के सम्राट प्रतिहार घराने के थे । श्री भण्डारकर इस बात को मानते हैं कि उन्होंने अपने लेखों में कहीं भी अपने को गुर्जर नहीं कहा है । उनके वत्सराज, नागभट्ट आदि नाम आर्यों के हैं । लेखों में उन्होंने अपने को सूर्यवंशी और उनके आश्रित प्रसिद्ध कविं राजशेखर ने उन्हें ‘रघुकुलतिलक’ कहा है । इन बातों से प्रतिहारों को गुर्जर सिद्ध करने के कारणों का श्री भण्डारकर को सूक्ष्म परीक्षण कर लेना चाहिए था ।
यह तो उन्होंने किया ही नहीं, उलटे उन्होंने यह माना कि विदेशों से आए हुए मलेच्छ शीघ्र ही हिंन्दुओँ में मिल गए और वे क्षत्रिय ही नहीं, सूर्यवंशीय क्षत्रिय मान लिए गए । यह प्रतिपादन करने के लिए उक्त बातों का विपर्यंस्त उपयोग किया है । सच बात तो यह है कि पुराणकाल और आठवीं शताब्दी ई. के हिन्दू भी आज की तरह वर्णसंकरता के विरोधी थे । वे गुर्जर थे, यह सिद्ध करने का कहीँ कोई भी प्रमाण नहीं है । अत: भण्डारका द्वारा -आविस्कृत्त और जैक्सन तथा स्मिथ द्वारा अनुमोदित इस असमर्थनीय कल्पना का कि ‘राजपूतों की उत्पत्ति विदेशियों से हुईं है’ इससे अधिक विस्तृत विवेचन करने की आवश्यक्ता नहीं है । राजपूत हिन्दुस्तान के प्राचीन वैदिक आर्यों के ही वंशज है । (चिन्तामणि बिनायक वैद्य-हिन्दू भारत का उत्कर्ष, भाग2 , पृ. 1049 )

गुर्जर मान्यता पर क. मा. मुंशी के विचार : गुर्जर शब्द पर विवाद है कि क्या यह शब्द गुर्जर देश, गुर्जर भूमि, गुर्जर राष्ट्र या गुजरात का द्योतक है? और दूसरी अर्थ में यह नाम इसके शासकों और निवासियों के लिए उपयोग में आया है या गुर्जर नाम वहाँ जो विदेशी जाति बसी, उसके कारण प्रयुक्त किया जाने लगा?

वर्तमान राजपूताना, गुजरात और मालवा के लोग एक-सी भाषा बोलते थे । जो एक तरफ महाराष्ट्र से तथा दूसरी तरफ मध्यप्रदेश से _मिलती थी । वेदिक काल में हैहय और तालजंध जातियाँ संयुक्त रूप से इस क्षेत्र में आबाद थीं । हैहय बाद में अपने को कलचूरी कहने लगे । इस प्रकार सारे देश की भाषा औऱ संस्कृति’ एक थी । ईसा की 6ठी शताब्दी पूर्व गुर्जर या गुजर शब्द किसी भी साहित्यिक रचना या प्राचीन लेखों में कहीं भी नहीं मिलता है, इसमे इनका विदेशी ढोना सिद्ध नहीं होता, ऐसा कुछ मान रहे हैं; इसके अलावा देश का नाम, राजा के लिए साहित्य और लेखों दोनों में प्रयुक्त होता था, जेसा कि लाट, मालवा, कुन्तल, वेदी आदि के सम्बन्ध में दुआ है ।

प्रारम्भिक समय से ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आर्यं-जातियॉ यहाँ रहती थीं और विदेशी हूण या फ्लार यहाँ की जातियों को जीतने, बसने और उनमें समाहित होने के लिए ‘ आए थे, तो उनका इतनी बडी संख्या में फैलाव नहीं होता । अगर गुजर विदेशी थे तथा उन्हें हिन्यूसमाज के क्षत्रिय वर्ग में मिला लिया गया, तब यह प्रश्न उठता है कि वे अपनी विदेशी संज्ञा ‘गुर्जर’ सम्बोधन को क्यों दोहराते हैं, यदि गुर्जर देश के राजपूत जूम और गूजर समूह थे, तो यहाँ कर प्राचीन क्षत्रिय समाज कहॉ गया? निष्कर्ष के तौर पर सातवीं शताब्दी सन 625 ई. के पुलक्वेशी द्वितीय के भी अपने को गुर्जर नहीं कहा है । उनके वत्सराज, नागभट्ट आदि नाम आर्यों के हैं । लेखों में उन्होंने अपने को सूर्यवंशी और उनके आश्रित प्रसिद्ध कविं राजशेखर ने उन्हें ‘रघुकुलतिलक’ कहा है । इन बातों से प्रतिहारों को गुर्जर सिद्ध करने के कारणों का श्री भण्डारकर को सूक्ष्म परीक्षण कर लेना चाहिए था ।

यह तो उन्होंने किया ही नहीं, उलटे उन्होंने यह माना कि विदेशों से आए हुए मलेच्छ शीघ्र ही हिंन्दुओँ में मिल गए और वे क्षत्रिय ही नहीं, सूर्यवंशीय क्षत्रिय मान लिए गए । यह प्रतिपादन करने के लिए उक्त बातों का बिपर्यंस्त उपयोग किया है । सच बात तो यह है कि पुराणकाल और आठवीं शताब्दी ई. के हिन्दू भी आज की तरह वर्णसंकरता के विरोधी थे । वे गुर्जर थे, यह सिद्ध करने का कहीँ कोई भी प्रमाण नहीं है । अत: भण्डारका द्वारा -आविस्कृत्त और जैक्सन तथा स्मिथ द्वारा अनुमोदित इस असमर्थनीय कल्पना का कि ‘राजपूतों की उत्पत्ति विदेशियों से हुईं है’ इससे अधिक विस्तृत विवेचन करने की आवश्यक्ता नहीं है । राजपूत हिन्दुस्तान के प्राचीन वैदिक आर्यों के ही वंशज है ।

चीनी यात्री ह्यू एनसांग ने माना है कि पश्चिमी भारत के देश दक्षिण से लेकर उत्तर तक इस प्रकार थे-महाराष्ट्र, भृगुकच्छ, मालवा, उज्जयनी, खेटक, आशापाली (वर्तमान अहमदाबाद), बछभी, सौराष्ट्र, आनर्त (उत्तरी गुजरात) गुर्जर । पंचतंत्र ग्रंथ में गुर्जर देश के प्रसंग में आया है कि वहॉ ऊंट उपलब्ध थे; इससे ज्ञात होता है कि गुर्जर राजपूताना का हिस्सा था ।

सन् 953 ईस्वी में भीनमाल के 1800 गुर्जर बाहर गए थे, उनमें ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय और शूद्र सभी जातियों थीं । इसलिए इस शब्द का आशय ब्राह्मण और अन्य जातियों से था, जो गुजरात देश से आए हैं, जैसे कि अन्य गौड द्रविड और कश्मीरी आदि ब्राह्मण हैं । इससे यह पुन: सिद्ध होता है कि गुर्जर देश से आकर बसने वाले गुर्जर कुहलाते थे। सन् 1050 ईस्वी में भोजदेव नै सरस्वती कथा वर्णन में गुर्जरों को इसी भूमि का निवासी बतलाया है । सन् 1 09 7 ईस्वी में विल्हण भी उत्तरी गुजरात के निवासी लोगों को गुर्जर ही बताता है । सन्’ 1124 ई में लोगों के लिए मुद्रित ‘ कुमुद चंद्रा’ नाटक में गुर्जर शब्द का प्रयोग देश के लिए किया गया था ।

सन् 1136 ईस्वी में चन्द्रसूरि ने मुनि सुब्रत स्वामी चरित्र में गुर्जर देश के नाम का प्रयोग किया है । पश्चिम की ओर एक छोटा पहाडी स्थान है, जिसे अरबुद या आबू कहा जाता है, जहॉ पर सच्चा ज्ञान रखने वाले को रविवार के लिए इच्छित फल मिल्या है । यह एक पूर्णसिद्ध भूमि है, जहॉ से विश्वामित्र जबरन वशिष्ठ ऋषि की गाय चुरा ले गया था । तब वशिष्ठ ने अपने योग बल से अग्नि कुंड से एक शूरवीर पैदा किया । जिसने दुश्मन की फौज का सफाया करने के बाद गाय वापस वशिष्ठ को लाकर दी थी । तव उस ऋषि ने प्रसव होकर आशीर्वाद दिया कि तूराजाओं का भी राजा होगा और तुम्हें परमार कहा जाएगा ।

प्रतिहारों के अनेक लेखों में उम्हें राम के भाई लक्ष्मण का वंशज लिखा है । चीनी यात्री ह्यू एन सांग ने अपने विवरण में लिखा है कि दक्षिण का राजा जन्म से क्षत्रिय है और उसका नाम पुलकेशी है । वह लिखता है कि इस राजा का प्रताप दूर-ढूँर तक फैला ३ हुआ है, उसकी प्रजा उसके प्रति स्वामीभक्त है ।

गुजरात स्थित वल्लभीपुर जो मालवा कौ भाँति ही उत्पादन में, मौसम में और लोगों के रहन-सहन में हर प्रकार से मेल खाता है-यड़ स्थान देवताओं के मन्दिरों और बौद्धों के सैकडों मठों के साथ धनसम्पदा से भी परिपूर्ण है । यह स्थानके अशोक के बनाए हुए स्तूपों से सुसज्जित है और बुद्ध की यात्रा की स्मृतियों संजोए है । यहॉ शासन काने वाला ध्रुबभट्ट एक क्षत्रिय है । यह मालवा का पूर्व शासक और शिलादित्य का भतीजा तथा सम्राट हर्षवर्धन का दामाद है ।

सन् 641 ईस्वी में चीनी यात्री ह्यूएन संग ने गुर्जर देश की राजधानी भीनमाल का भ्रमण किया, तो पाया कि यह देश 833 बी के घेरे में बसा हुआ है और राजसिंहासन पर एक युवक राजा है, जो जाति से क्षत्रिय है और उसकी उम्र 20 वर्ष है । वह राजा बुद्धिमान और साहसी है । वह बुद्ध के सिद्धान्तो पर अमल करता है और योग्य लोगों की कद्र करता है ।

मुंशी लिखते हैँ कि मलेच्छो के आक्रमण किए जाने के बाद भी आर्य उत्तरोत्तर उत्थान करते रहे । इसलिए ही इंसे आर्यावर्त कहा जाता है । मलेच्छ वहॉ लम्बे समय तक ठहर नहीं सकते थे, लेकिन शौर्य के धनी क्षत्रिय राजाओं ने मलेच्छी की भूमि को जीता और वहाँ चारा वर्णो की स्थापना की तथा देश में राष्ट्र के लिए उत्सर्ग होने की भावना जागृत की । भारतवर्ष एक कर्मभूमि थी।

भारतीय क्षत्रिय ” उच्च शिक्षा प्राप्त और शाखों के ज्ञाता थे । उनमें अधिकांश ब्राह्मण ऋषियों के शिष्य थे । राजा को वेर्दो, उपवेर्दो, स्मृतियों और पुराणों का ज्ञाता होना ज़रूरी था । अलबेस्ली ने भी कहा है कि क्षत्रियों को ब्राह्मण वेद पढाते थे ।
हर्ष चरित्र में वर्णन है कि फौज में मुख्यत: क्षत्रिय होते थे । फौज़ के अधिकारी, मुख्य प्रशासनिक अधिकारी वेतन नहीं लेते थे, किन्तु उन्हें वेतन के बदले में जमीन दी जाती थी । गुर्जर शब्द देश के लिए ही प्रयुक्त किया जाता है; जाति के लिए नहीं । (क.मा.पुंशी, प्लोरिज दैट वाज गुर्जर देश, भाग2 , पृ. 143)
इन सब आधारों से कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने राजपूतों को वैदिक आर्य क्षत्रियों का ही वंशज माना है ।

कृष्णास्वामी आयंगर मानते हैं कि गुर्जरों के भारत में आने कीं मान्यता पूर्ण सिद्ध नहीँ है । मैंने काफी कोशिश करके, उस सारी सामग्री का अध्ययन किया, जिसमें गुर्जरों की मान्यता दी गई है, किंन्तु इस सारी सामग्री में मुझें गुर्जरों के आने का कतई प्रमाण नहीं मिला । मैं निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि गुर्जर कोई विदेशी नहीं थे । (जनरल आँफ टी लेटर्स यूनिबरसिटी, कलकत्ता)

अनुमान है कि मध्ययुग में हूण हिन्दू मान लिए गए । उनके सामाजिक रीतिरिवाज और विवाह आदि अन्य क्षत्रियों की भाँति होने लगे । हूण शब्द के प्रति कभी इज्जत की भावना नहीं रही । हूण सदैव ही निर्दयी और विश्व की सबसे खराब कौम मानी गई है । हूणों को क्षत्रिय मान लिए जाने पर भी वे नीची निगाहों से ही देखे जाते थे । क्षत्रिय राजा उनकी कन्याऔ से विवाह कर लेते थे, जिसके अनेक उदाहरण मिलते हैं, परन्तु क्षत्रिय राजाओं का हूण राजा क्रो अपनी पुत्री देने का कोई प्रमाण नहीं मिला । वह आगे लिखता है कि में यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि राजपूत वंशों के उद्गम में गूजरों का भारी भाग रहा, जेसा कि बताया जाता है । मित्रका अपनी पुस्तक ‘झुम’ में लिखती है-‘मैं परमार, चालुक्य, चाहमान आदि को हूण नहीं मान सकती ।’ भण्डारकर की दलीलों में कोई यल नहीं है । ‘में राजपूतों क्रो विदेशियों की सन्तान मानने को तैयार नहीं दूं। परन्तु यह मानना मी उचित नहीँ है कि वे सिर्फ वैदिक क्षत्रिय ही है । उनमें कुछ दूसरा खून भी है ।’

उसका यह कहना ठीक है, क्योंकि क्षत्रिय अनुलोम विवाह करते थे । हूण राजकुमारियों से विवाह करना इसका प्रमाण है । इसलिए दूसरे खून का मिश्रण तो हुआ ही है!
डा. दशरथ शर्मा भी अपने ग्रंथों में राजपूतों की विदेशियों की सन्तान नहीं मान कर उन्है आर्य ही मानते हैँ तथा पूजर देश के कारण पूजर शब्द कीं उत्पत्ति मानते है न कि पूजर जाति से ।
आजकल नए लेखक भी इन आधारों पर पुरानी गूजर मान्यता को स्वीकार नहीं करते हैं ।
कुछ विदेशी विद्वान भी ऐसे हैँ जो उदयपुर राजवंश को राम का वंशज मानते है उनमें बर्नियर मिल, एल्पिज्जस्टन मालकम आदि हैँ । एचीसन ट्रीटीज ने भी ऐसा ही मामा है । ये भी इस प्रकार राजपूतों को विदेशी नहीं मानते है ।
इस लेख में राजपूतों को विदेशी शक, कुशान और हूणों के वंशज मानने वाले विदेशी तथा भारतीय विद्वानों के बिचार प्रस्तुत करने के साथ-साथ इन्हें भारतीय आर्य क्षत्रियों के वंशज मानने वाले लेखकों कीं मान्यताएँ भी प्रस्तुत की हैं । अब राजपूत आर्य क्षत्रिय है या विदेशी सजाक, हूण आदि के वंशज? इस विषय पर अपनी बात रखने की कोशिश करते है ।

राजपूतों को शक मानने वाला एक ही लेखक था और वह था-काँलं जेम्स टॉड । उसके अतिरिक्त किसी भी विद्वान ने राजपूतों को शक नहीं लिखा। टॉड ने उनके शक होने के प्रमाण प्रस्तुत किए हैं, वे यह है कि…राजपूत सूर्य की उपासना करते हैं; अरवमेध यज्ञ करते है; इनमें सतीप्रथा है; ये घोडे और तलवार की पूजा करते हैं । ये सब लक्षण शकों से मिलते हैं, अत: राजपूत शकों के वंशज हैं । (टोड एनल्स एण्ड एण्टीस्विटीज आँफ राजस्थान, भाग प्रथम, चैप्टर 6) सूर्य उपासना तो वेदिक उपासना है । अश्वमेध यज्ञ भारत के आर्य क्षत्रिय करते ये, जिसके अनेक उदाहरण पुराणों और महाभारत में मिलते है । सतीप्रथा भी आर्यों में थी । त्रेता युग पें रावण के पुत्र मेघनाद के युद्ध पें काम आने पर उसकी स्वी सुलोचना सती दुई थी । उसका वाल्मीकीय रामायण में वृतांत है । उसी प्रकार द्वापर में राजा पांडु की मृत्यु पर पांडु की दूसरी पत्मी मादी पति के साथ सती हुई थी । उसका वर्णन महाभारत में है ऐसे और भी अनेक उदाहरण हैं, जो यह सिद्ध करते हैँ कि ‘ टॉड ने जितने भी कारण दिए हैं, वे तो सब भारतीय आर्यों के थे । उन्ही से सम्भवत: शकों ने भी ये आर्य-परम्पराएँ ग्रहण की थीं । इन सब तथ्यों से तो राजपूतों का आर्य होना ही सिद्ध होता है । अश्व और तलवार की पूजा और उनके प्रति प्रेम तो समस्त वीर जातियों में विद्यमान था । शकों के नामों और क्षत्रियों के नामों में भी बडा अन्तर है ।

रीति-रिवाजों में अन्तर : जिस प्रकार राजपूत जातियों में पिता के पीछे बडा पुत्र और उसके पीछे उसका लडका राज्य का अधिकारी होता है, उसी प्रकार यह रिवाज शकों ( क्षत्रियों) के यहॉ नहीं होता था । उनके यहॉ यह विलक्षणता थी कि पिता के पीछे पहले बड़ा पुत्र और उसके पीछे उससे छोटा पुत्र-हसी प्रकार जितने पुत्र होते थे, वे सब उम्र के हिसाब से क्रमश: गद्दी पर बैठते थे तथा इन सब के मर चुकने पर यदि बड़े भाई का पुत्र होता तो उसे अधिकार मिलता था । अत: अन्य नरेशों की तरह उनके यहॉ राज्याधिकार सदैव बड़े पुत्र के वंश में ही नहीं रहता था । शकों में राजपूतों की तरह बड़ा पुत्र ही राजा बने ऐसी परम्परा नहीं थी ।
शक भारत में आने के बाद हिन्दू बन गए थे, तो उन्हें हीन दृष्टि से देखा जाता था । पतज्जलि ने अपने भाष्य में शकों के लिए लिखा है

शुद्राणामृ निर्वीसेतानाम् आयबिनदि निर्वस्रितानम/
यडोव शक यवनमितिन स्रिद्धयति / (अष्टाट 2/4/1 ८2)

इससे यह सिद्ध होता है कि उस समय भी शक और यवन लोग विदेशी ही माने जाते थे और उनकी गणना शूद्रों में ही होती थी ।

शकों के राज्य पंजाब से मथुरा के दक्षिण तक फैले हुए थे । शकों का मथुरा के पास शिलालेख मिला है तथा कुछ अन्य शिलालेख भी हैँ, जिनकी भाषा खरोष्ठी है ।
कतिपय विद्वानों की धारणाएँ हैँ कि इन शक राज्यों के शासकों को उज्जैन के प्रसिद्ध विक्रमादित्य ने परास्त करके देश से बाहर निकाला था ।
इसलिए वह ‘विक्रमादित्यशकारि’ कहलाया तथा उसी विजय के उपलक्ष्य में उसने विक्रम संवत् चलाया, जो ईस्वी सन् 57 वर्ष पूर्व होता है । आधुनिक विद्वान विक्रमादित्यशकारि का अस्तित्व नहीं मानते, क्योंकि अभी तक उसका कोई शिलालेख नहीं मिला है । मिहिरकुल हूण को पराजित करने वाले यशोधर्मन का बि.सं. 5 89 (ईस्वी 532) के मंदसौर के शिलालेख से ह्युर्गो को परास्त करने का पता चलता है । अगर उसका यह शिलालेख नहीं मिला होता, तो इतिहास में उसका अस्तित्व ही मिट जाता । विक्रमादित्य का शिलालेख नहीं मिला, परन्तु भारत का सर्वप्रथम इतिहास ग्रंथ राजतरंगिणी जो ग्यारहवीं सदी के प्रारम्भ में लिखी गई थी । (कलहन-राजत्तरंगिनी, था. 1 पृ. 1 5 ) उसमें उसके लेखक ने उज्जैन के राजा विक्रमादित्य द्वारा हूणों को हराने का वर्णन किया है । (कलहन-राजतरंगिनी, भाग1 , पृ. 8 3 ) । चीनी यात्री हेनसांग, जो ( ई. 6 2 9 6 5 0 ) भारत आया था, उसने भी मालवा के शासक शिलादित्य को विक्रमादित्य का वंशज लिखा है । इर्सी प्रकार अलबेरुनी, जो महमूद गजनवी के साथ अनेक बार भारत में आया था और उसने अरवी भाषा में करीब 20 पुस्तकें हिन्दुस्तान पर लिखी, उसमें भी उसने उज्जैन के राजा विक्रमादित्य का वर्णन दिया है (अलबेरुनी का भारत, भाग2, पृ. 112 ) । अलबेरुनी ने लिखा है कि उस समय धार के राजा भोज के पूर्वज उज्जैन से ही धार गए थे । अलबेरुनी का जन्म ईस्वी 973 ओर मृत्यु 1048 में हुईं थी । इन समस्त उद्धरणों से सिद्ध होता है कि उज्जैन का शासक विक्रमादित्य था, जिसने शकों को करारी मात दी थी ।

विक्रमादित्य के बाद शकों ने फिर काठियावाड़ पर अधिक्रार करके वहॉ अपना राज्य स्थापित ‘ किया, जिन्हें अन्त में गुणों ने समाप्त किया । कुछ अंग्रेज़ विद्वानों का विचार है कि गुजरात का यह हिस्सा जो काठियावाड़ कहलाता है, वह काठियों के कारण काठियावाड़ कहलाया। वे काठियों को झुम मानते है । इनके राज्य-विस्तार से मेरी स्वयं की धारणा यह है कि काठी हूड्डूग नहीं है, वे शक हैं, जिनका इस प्रदेश पर लम्बे समय तक शासन चला था ।
शक संवत 72 (ई. 1 5 0 के आस-पास के गिरनार पर्वत के निकट एक चट्टान पर उल्कीर्ण क्षत्रपवंशी राजा रुद्रदामा के लेख में उल्लेख है कि उसने क्षत्रियों में वीर पदवी धारण करने वाले योधेय को नष्ट किया था । ( ए. इ. जिल्द 8 पृ. 4447 )

शक उषवदात के नासिक के पास की पांडव गुफा के लेख में, जो वि.सं. की दूसरी शताब्दी का है, लिखा है कि में (उषदावत) भट्टारक नहपान की आज्ञा से मालर्वो से घिरे हुए उत्तम भाद्रों को मुक्त कराने को वर्षा ऋतु में गया ‘और मालव मेरे पहुंचने का शोर सुनते ही भागे, परन्तु उन सबने उत्तम भाद्र क्षत्रियों के बन्दी बनाए गए व्यक्तियों को बंधन मुक्त कराया । वहॉ से मैंने पुष्कर में जाकर स्नान किया और वहाँ 3000 गौ और एक गॉव दान में दिया ।

इन दोनों लेखों से यह पूर्णत: सिद्ध होता है कि शक अपने को क्षत्रियों से सर्वथा भिन्न जाति के मानते थे । जबकि वे हिन्दू बन गए थे । उषबदात ने पुष्कर में स्नान भी किया, 3 हजार गायें तथा एक ग्राम भी दान में दिया था । वे शासक थे, परन्तु अपने को क्षत्रियों से भित्र समझते थे ।

शको से सम्बन्धित वर्णनों, उनके रीतिरिवाजों, उनकी पोशाकों जो उनके सिक्कों से मालूम होती है, उनकी खरोष्ठी लिपि जिमसें कि राजपूतों का कोई भी शिलालेख उल्कीर्ण नहीं मिला-आदिं साक्ष्य साफ सिद्ध करते हैँ कि शक और राजपूत पूर्णतया दो भित्र-भिन्न वंश थे, जिनमें आचारव्यवहार, रीति-रिवाज, सामाजिक समता और अन्य शारीरिक या जातीय साम्यता नहीँ थी ।

राजपूतों को शकों के वंशधर मानने बालों के बाद दूसरी विचारधारा यह आईं कि राजपूत हुदुमों के वंशज हैं । इस मान्यता को A.MT. JACSON ने प्रारम्भ किया ।
इसी मान्यता को j. Combell ने आगे बढाया, परन्तु वह स्वयं भी इस मान्यता के लिए पूर्णरूपेण सन्तुष्ट नहीं था! स्मिथ ने भी इसी मान्यता को स्वीकार है ।
राजपूतों के प्रति अंग्रेज व अन्य लेखकों की हूणों कै वंशधर होने की क्लानाओं, आस्थाओं एवं मान्यताओं के लिए मेरे अध्ययन के निष्कर्ष निम्म प्रकार है :

सबसे पहले हम यह देखें कि ये राजपूत वंश अपने प्राचीन शिलालेखों और प्राचीन ग्रन्धों में अपने विषय में क्या लिखते रहे हैँ । राजपूत वंशों में सर्वप्रथम मैं मेवाड के गुहिलवंश पर प्राप्त लेखों का उछेख कर रहा हूँ-आटपुर (आहाड़) में मिले वि. 1034 (ईं. 977 ) के शिलालेख के छठे श्लोक में गुहिल के वंशज नरवाहन के वर्णन में उसको बिजय का निवास स्थान एवं क्षत्रियों का क्षेत्र कहा है । (इन्डियनं ऐन्टीक्यरी जि. 3 9 पृ. 191) बाप्या रावल के सोने के स्रिबके पर सूर्य का अंकन है । जो बाप्पा रावल को सूर्यवंशी क्षत्रिय होना सिद्ध करता है । ( ना. प्र. प. भाग1 पृ. 24 5 6 8 ) विक्रम 1 0 2 8 (ईं. 971) 1 लकुलीश के मन्दिर के शिलालेख में मेवाड़ के गुहिलवंश नरवाहन को रघुवंशी अंकित किया है । (जर्नल आँफ दी बोम्बे ब्रांच आँफ दी रायल एशियाटिक सोसायटी, जिल्द 22 पृ. 1667 ) चित्तोड़ के रावल समरसिंह के समय के श्याम पार्श्वनाथ के मन्दिर के वि. 1 3 3 5 (ईं. 1278) के लेख में गुहिल को क्षत्रिय लिखा है । (भावनगर इन्स्किप्सन्स, पृ. 74)

जब पडिहारों के वर्णन देखते है तब मंडोर के वाउक पडिहार के वि. 894 (ईं. 837) के लेख में पडिहार वंश को राम के छोटे भाई लक्ष्मण के शाखा में माना है । (ज. रा. ए. सो. ईं. 1874 पृ. 7) मंडोर के ही ककूक पडिहार के घटियाला के वि. 918 (ईं. 861 ) के लेख में भी पडिहारों की उत्पत्ति राम के छोटे भाई लक्ष्मण से ही बतलाई है (ज.रा.ए.सो.ईं. 1895 पृ. 517-18) 1 इसी प्रकार कन्नौज के भोज प्रतिहार की ग्वालियर की प्रशस्ति में प्रतिहारों को मनु, इश्वाकुं, कक्रुत्स्य के वंश के राम के छोटे भाई सौमित्र (लक्ष्मण) के वंशज लिखा हे (आर्कियालॉजिकल सर्वे आँफ इण्डिया, एन्युअल रिपोर्ट ई. 1903 पृपृ280)

सोलंकियो के ईस्वी 388 से 16वीं सदी तक “के प्राप्य समस्त प्रमाण सोलंकियों क्रो चन्द्रवंशी तथा पाण्डवों के वंशज होना सिद्ध करते है । ( ओझा सोलंकियों का प्राचीन इतिहास, पृ. 313) चौहानों के ईं. 756 से 1543 तक के शिलालेखों, दानपत्रों ऐतिहासिक ग्रंथो आदि में इनको सूर्यवंशी क्षत्रिय वर्णित किया है । ( ओझा राजपूताने का इतिहास, प्रथम भाग, पृ. 63) जब परमार वंश पर बिचार करते हैँ, तब मालवा के परमार राजा पुंज के समय (ईं. 971 – 997 ) के आसपास होने वाले उसके दरबार के पंडित हलायुद्ध द्वारा रचित ‘ पिंगल सूत्रवृत्ति’ का अवलोकन करते हैँ, तो उसमें पुंज को बह्यक्षत्र कुल का प्रकट किया है । ब्रह्यक्षत्र शब्द का प्रयोग प्राचीन काल में उन राजवंशों के लिए होता रहा है जिनमें कि ब्रह्मत्व और क्षत्रिय दोनों गुण विद्यमान हों । डा. दशरथ शर्मा ने ” पंवार वंश दर्पण’ में लिखा है कि जिस वंश में पुंज, भोज, जगदेव जैसे महान् पुरुष उत्पन्न हुए, वे ब्रह्मक्षत्र कहलाने के अधिकारी थे ।

इन कतिपय प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि बारहवींतेरहवीं सदी में राजपूत कहलाने वाले वंश ही चौथी से लेकर ग्यारहवीं सदी तक क्षत्रिय कहलाते थे, उनमें और बाद के राजपूतों में कोई अन्तर नहीं था । राजपूत क्षत्रिय का ही पर्यायवाची शब्द है । यहाँ हम भारत में आए हुए चीनी यात्रियो के वर्णन प्रस्तुत का रहे है :

चीन से बहुतसे बोद्ध भिक्षुक बोद्ध-धर्म का अध्ययन किया तथा बोद्ध ग्रन्यौ को ले जाने आदि के लिए समयसमय पर भारत में आए तथा वे कई वर्षों तक इस देश मैं रहे । उनकी भारत यात्रा के जो वर्णन प्रकाशित हुए हैँ, उनसे क्षत्रियों तथा हूणों आदि के विषय में जानकारियाँ प्राप्त होती हैँ । उनके ये वर्णन ऐतिहासिक दृष्टि से अतीव महत्त्वपूर्ण है ।

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