मौर्य वंश का इतिहास

मौर्य वंश का इतिहास

भारतीय प्राचीन क्षत्रिय कुलों के शासकों में मौर्य कुल के शासकों का इतिहास बड़ा उउज्वल और महिमामय है । मौर्य प्रसिद्ध सूर्यवंश की एक शाखा है । इस कुल में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता सेनानायक चन्द्रगुप्त और महान् सम्राट प्रियदर्शी अशोकवर्द्धन जैसी विभूतियों ने जन्म लिया था । अशोक ने शस्त्र शक्ति का त्याग कर धर्म-शक्ति से विश्व में बौद्धधर्म के प्रचार द्वारा अपनी विजय पताका फहराईं थी । अशोक द्वारा प्रसारित बौद्धधर्म आज भी विदेशों में राजधर्म के रूप में प्रचलित है । नीचे की पंक्तियों में उसी मौर्यवंश की संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत की गई है ।

मौर्य वंश का इतिहास
मौर्य वंश का इतिहास

मौर्यों की उत्पत्ति

मौर्य वंश इतिहास के पृष्ठों में जितना समुज्जवल है, उसकी उत्पत्ति का विषय उतना ही विवादास्पद बना हुआ है । इसकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक धांतिपूर्ण मत प्रतिपादित किए गए हैँ । ‘

(1) मौर्यो की शूद्रों से उत्पति मानने वाले विद्वानों का मत ब्राह्मण ग्रन्धों पर आधारित तर्कों पर है, जैसा कि पुराणों में शिशुनाग वंश के विनाश और नन्दवंश की स्थापना के साथ उल्लेख है कि ‘तत प्रभृति राजानो भविष्या: शूद्र योनप: ।’ को कुछ विद्वानों ने इसे नन्दौ के समान मौर्यो पर भी स्थापित कर दिया । किन्तु इस श्लोक का सम्बन्ध एकमात्र नन्दवंश से है न कि इस वंश के पश्चात् उत्पन्न होने वाले राजवंशों सुंग, कण्य और सातवाहन वंशों से, जिनका उदय शेशुनाग वंश के पश्चात् हुआ था । लेक्लि इन सभी वंशों का शूट्ठ होने का प्रश्न ही नहीं उठता है । यह स्पष्ट हे कि पुराणों का उपर्युक्त उद्धरण एकमात्र नन्दवंश के लिए ही है । शेशुनाग वंश के पतन के पश्चात् उदय होने वाले समस्त वंशों पर लागूनहीँ है । नन्दो को पुराणों में ‘शूद्रागर्पोदृभव’ व ‘अधार्मिक’ आदि कहा है ।

पुराणों मैं उल्लेख है कि महानन्दी का पुत्र महापदम (नन्द) शूद्रा स्त्री के गर्भ से उतपन्न होकर अपने 8 8 वर्ष के शासनकाल में क्षत्रियों को नष्ट करेगा तथा उसके सुभाल्य आदि 4 पुत्र 12 वर्ष राज्य करेंगे । तत्पश्चात् कौटिल्य (विष्णुगुप्त चाणक्य) ब्राह्मण हन नबनन्दौ क्रो खत्म करके मौर्य राज्य की स्थापना करेगा ।

पुराण, बृहत्थकथा, कथासरित्सागर और मुद्राराक्षस में तो इस बात का उछेरव्र नहीं है कि चन्द्रगुप्त नन्दवंश से उत्पत्र हुआ था, या उसकी माता का नाम मुरा था । इन ग्रन्थो में तो केवल उसको मौर्य वंशी माना है ।

विशाखादत्त द्वारा रचित ‘मुद्राराक्षस’ नाटक के आधार पर चंद्रगुप्त मौर्य को शूद्र सिद्ध करने की चेष्टा की गई है, जिसकी रचना मौर्यों के आठ सौ-नौ सी वर्ष बाद सातवीं सदी में हुईं थी । ‘मुद्राराक्षस’ एक नाटक है, ऐतिहासिक ग्रन्थ नहीं है तथा वह मौर्यो से नो सौ या हजार वर्ष बाद में लिखा गया था । इसलिए उसे प्रमाण नहीं मान सकते । मुद्राराक्षस में ‘चन्द्रगुप्त के लिए वृषल’ शब्द के प्रयोग से कुछ विद्वानों ने मौर्यो को शूद्र कहने की चेष्टा की है।

मुद्राराक्षस के टीकाकार ढूंढिराज ने ईं. 171 3 में यह लिख दिया कि नन्दवंश के अन्तिम राजा सर्वार्थ सिद्धि (नन्द) की वृषल जाति की मुरा नामक राणी से चंद्रगुप्त उत्पन्न हुआ जो अपनी माता के नाम पर मौर्य कहलाया।

इतने समय बाद की यह टीका प्रामाणिक केसे हो सकती है? परन्तु निराधार आधार को प्रमाण बनकर विदेशी विद्वानों ने मौर्य इतिहास को भ्रष्ट कर दिया । भारतीय विद्वान भी उसी को दोहराते चले ‘गए ।

चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र के अन्त में लिखा है कि ‘जिस व्यक्ति ने अतिशीघ्र बलपूर्वक मातृभूमि को नन्दौ से मुक्त करवाया’ इससे ध्वनित होता है कि चाणक्य कीं दृष्टि में नन्दी का आधिपत्य राष्ट्र के लिए कल्याणकर नहीं था । चाणक्य ब्राह्मण-व्यवऱप्या का पोषक था । अतएव वर्णाश्रम धर्म के दृष्टिकोण से नंदो को राज्य करने का अधिकार नहीं था । यह तो क्षत्रियों का धर्मनिहित कार्य था । अत: नन्दौ के नाश के पीछे यहॉ चाणक्य की व्यक्तिगत ट्टेषता और प्रतिशोध की भावना काम कर रही थी तथा वर्णाश्रम धर्म कीं पुन: प्रतिष्ठा की भावना भी थी । अत: यदि चन्द्रगुप्त निम्मजाति का होता तो चाणक्य उसे राज़सत्ता प्राप्ति में सहायता कदापि नहीँ देता ।

मौर्य क्षत्रिय थे, इस मत के समर्थक विद्वान बोद्ध एवं जैन साहित्य के आधार पर ऐसा मानते हैं । बोद्ध साहित्य के ग्रन्थ ‘महावंश’ में कहा गया है कि चाणक्य ने नवें नंद (राजा घनानंद) का विनाश कर चंद्रगुप्त को सरफूर्ग ज़म्बु द्वीप का सम्राट बनाया । यह क्लगुप्त मौर्य क्षत्रिय था । ‘महावंश’ पर लिखित टीका में चंद्रगुप्त को मौर्य नगर का राजकुमार बताया गया है । यह वंश क्षत्रिय शाक्यों की ही एक शाखा थी ।

मोर पक्षियों की अधिकता से हिमालय के निकट का यह प्रदेश मौर्य राज्य कहलाया। चन्द्रगुप्त इस प्रदेश का क्षत्रिय कुमार था ।

‘महापरिनिव्वानसुत्त’ में उछेख है कि महात्मा बुद्ध के देहावसान के समय (ई॰ पू. 477) पिप्पलीवन के मौर्यों ने कुशीनगर के मक्कों के पास संदेश भेजा कि आप भी क्षत्रिय हैं और हम भी क्षत्रिय हैँ । अत: हमें भी भगवान बुद्ध के शरीर के अवशेष प्राप्त करने का हक है ।
बुद्ध के समय में जो दस स्वतन्त्र राज्य थे, उनमें एक राज्य पिंप्पलीवन के मौर्य क्षत्रियों का था । इसी प्रकार ‘महाबोधिबंश’ का कथन है कि कुमार चन्द्रगुप्त नरिन्दकुल संभव (राजबंशीय) था । यह राजवंश शाक्यपुत्रों द्वारा निर्मित ‘मोरियनगर’ का था ।
‘दिव्यावदान’ में चन्द्रगुप्त के पुत्र बिन्दुसार और पौत्र अशोक को स्पष्टतया क्षत्रिय कहा गया है । एक स्थान पर बिन्दुसार ने एक स्वी से कहा है ।
‘त्वं नापिलौ अहम् राजा क्षत्रियौ मूधम्भिबिक्त / कथम् मया सार्थ प्तमागयो भविष्यति” ‘
दूसरे स्थान पर अशोक अपनी रानी से कहता है :
‘नेविं (दैर्वा) अह’० क्षत्रिय: / कथं प्लायडू (प्याज) परि भक्षयामिं” ‘
मुद्राराक्षस और उसकी टीका से बोद्ध साहित्य अधिक प्राचीन और अधिक प्रामाणिक है ।
जैन ग्रंथ “परिशिष्टपर्वन’ के अनुसार चन्द्रगुप्त मयूर पोषकों के सरदार का पुत्र था । यहीँ मत अन्य जेन ग्रन्थ ‘ आवश्यक सूत्र’ की हरिभद्र टीका का भी है । रामचन्द्र पुमुक्षु रचित ‘पुध्याश्रवकथा क्रोष’ में चन्द्रगुप्त को क्षत्रिय कहा गया हे । जैन साहित्य नन्दो को शूद्रबतलाता है ।

श्री गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने लिखा है कि ‘ कुमारपाल प्रबन्ध’ में चित्तोड़ के मौर्यवंशी राजा चित्रांगद को रघुवंशी कहा गया है ।
विदेशी विद्वान कर्टियस का कथन है कि वर्तमान राजा (नंद) न केबल मूलत: अनाभिजात है, बल्कि नितान्त निम्मस्तरीय है । वास्तव में उसका पिता नापित था ।
यूनानी लेखक ब्लूटार्क जो ई. पू. दूसरी शताब्दी में था, लिखता है कि मगध के राजा महानंदी का निम्म जाति से उत्पन्न पुत्र महापदृम सिकन्दर के समय वहाँ का राजा था । चन्द्रगुप्त ने महापदृम या उसके पुत्रों को मारकर मगध का राज्य उनसे छीन लिया था ।
बौद्ध और जेन साहित्य के साक्ष्य मौर्यों को मोरों से सम्बन्धित मानते हैँ । इसी प्रकार नंदगढ़ के अशोक स्तम्भ के भ्रूगभाँन्तरित अधोभाग में एक मयूर का चिह्न अंकित है । सांची स्तूप पर जहॉ अशोक के जीवन की अनेक घटनाएँ उस्कीर्ण की गईं हैँ, वहाँ मयूर की अनेक मूर्तियाँ भी दृष्टिगत होती हैं ।
मयूर मौर्यो का वंशाक था । मौर्यो के पंच मार्क सिक्के हैँ उन पर मेरु पर्वत पर मौर दिखाया हुआ है । यह भी मयूर का उनका बंशचिह्न होना सिद्ध करता है । इसी प्रकार मेरु पर्वत पर वर्क चन्द्र भी मौर्य शासकों कर चिह्न माना गया है । शायद वह सिक्का रवुद चन्द्रगुप्त का हो ।
भारत के प्रारम्भिक इतिहास लेखक स्मिथ आदि ने मौर्यों के करीबकरीब समकालीन बौद्ध और जैन ग्रंथो के प्रमाणों को अनदेखा कर दिया और करीब हजार बर्ष बाद के नाटक और 1713 ई. की उसकी टीका को महत्त्व देकर मौर्यों के उस यशस्वी वंश को कलंकित करने की कोशिश की है ।
मौर्यकालीन प्राप्त सिक्कों और बौद्ध जैन ग्रन्धों से यह सर्वथा सुस्पष्ट और प्रमाणित है कि चंद्रगुप्त कुलीन क्षत्रियों के मौर्य कुल कर था ।

मगध के मौर्य

भगवान गौतम बुद्ध के अवतरण से काफी समय पहले से ही मौर्य शासकों का पिप्पलीबन पर शासन था । मौर्यवंश शाक्य वंश की एक शाखा थी । इस प्रकार यह सूर्यवंशी क्षत्रिय थे । पिप्पलीवन हिमालय की तलहटी के निकट था । वहॉ मयूर पक्षियों कर बाहुल्य था । एतदर्थ वहाँ के शासक मौर्यबंशी संज्ञा से जाने जाने लगें । यह तथ्य मैकफिल्ड नामक विद्वान ने अपनी पुस्तक ‘ इन्वेशन आँफ इण्डिया बाई अलेकजेण्डर दी ग्रेट’ में व्यक्त करते हुए लिखा है कि मौर्य वंश का एक क्षत्रिय राजकुमार चन्द्रगुप्त था । सिकन्दर के भारत पर आक्रमण के समय वह नालन्दा के प्रख्यात विश्वविद्यालय में अध्ययनरत था । यह राजकुमार बडा वीर, अति साहसी और होनहार था । अतएव उस युवा राजकुमार के मन में विचार आया कि जिस युवक (सिकन्दर) ने दिग्विजय की कल्पना की और यूनान से लेकर हमारे देश की सीमा तक बिजय पताका फहराईं है, उसमें साहस के साथसाथ सांग्रासिक कौशल का भी अवश्य ही नैपुण्य होगा ।

इस विचार के क्रियान्वयन के लिए वह ग्रीक सेना के शिविर में गया । प्रयास तथा बुद्धिबल से शीघ्र ही ग्रीक सेनानायकों से परिचय प्राप्त करने में सफल हुआ । अन्त में वह सिकन्दर के समीप भी पहुंच गया । उसने गहराई से ग्रीक सेनाओं की युद्धप्रणाली और सैन्थ संचालनादि की जानकारी प्राप्त की । यूनानी इतिहासकार न्तुटार्क ने लिखा है कि इस नवयुवक (चन्द्रगुप्त) पर सिकन्दर को संदेह उत्पन्न हो गया था । ऐसी स्थिति में उसका ग्रीक सेन्य शिविर में अधिक समय तक रहना रव्रत्तरे से खाली नहीं था । यह विचार कर चन्द्रगुप्त वहाँ से सकुशल निकल गया ।

ई. पू. 3 2 3 की जून में सिकन्दर की बेबीलोन में मृत्यु हो गई । फलत: उसका राज्य कई भागों में विभाजित होकर बिखर गया । उसने पंजाब विजय के बाद वहॉ पर
अपने प्रतिनिधि या प्रांतपाल के रूप में अपने सेनापति. फिलिप को नियुक्त किया था । भारतीय जनता यूनानियों की गुलामी से दुखी थी । वह अब और अधिक समय तक
उनका भार सहने को तैयार नहीं थी । भारतीय जनता ने ग्रीकों के विरुद्ध विद्रोह का शंखनाद कर दिया। इस सशस्त्र बगावत को नेतृत्व देने में तक्षशिला के आचार्य चाणक्य का बड़ा हाथ था । इस विद्रोह को सफल बनाने में चन्द्रगुप्त ने असीम साहस का परिचय दिया और उसने ग्रीक प्रांतपाल को मार डाला । यह घटना सिकन्दर की जीवितावस्था में ही हो गई थी । सिकन्दर को बेबीलोन में इसकी सूचना भी मिल गई थी । परन्तु, वह कुछ भी नहीं कर सका । इस प्रकार चाणक्य और चन्द्रगुप्त के साहसिक नेतृत्व से भारत का पंजाबी भ्रू-भाग ग्रीकों के आधिपत्य से मुक्त हो गया ।

आचार्य चाणक्य एक प्रकाण्ड राजनीतिज्ञ और प्रवीण कूटनीतिज्ञ था । एक बार मगध के नन्द सम्राट ने उसका अपमान कर दिया था । वह अपने तिरस्कार का प्रतिशोध लेने के लिए आतुर था । बलदती हुई राजनैतिक स्थितियों में चाणक्य ने अपनी आकांक्षापूर्ति के लिए चन्द्रगुप्त क्रो उपयुक्त पात्र समझा। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को केन्द्र बिन्दु बनाकर पंजाब के विघटित छोटे-छोटे खंड शासकों को एकत्र कर एक संगठन बनाया। इसमें पोरस और पार्वत्य राजा मुख्य थे । ऐसा प्रतीत होता है कि चाणक्य और चन्द्रगुप्त पंजाब, राजस्थान तथा पश्चिमोत्तर भारत पर अपनी सत्ता सुदृढ तथा सुस्थिर बनाकर एक विशाल सेना के साथ मगध के नन्द पर अग्रसर हुए।

बौद्धकाल में भारतीय (जम्यूद्वीप) जनपदों में मगध राज्य बहुत शक्तिशाली था । महाभारत काल में मगध का शासक जरासंध था । वह बडा समृद्धिशाली और शक्तिवान था । बुद्ध के समय पें मगध के सिंहासन पर बिम्बीसार था । उसने अपनी राज्य सीमा दूरदूर तक फैला दी थी । बिम्बीसार ईं. पू. 543 में मगध के राज्यासन पर आरूढ हुआ था ।
बिम्बीसार के पौत्र उदमन ने पाटलीपुत्र नगर कीं स्थापना की थी । तदनंतर मगध राज्यवंश का अमात्य शेशुनाग राजा बना । फिर महापदूम मगध का शासक बना और उसके बंशधरों की नंदबंशीय पहचान बनी । महापदम उच्च कुल का नहीं था । परन्तु उसके शासनकाल में मगध की शक्तिशाली शासकों में गिनती थी । इसने कई राज्यों को विजय कर अपना प्रभुत्व प्रदर्शित किया था । महापदृम के आठ पुत्र थे, इन पुत्रों में एक के बाद दूसरा राजा बनता रहा। सिंकन्दर के आक्रमण के समय मगध के सिंहासन पर घनानंद आसीन था ।
पाटलीपुत्र गंगा और सोन नदी के तट पर स्थित होने के कारण व्यापार का बड़ा केन्द्र था । मगध राज्य की शक्तिसम्पन्नता की वजह से भी व्यापार के क्षेत्र में उसकी अच्छी प्रगति थी । शांति, सुरक्षा ओर पर्याप्त राज्याश्रय के कारण शिल्पकलाओं में यह अच्छा उन्नतिशील था । उपर्युक्त कारणों से मगध राज्य और उसकी राजधानी पाटलीगुत्र का धनधान्य और समृद्धि की दृष्टि से भी देश में अच्छा स्थान था ।
मगध नरेशों के पास शक्तिशाली सैन्यबल था । राजा घनानंद अपनी सेना सज्जित कर सिकन्द्रर के मुकाबले हेतु पश्चिम की ओर अग्रसर हुआ था । इस अभियान से भयातुर होकर सिकंदर की विश्वविजयी सेना सामना करने से मना कर गई थी । इसी वजह से सिकन्दर को भारत में आगे बढने का बिचार स्थगित कर वापस अपने देश लोट जाने के लिए बाध्य होना पड़ा । राजा घनानंद का प्रधानमंत्री राक्षस बडा कूटनीतिज्ञ था । यह सब ढोते हुए भी घनानंद चंचल मति और दुर्बल मन का शासक था । वह अस्थिर प्रकृति, दुराचारी, दुर्व्यसनी व्यक्ति था । इन अत्याचारों के कारण प्रजा बडी पीडित थी । सेना में भी असंतोष उत्पन्न हों गया था । प्रधानमंत्री राक्षस का राजनीति-कौशल भी विफल होने लगा था । मगध राज्य की आन्तरिक स्थिति और शासकीय दुर्बलताओं का आचार्य चाणक्य को ज्ञान था । चन्द्रगुप्त और नंद की दोनों सेनाओं की भिड़न्त से पूर्व ही चाणक्य ने मगध राज्य की सेनाओं के आपसी मत-भेर्दो की जानकारी कर ली थी । इस प्रकार संशय और पारस्परिक अविश्वास का लाभ भी चन्द्रगुप्त को मिल गया था । जब दोनों सेनाओं में मुकाबला हुआ, तब मगध की सेना अपने स्वामी के हित में जी-जान लगाकर नहीं लडी । इधर चन्द्रगुप्त ने अपने रण-कौशल और वीरता का प्रदर्शन कर युद्धक्षेत्र में घनानंद को पराजित कर दिया । अन्त में चन्द्रगुप्त ने चाणक्य की सलाह से समग्र नंदवंश को मौत के घाट उतार दिया । इस प्रकार नंदबंश को समाप्त कर चाणक्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य को मगध के राजसिंहासन पर बैठाया। चन्द्रगुप्त का राज्याभिषेक ई पू 321 में हुआ था।

चन्द्रगुप्त ने अपनी शासकीय स्थिति तथा शक्ति सुदृढ कर गुजरात और सौराष्ट्र पर चढाई कर उन पर विजय प्राप्त की तथा सौराष्ट्र के राज्यपाल के पद पर पुष्पगुप्त की नियुक्ति की थी । पुष्पगुप्त ने सौराष्ट्र में चन्द्रगुप्त के नाम पर एक झील बनवाईं थी । तदनंतर मगध की सेनाएँ दक्षिणी भारत की ओर उन्मुख हुईं और उसने तिनेवेली की पोडिया गिरिमालाओं सहित उत्तरी मैसूर तक अपना बिजय केतु फहराया। चन्द्रगुप्त के शासनकाल में मगध राज्य का दक्षिण में विस्तार हो चुका था । इस प्रकार चंद्रगुप्त जम्बूद्वीप (भारत) का एकछत्र सम्राट बन गया था ।

सिकन्दरर के निधन के पश्चात् उसका सेनानायक सेल्युकस पश्चिमी राज्य का स्वामी बन गया था । अब वह पूर्व में अपनी राज्य सीमा का विस्तार करने के लिए तथा पंजाब को हस्तगत करने के लिए सक्रिय हुआ । चन्द्रगुप्त सेल्युकस का सामना करने के लिए अपनी विशाल सेना सज्जित कर पाटलीपुत्र से पश्चिम की ‘ओर चला। चन्द्रगुप्त की भारतीय सेना और सैल्युकस की पूनानी सेना में पंजाब के किसी स्थान पर सामना हुआ । ई. पू. 305 में यह घमासान युद्ध हुआ था । दोनों ओर भयानक नर-संहार के बाद चन्द्रगुप्त ने सैल्युकस की सेना को पूर्ण रूप से पराजित कर दिया था । सैल्युकस ने पराजित और विवश होकर चन्द्रगुप्त को अपनी पुत्री विवाह कर दहेज में हेरान, काबुल की घाटी और बलोचिस्तान भेंट कर मैत्री स्थापित की । अब चन्द्रगुप्त के राज्य की सीमा हिन्दूकुश पर्वत तक जा पहुंची थी ।
चन्द्रगुप्त की सेना बडी विशाल थी । उसमें 6 लाख पदाति, 50 हजार अश्वारोही, 9 हजार गज और रथादिं थे । उसृ समय युद्धकाल में हाथी पर महावत के अलावा तीन तथा रथ में सारथी के अतिरिक्त दो योद्धा बैठा करते थे ।
सैल्युकस का राजदूत मेगस्थनीज ईं.पू॰ 300 में चन्द्रगुप्त की राज्यसभा में आया था । वह लम्बे समय तक पाटलौपुत्र में रहा । उसने अपनी यात्रा-पुस्तक में मगध राज्य और उसकी राजधानी पाटलीपुत्र का विस्तार से वर्णन किया है । उसकी मूल पुस्तक तो अनुपलब्ध है, परन्तु कतिपय विद्वानों द्वारा इस पुस्तक के अवतरणों के उदाहरण प्राप्तहैँ । इन अवतरणों से एतदृ विषयक भारत की समृद्धि, शासन-व्यवस्था, जनरुचि प्रभृति अनेक विषयों’ की जानकारी मिलती है ।
चन्द्रगुप्त का पथ-प्रदर्शक और प्रधानमंत्री आचार्य चाणक्य था । वह उच्चकोटि का नीतिज्ञ और दृढ़-संकल्पी व्यक्ति था । उसकी मंत्रणा और डिशर-निर्देश पर चन्द्रगुप्त का राज्य चलता था । चाणक्य का दूसरा नाम कौटिल्य था । इसी नाम पर उसने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘कौटिल्य का अर्थशास्त्र की रचना की थी । इसमें राज्य व्यवस्था, अर्थनीति, राजनीति धातुविज्ञान आदि अनेक विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है ।

मेगस्थनीज के यात्रा-वृत्तान्त और चाणक्य के अर्थशास्त्र से भारत की उस समय की स्थिति पर बड़ा अच्छा प्रकाश पड़ता है । चंद्रगुप्त पच्चीस वर्ष तक बडी योग्यता से देश का शासन कर ईं. पू. 297 में दिवंगत हुआ । “
चन्द्रगुप्त भारतीय इतिहास का देदीप्यमान नक्षत्र था । उसने अपने बाहुबल से देश के विघटित और छोटे-छोटे अशक्त राज्यों को सुगठित कर शक्तिशाली भारत का निर्माण किया तथा मगध के अत्याचारी शासन का उम्मूलन कर वहाँ की जनता को शासकीय संत्रास से मुक्त किया और महान् ग्रीक शक्ति के आतंक को समाप्त कर उनके भारत पर विस्तार क्रो रोका और उसे हिन्दुकुश के उस पार धकेल कर देश की रक्षा की । वह भारत का प्रथम स्वतंत्रता सेनानी था ।
वस्तुत: चंद्रगुप्त मौर्य भारत का प्रथम महान् सेनानायक था । उसने देश को स्वतन्त्रता ही नहीं दिलाई, अपितु सुशासन देकर देशवासियों को सुखी और समृद्धिशाली भी बनाया । भारतीय इतिहास का वह एक अविस्मरणीय पात्र है । उसके बलबिक्रम, प्रजापालन और देशभक्ति कीं जितनी भी रलाघा की जाय, वह कम है ।
चन्द्रगुप्त का पुत्र बिन्दुसार ई यू. 292-273 में था । उसने अपने पिता का उत्तराधिकार ग्रहण किया । सीरिया के शासक एप्टियो चोस का राजदूत डाईमेचोर बिन्दुसार के दरबार में आया था । बिन्दुसार का ज्येष्ठ पुत्र सुशर्मा सीमा प्रदेश के सूबेदार के पद पर था । सीमा प्रदेश पश्चिमी भारत था । सीमा प्रदेश की राजधानी तक्षशिला थी । द्वितीय पुत्र अशोक्वर्द्धन मध्यप्रदेश का गवर्नर था और उसका मुख्यालय उज्जयिनी नगर था । तक्षशिला में जन विद्रोह हो गया था । उसे शांत करने में सुशर्मा सफल नहीं हो सका । तब सम्राट बिन्दुसार ने अशोक को वहां मेजा था । उसने विद्रोह को शान्त किया और शान्ति स्थापित की । बिन्दुसार ने अपने महान् पिता की तरह ही राज्य विस्तार किया और प्रजा के सुख समृद्धि में कमी नहीं आने दी।

अशोक महान्

सम्राट अशोक ( ई. पू. 2 7 3 – 2 3 2) बिन्दुसार की मृत्यु के बाद मगध साम्राज्य के उत्तराधिकारी के पद पर आसीन हुआ । उत्तराधिकार के पद को लेकर आपस में जबरदस्त संघर्ष हुआ । यह संघर्ष लम्बे समय तक चला। जिसमें जन धन की बडी हानि हुई । अन्त में इस आपसी संघर्ष में अशोक विजयी हुआ और मगध का सम्राट बनने में सिद्ध काम हुआ । अशोक पहले शैवधर्म का अनुयायी था । बर्तमान उडीसा प्रान्त तब कलिंग राज्य कहलाता था । वह स्वतंत्र राज्य था । अशोक ने उसे विजित करने के लिए ईं. पू. 262 में एक विशाल सेना लेकर उस पर चढाई की । मगध” और कलिंग की सेना में बड़ा भयंकर और लम्बा युद्ध हुआ । आखिर में अशोक विजयी हुआ । दोनों ओर के एक लाख से अधिक मनुष्य सारे गये और कई लाख घायल हुए। मनुष्यों से भी अधिक हाथी और घोड़े मारे गए । कलिंग में मानो ज्वालामुखी फूट पड़ा हो, वैसी भयावह स्थिति उत्पन्न हो गईं । उस भयावह युद्ध के पश्चात् अशोक ने एक पहाडी पर से युद्ध की विभीषिका और उस पर रक्तप्लावित दृश्य को देखा । उससे उसके मन में युद्ध के प्रति असीम क्षोभ और घृणा उत्पन्न हुईं । उसके मन की वेदना और पीडा ने उसे विचलित किया । परिणामत: उसने हिसा का मार्ग त्याग कर बोद्ध धर्म ग्रहण किया और युद्ध विजय के स्थान पर धर्म विजय के मार्ग पर चलने का निर्णय किया । अशोक ने बोद्ध धर्म को राड्रीय धर्म बनाया। अनेक बौद्ध विद्वानों को पाटलीपुत्र में आमंत्रित कर सभाएं कीं । बोद्ध धर्म के ५ प्रचार प्रसार की योजना बनाईं और बौद्ध धर्म के आदर्श और अपनी धर्म सम्बन्धी आज्ञाएं अपने साम्राज्य के प्रत्येक भाग में चट्टानों, पाषाण स्तंभों और गुफागृहों में उत्कीर्ण करवाईं ।

उसने बौद्ध धर्म के प्रचार और प्रसार के लिए विश्व के विभिन्न देशों में अपने प्रचारकों को भेजा, जिनमें सीरिया, मिश्र, साइरिनि, मैसीडोनिया, एपीरस के यवन राज्य तथा लंका ओर ब्रह्मा आदि देश मुख्य हैं । इस प्रकार उसने बोद्ध धर्म को एक विश्व धर्म का रूप दिया ।’ उसने अपने पुत्र महेन्द्र को श्रीलंका में धर्म प्रचारार्थ भेजा था । उसकी पुत्री संघमित्रा को भी महेन्द्र के साथ बोद्ध धर्म की शिक्षाओं के प्रसार के लिए भेजा गया था । अपनी इस धर्मप्रीति के कारण उसके लेखों में सदैव उसे देवानाम (देवताओं का प्रिय) सम्बोधित किया गया है । अशोक अपनी अहिंसात्मक धर्म विजय के लिए संसार प्रसिद्ध हो गया । इसीलिए विश्व के इतिहास में वह अशोक महान् की वाचकता से प्रसिद्ध है ।

अशोक महान
अशोक महान

अशोक के देहपात के पश्चात् मगध साम्राज्य का स्वामी उसका पुत्र कुणाल हुआ । उसके परचात् कुणाल का पुत्र सुयश सिंहासन पर बैठा । इसने थोड़े ही समय तक राज्य किया । उसके देहावसान के बाद मगध साम्राज्य दो हिस्सों में बंट गया, जिनमें एक पर उसका पुत्र दशरथ और दूसरे पर दूसरा पुत्र सम्प्रति गद्दीनशीन हुआ। दशरथ पूर्वी भाय का शासक बना, जिसकी राजधानी पाटलीपुत्र रही और सम्प्रति पश्चिमी भारत तथा मध्य प्रदेश का स्वामी बना । उसकी राजधानी उज्जैन थी । जेन लेखक मानते हैं कि सम्प्रति ने जेन धर्म ग्रहण कर लिया था । उसने जैन मन्दिर बनवाए। मारवाड़ (राजस्थान) का नाडोल का जेन मंदिर उसी द्वारा निर्मित बताया जाता है ।
मेवाड के कुम्भलगढ़ पर्वत पर उसने एक किला बनाया था । आगे चलकर मेवाड़ के महाराणा कुम्भा ने उस प्राचीन ध्वस्त दुर्ग के खण्डहरों से कुम्भलगढ़ दुर्ग का नवनिर्माण किया था । इसी प्रकार मेवाड़ के जहाजपुर का किला भी सम्प्रति द्वारा निर्मित माना जाता है । तदनंतर क्रमश: शालिशूक, सोमशर्या, शतधन्या और वृहदरथ शासक हुए । ये सभी बड़े कमजोर शासक थे । इसलिए उत्तरोत्तर मगध साम्राज्य छिन्न-भित्र होता गया । एक के बाद एक प्रांत स्वतंत्र होते गए । अन्त में वृहदरय की हत्या कर दी गई और ईं. पू. 1 84 में पुष्यमित्र मगध की राजगद्दी पर बैठ गया । इस प्रकार उस वैभवशाली मौर्य साम्राज्य का अन्त हो गया । ‘

मौर्यकालीन सामाजिक चित्रण

मौर्यकालीन भारतीय समाज व्यवस्था के सम्बन्ध में तत्कालीन साक्ष्य बहुत कम उपलब्ध हैँ । इस सम्बन्ध में बोद्धकालीन जातकों, चाणक्य का अर्थशास्त्र और यूनानी राजदूत मेगस्थनीज की इण्डिका से कुछ आधार सामग्री प्राप्त है । जातकों में ग्रामों, जन बस्तियों ग्राम न्याय व्यवस्था और अन्य सामाजिक व्यबस्थाआं पर जहाँ तहॉ प्रसंग आए हैं । उपर्युक्त ग्रन्धों से नगरों और ग्रामों के सम्बन्ध में पाया जाता है कि भारतीय समाज गांवों और नगरों पें निवास” करता था । पर गाँव स्वतंत्र, स्वावलम्बी और सुखी थे । उस समय जमींदारी प्रथा नहीं थी । किसी भी व्यक्ति से बेगार नहीं ली जाती थी । चन्द्रगुप्त ने अतिवृष्टि व अनावृष्टि जन्थ विपदाओं से रक्षा के लिए एक बिभाग बना रखा था । राज्य को प्रजा से कर रूप में जो धन मिलता था उसका एक भाग अलग रख दिया जाता था, जिससे अकाल पीडितों की सहायता की जाती थी । देश के सामाजिक जीवन में राजा, पुरोहित और नागरिक आदि सभी का महत्त्वपूर्ण स्थान था । नगरों की बजाय गाँवों का बाहुल्य था । मौर्यकाल में भारतीय जनता निथींकता से अपने धन्धे में लगी रहती थी । युद्धादि स्थिति में वह अप्रभावित थी । मेगस्थनीज ने भारतीय ग्राम जीवन पर एक स्थान पर लिखा है कि देश में युद्ध हुआ करते थे और कृषक अपना कार्य किया करते थे । उनके कार्य में कोई दखलअंदाजी नहीँ होती थी । यह कथन सही है कि कृषकों से बलात् कोई कार्य नहीं करवाया जाता । किसी से भी जबरदस्ती काम करवानी समाज में बुरा समझा जाता था । ग्रामीण लोग अपनी कुल परम्परा की मर्यादा और अपनी स्वतंत्रता का ध्यान रखते थे । , ग्रामों का शासन ग्राम मुखिया के द्वारा चलाया जाता था । यह पद चुनाव अथवा पितृ परम्परा के द्वारा प्राप्त होता था ।
नगरों कीं रक्षा के लिए शहरपनाह होती थी । नगरों में सडकों का भी निर्माण होता था । सडकों पर प्रति मौल के फासले पर पथप्रदर्शक प्रस्तर लगाए जाते थे ।
पाटलीपुत्र के चारों ओर लकडी के प्राकार के साथसाथ खाईं थी, जो पानी से भरी रहती थी । नगर में कई प्रवेशद्वार थे । मगध साम्राज्य की राजधानी, इस नगरी से चारों और अन्य नगरों तक सड़कें निर्मित थीं । एक सडक तो दो हजार मील तक लम्बी थी । यह पाटलीपुत्र से लेकर पश्चिमोत्तर प्रांत की सीमा तक लम्बी थी । सड़र्कों द्वारा आवागमन और व्यापार में बडी सुविधा थी । इससे सामाजिक जीवन की समृद्धि-सम्पव्रता का पता लगता है । अर्थशास्त्र में राजपथ, स्थपथ, पशुपथ, मनुष्यपथ, खरोंष्ट्रपथ आदि अनेक मार्गों का वर्णन है । इससे पथव्यवस्था की जानकारी मिलती है कि इस सम्बन्ध में शासक कितना सतर्क रहता था ।
मेगस्थनीज़ ने लिखा है कि भारतीय नागरिकों की स्थिति अच्छी थी । वे धनी और मानी थे । वे लोग मितव्ययिता का पालन करते थे । व्यर्थ की तड़क-भड़क से दूर रहते थे । लोग सरल और सीधी प्रकृति के थे । देश में चोरी नहीं होती थी । इसलिए लोग न्यायालय के द्वार पर कम जाते थे । ईमानदारी से धनार्जन किया जाता था । वे प्राचीन सामाजिक व्यवस्थक्च को भंग करने वाले कार्य नहीं करते थे तथा लोक-व्यवहार में निपुण थे । इन तथ्यों से समाज की मनोदशा, चित्तवृत्ति और उच्चाशयता का भान होता है ।
मेगस्थनीज सामाजिक व्यवस्थापर प्रकाश डालते हुए कहते हैँ कि लोग परस्पर बिस्वास करतें थे । आपस में गिरवी और धरोहर की सम्पत्ति पर अभियोग नहीं होते थे, वे मोहर और साक्षी की आवश्यकता नहीं समझते थे । अपना घर और सम्पत्ति प्राय: असुरक्षित छोड देते थे । घरों व दुकानों के ताले नहीं लगाते, थे । इससे स्पष्ट है कि मौर्यकालीन समाज में नैतिकता और आचरण कीं पवित्रता थी ।
झूठी गवाही देने वाला अगभंग का दण्ड भोगता था । कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति का अंगभंग कर देता है तो उसके बदले में अपराधी का वह अंग ही नहीं हाथ भी काट दिया जाता था । इससे समाज में अनैतिक कर्म, अपराध वृत्ति और अत्याचार करने का किसी में भी साहस नहीं होता था ।
मौर्यकालीन समाज में बहुविवाह प्रथा श्री । वैवाहिक सम्बन्धों पर समाज और शासन का कोई विशेष नियंत्रण नहीं था ।
राज्य की ओर से जनमंगल के लिए साम्राज्य के प्रत्येक भाग या प्रांत में मानब ही नहीं, पशु चिकित्सा तक के लिए राजकीय चिकित्सालय स्थापित थे ।
मौर्य सम्राट धार्मिक सहिष्णुता और उदार प्रकृति के थे । सम्राट अशोक के स्तंभ लेखों से प्रकट होता है कि उस काल में देश के धार्मिक विचारों पर कोई प्रतिबंध नहीं था । बोद्ध, जैन, वैदिक और इनसे भिन्न आजीबक-धर्म का देश में प्रचार था । अपनेअपने धर्मों के प्रचारक देश में निर्बाध रूप से भ्रमण करते थे और जनमानस में अपने
धार्मिक विचार फैलाने में स्वतंत्र थे । यह भारतीय 1 समाज की धार्मिक महानता और उच्चादर्श का प्रतीक है । विश्व के किसी भी प्राचीन देश में शासन और समाज में शायद ही कहीं ऐसी शासकीय उदारता रही हो ।
इस प्रकार हमने मौर्यकालीन भारतीय शासनव्यवस्था, आर्थिक स्थिति, सामाजिक स्तर, न्यायव्यवस्था और धार्मिक स्वतंत्रता पर सार रूप में बिचार करने का प्रयत्न किया है । इससे तत्कालीन भारत की एक उज्जल छबि हमारे सामने साकार रूप ग्रहण करती प्रकट होती है ।
इस प्रकार ऊपर वर्णित तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि समाज अपनी परम्पराओं के पालन और सामाजिक मानमूल्यों के क्षेत्र में स्वतंत्र धा । आपराधिक कृत्यों के अतिरिक्त किसी पर किसी भी प्रकार का दबाव नहीं था । प्रजा अपने कर्त्तव्यों, व्यापार तधा जीबननिर्वाहार्थ कृत कार्यों में स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और सुखी थी ।

मौर्यकालीन अर्थ-व्यवस्था

किसी भी देश की उन्नतावस्था , सांस्कृतिक उन्नयन और शासनसत्ता का आधारस्तम्भ अर्थ होता है । धन के माध्यम से ही वह बिभिन्न क्षेत्रों में उत्रति के द्वार उन्मुक्त करने में सफ़ल होता है । मौर्यकाल पर जब हम चिन्तन करते हैँ तो हमें यूनानी राजनयिक मेगस्थनीज़ की यात्रा विवरणिका (इण्डिका) और चाणक्य लिखित ‘ कौटिल्य का अर्थशास्त्र’ दो महत्त्वफूर्ग समसामयिक आधार स्रोत प्राप्त हैं । चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में मौर्यकालीन भारत की अर्थव्यबस्थक्च के संचालन और निंयामकनियंत्रक पदाधिकारियों के कर्त्तव्यों और पर्दो का उल्लेख किया है । इन पदाधिकारियों में आकराध्यक्ष का नामसंकेत हुआ हे और उसके कर्त्तव्याधिकार में मूल्यवान पत्थरों की खानें तलाशना और उनका उरुरव्रनन करवाकर कीमती पत्थरों को खानों से निकालना था । इस कथन से प्रमाणित होता है कि मौर्यकाल में खनिज सम्पदा पर समुचित ध्यान दिया जाता था और यह कार्य सीधा राज्याधीन धा । खनिज राज्यक्रोष की आय का एक अंग था । खनिज उत्खनन के लिए आवश्यक औजारों और यंत्रों का निर्माण भी मौर्यकाल में अवश्य ही प्रचलित था । इस विभाग के अध्यक्ष का सम्बोधन धात्विकाध्यक्ष था । वह लोहा, ताम्र, सीसा और पारा आदि धातुओं द्वारा निर्मित वस्तुओं के उत्पादन में सहायता करता था । तृतीय पदाधिकारी लक्षणाध्यक्ष होता था जो रोप्य ओंर ताम्र धातुओं से निर्मित मुद्राओं के निर्माण कार्य का दायित्व वहन करता था । चौथा मुद्राधिकारी था जो मुद्राओं के भावों ‘और मूल्यों का नियंत्रण करता था ।

मौर्यकाल में स्वर्णकार का भी उल्रेख हुआ है । इससे स्पष्ट होता है कि उस काल में चाँदी और सोने के आभूषण बनते थे और इनके प्रति समाज में रुचि थी । चाँदी और स्वणांदि धातुओं और इनसे निर्मित वस्तुओं, कारीगरों और सोनेचाँदी की मुद्राएँ बनाने के कार्य पर अंक अधिकारी नियत होता था । यह कार्य उसकी देखरेख में होता था ।
राजकीय आय का एक अन्य साधन कृषि था । कृषि उपज का निस्वित भाग कृषकों से कर के रूप में लिया जाता था । इस काल में राज्य की ओर से भी कृषि करवाई जाती थी । कृषि विभाग के अध्यक्ष को कोष्ठागाराध्यक्ष कहते थे । आर्थिक क्षेत्र में प्रधानत: व्यापारव्यवसाय का महत्व था । मौर्यकाल में वाणिज्यव्यवसाय का एक स्वतंत्र विभाग था । इसके नियंत्रक को पण्यस्थ्यक्ष के सम्बोधन से जाना जाता था । यह बड़ा अर्थशास्त्रि होता था और आयात-निर्यात की व्यवस्था करता था । कृषि कार्यं का अध्यक्ष सीताध्यक्ष कहलाता था ।

आय वृद्धि के क्षेत्र में वनसम्पदा का भी पर्याप्त महत्व था । यह रव्रनिज की भाँति ही राज्य की विशेष सम्पदा मानी जाती थी । वनों की रक्षा और आय नियंत्रक के पदाधिकारी को कुप्याध्यक्ष कहते थे । वानिकी को हानि पहुंचाने वालों को दण्डित किया जाता था। वनों से वनस्पति, पुष्प और सुगंधित पदार्थों के साथ-साथ जंगलों में मृत पशुओं के चमड़े हड्डियों और सींगों की भी खोज की जाती थी और उनसे लाभ उठाया जाता था ।
वस्तुओं के आयात-निर्यात पर कर लगता था । इसके लिए आधुनिक काल के चुंगी नार्को की तरह नगर द्वार पर माल को रोककर उगाहने की व्यवस्था थी । परन्तु दान और पूजा कीं सामग्री को करमुक्त भी कर दिया जाता था । व्यापारियों को व्यवसाय की वृद्धि के लिए प्रोत्साहित किया जाता था ।
मौर्यकाल में वस्त्र-निमाँण कला और उसके कलाविर्दो का बड़ा आदरास्पद स्थान था । वस्त्रकला को प्रोत्साहन और राजकीय अनुदान भी दिया जाता था । सूती रेशमी और फ्लो बरवों का तब प्रचुर मात्रा में निर्माण होता था । इस काल में मदिरा को भी आय का जरिया माना जाता था पर इसके विक्रय पर पूरा नियंत्रण रखा जाता था । इसका निर्माण राज्य के द्वारा किया जाता था और उसकी बिक्री के लिए स्थान निश्चित थे । कोई भी व्यक्ति विक्रय केन्द्र के बाहर बैठकर मदिरा पान नहीं कर सकता था और न ही गाव के बाहर लेकर जा सकता था । यद्यपि यह राज्य की आय का अच्छा साधन था पर उसके अवगुणों की ओर भी राज्य सचेष्ट ध्यान रखता था । इस विभाग के अध्यक्ष को सुराध्यक्ष कहा जाता था ।
राजकीय आय के उल्लिखित स्रोतों के समान ही सामुद्रिक व्यापार भी आय का एक प्रमुख अंग था । समुद्र के तटों पर आबादी होती थी, जिसे आधुनिक बन्दरगाह बस्तियों कह सकते है । इनमें मल्लाह, मछुए और समुद्रो में नाव आदि चलाने वाले रहते थे । नावों का एक बिभाग होता था । सामुद्रिक व्यापारियों की सुविधाअसुविधा का सम्यकृ ध्यान रखा जाता था । व्यापारियों की नावें क्षतिग्रस्त होने पर उनका राजकीय कर माफ कर दिया जाता था और उन्हें अपने व्यापार की क्षतिपूर्ति हेतु सहायता की जाती थी । विदेशी व्यापारकेब्दों और भारतीय क्षेत्रों की पर्याप्त जानकारी रखी जाती थी । यह
विभाग भी बडा महत्त्वपूर्ण माना जाता था । उत्पादन सामग्री के भण्डारण की भी व्यवस्था की जाती थी । देशी और विदेशी उत्पादनों के आयातनिर्यात और व्यापारिक सन्तुलन की ओर भी निगाह रखी जाती थी । बाहरी वस्तुओ से लाय उठाया जाता था और अपने स्वदेशीय निर्यात द्वारा भी लाभ प्राप्त किया जाता था । यह बिभाग एक सुदक्ष और अर्थ वैज्ञानिक के अधीन रहता था ।
जल मार्ग से व्यापार के अलावा स्थल मार्ग से किए जाने वाले व्यापार पर भी अर्थशास्त्र में विस्तार से प्रकाश डाला गया है । चाणक्य ने जल मार्ग के व्यापार को अधिक निरापद बताया है । इससे प्रकट होता है कि मौर्यकाल र्मे सडकों की व्यवस्था अच्छी थी । पाटलीपुत्र से पश्चिमोत्तर तक की सीमा पॉच सी कोस तक लम्बी थी । अतएव यह सिद्ध है कि मौर्य शासन में सामुद्रिक और स्थलीय दोनों ही पथों के माध्यम से व्यापार होता था । उक्त दोनों मार्गों की ‘सुरक्षा पर प्रशासन का पूरा ध्यान रहता था, जिसकी वजह से स्वदेश और विदेश दोनों ही स्थानों पर व्यापार होता था । इसके परिणामस्वरूप देश में सुख और समृद्धि थी । देश की आर्थिक स्थिति सुदृढ और लोगों की माली हालत अच्छी थी । विदेश से व्यावसायिक उद्देश्यों के आवागमन के लिए पासपोर्ट व्यवस्था का प्रचलन था । इस प्रकार जनजीवन की समृद्धि और राजकीय आय के लिए समुद्रो और स्थलीय व्यापार व्यवस्था उत्तम थी ।

भारत सदैव से ही कृषि प्रधान देश रहा है । कृषि की उन्नति के लिए एक स्वतंत्र कृषि बिभाग था । इस बिभाग के अध्यक्ष के कर्त्तव्यों में कृषि की उन्नति करना और कृषकों की सहायता करना मुख्य था । कृषकों को खेती की नई-नईं पद्धति बताने और उन्हें प्रशिक्षित करने की ओर पूर्ण ध्यान दिया जाता था । वर्षाजल आधारित कृषि के अतिरिक्त भ्रू-गर्मीय जल स्रोतों की ओर भी पूरी सावधानी बरती जाती थी ।
सम्राट चन्द्रगुप्त के शासन की यह खूबी और उसकी बुद्धिमत्ता व शासकीय योग्यता थी । उदाहरण है कि राष्ट्र, समाज और राज्य के हितार्थ तथा उन्नति समृद्धि के लिए सिचाई का एक अलप बिभाग था । मेगस्थनीज ने इस तथ्य को स्वीकार करते हुए लिखा है…’भूमि के अधिकतर भागों में सिंचाई प्रचुर मात्रा में होती हे । इसी कारण से वर्ष में दो फसलें होती हैं । ‘ इस विषय में वह आगे चलकर पुन: लिखता है कि-‘ राज्य के कुछ कर्मचारियों के जिम्मे यह कार्य है कि वे भूमि की नापजोख और नदियों का निरीक्षण करें । वे उन नालियों और छोटीछोटी शाखा नहरों की देखभाल किया करते हैँ जिनके द्वारा जल प्रधान नहरों से अन्य छोटीछोटी शाखा नहरों पें भी जल दिया जा सके ओर कृषकों को अपनी कृषि कीं आवश्यकता के अनुकूल जल मिल सके 1’ उपर्युक्त कथन की पुष्टि कौटिल्य के अर्थशास्त्र से भी होती है । उसने सिंचाई की चार प्रणालियों का नाम संकेत दिया है । हाथ से खींचकर, कंधों पर ले जाकर, यंत्रों द्वारा और नदी, तालाब, कूप, वापिका द्वारा उपजाई उपज से राजा कर रूप में उत्पादन का क्रमानुसार पाँचवां, चौथा, तीसरा और दूसरा भाग लेता था । राज्य की ओर से कुओं और बावडिर्यो के निर्माण और उनकी मरम्मत पर समुचित ध्यान दिया जाता था । कर वंचक व्यापारियों और विदेशी व्यापारिक वस्तुओं की गुणन व गुण के आधार पर जॉच-पड़ताल की जाती थी । इस कार्य के लिए गुप्तचर विभाग था । राजकीय आय के अन्य साधनस्रोतों में नमक उत्पादन भी एक साधन था ।

मौर्यकाल में जनगणना की पद्धति प्रचलित थी । इससे आर्थिक व्यवस्था में बडी सहायता मिलती थी । चन्द्रगुप्त के समय जनगणना का भी एक स्थायी स्वायत बिभाग था, जिसके कर्मचारी स्थायी होते थे । मेगस्थनीज कहता है कि इस विभाग के द्वारा जन्म और मृत्यु की सही जानकारी एकत्र की जाती थी । जन्म तिथि के अलावा मृतक की मृत्यु का कारण भी लिपिबद्ध किया जाता था । इससे देश में व्यापारिक, कृषि कर्म, गोपालन, शिल्प और मजदूरी आदि व्यवसायों अथवा कायों में कितने लोग लगे हुए हैं, इसका भी सही पता लग जाता था । जनगणना के आधार पर देश की जनसंख्या की बृद्धि अथवा घटती की जानकारी प्राप्त हो जाती है ।

विदेशी व्यापारियों के जानमाल की सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता था । उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती थी । देश त्यागकर अपने घर जाने वाले व्यापारियों की यथासंभव सहायता की जाती थी और विदेशी मृतक व्यापारियों का अन्तिम संस्कार करवाया जाता था । उनकी सम्पत्ति का उचित प्रकार से प्रबंध किया जाता था ।

इस प्रकार मौर्यकाल में देश की आर्थिक समृद्धि के लिए राजा की ओर से क्रियान्वित कार्यों का ऊपर विवरण दिया गया है । इसीसे स्पष्ट होता है कि उस काल में देश में धनधान्य का बाहुल्य था । व्यापार उन्नत अवस्थऱ पर था । राजकोष धन से परिपूर्ण था। प्रजा सुखी और समृद्ध थी ।

भारतवर्ष आर्थिक रूप में साधनसम्पत्र था । मोहनजोदड्रो, ,सरस्वती नदी की तटीय खुदाई, आहाड़ (मेचाड़) आदि के उरुरव्रनन से प्राचीनकालीन भारतीय स्थापत्य कला और उपलब्ध मृश्यात्रों की बनावट, कलात्मकता आदि के अध्ययन से इस दिशा में भारतीय शिल्पकला पर प्रकाश पड़ता है । यद्यपि मौर्यकाल के राजप्रासादों, भवनों और आवासगृहों का भौतिक स्वरूप आज देखने को प्राप्त नहीं है, परन्तु यह निश्चय ही कहा जा सकता है कि किसी भी क्षेत्र की कला के विकास की परम्परा का एक इतिहास होता है । इस यात्रा में लम्बा समय लगता है और वह अपने साथ किसी न किसी रूप में भूतकाल से जुडी रहती है ।
अतएव वर्तमान काल में भूगर्भ के नीचे दबी वस्तुओं की खोजों द्वारा प्राप्त उपकरणों से यह प्रमाणित होता है कि भारतीय स्थापत्य और शिल्पकला का अपना स्वयं का इतिहास है । इस क्षेत्र में प्राचीनकाल में भारत बहुत उन्नत था । भारतीय को शिल्पशास्त्र का श्रेष्ठ ज्ञान था और मौर्यकाल में तो भारतीय शिल्पकला उत्कर्ष की सीमा का स्पर्श भी करने लगी थी ।

शिल्पकला की प्राचीनता के सम्बन्ध में भास कृत रामायण की कथा में अत्या है कि अयोध्या नरेश दशरथ के देहावसान के बाद भरत जब अयोध्या में आया तो उसे एक मंदिर में ले गए, जिसमें पाषाणनिर्मित बहुत-सी प्रतिमाएँ रखी थीं । भरत उन मूर्तियों को देव’-प्रतिमाएँ समझ उनके चरणों में प्रणाम करने लगा तो वहॉ के प्रहरी ने कहा कि महाराज ये मूर्तियाँ देवताओं की नहीं हैँ, आपके पितृगणों की है, जिन्होंने देश पर शासन किया है । भरत ने प्रतिमाएँ देखते-देखते अन्त में अपने पिता दशरथ की प्रतिमा भी देखी । भरत ने उस रक्षक से पूछा, ८क्यों जी! क्या जीवित लोगों की भी मूर्तियों रखी जाती हैं? ‘ इस पर उसने उत्तर दिया-‘नहीँ महाराज, केवल मृत राजाओं की ही मूर्तियाँ रखी जाती हैँ ।’ भास ने ऐसे मंदिरों का नाम ‘देवकुल’ दिया है । संभवत: इस देवकुल शब्द से ‘देवली’ शब्द रूप बना है । भास के इस कथन से लगता है कि मौर्यकाल में मू-र्ति निर्माण कला का पर्याप्त विकास हो चुका था और मृतकों की स्मृति में देवलियाँ अथवा स्मारक बनवाने की परम्परा थी ।

मौर्यकाल में आवास गृहों और दुर्मादि का भव्य स्वरूप था । यह हम मेगस्थनीज के वर्णनों से ज्ञात कर सकते हैँ । उसके वर्णनों से पता चलता है कि सम्राट के बड़े-बड़े किले थे जो सुदृढ और अभिराम बनाए गए थे । उस काल में पत्थर के स्थान पर लकडी का अत्यधिक प्रयोग किया जाता था । उसने पाटलीपुत्र नगर के प्राकार को काठ का बताया है । इससे तत्कालीन काष्ठ कला के प्रयोग का ज्ञान मिलता है ।
यूनानी लेखकों द्वारा लिखित विवरणों से विदित होता है कि चन्द्रगुप्त का राजप्रासाद फारस के राजमहलों की तुलना में किसी भी रूप में कम नहीं था ।
सम्राट अशोक द्वारा निर्मित स्तूप और गिरि-गुफाएँ आज भी हमारे समक्ष हैँ जो यह साक्षी देती हैँ कि अशोक के समय में भारत पें पत्थर का प्रयोग प्रारंभ हो गया था और इमारते पत्थर की बनने लगी थीं । अशोक द्वारा निर्मित स्तूपों में साची का स्तूप प्रसिद्ध है । इनके अलावा गुफाएँ भी भारतीय शिल्पकला के सुन्दर उदाहरण हैं । इन गुफाओं में लोमश ऋषि की गुफा तो 33 फुट लम्बी और 19 फुट चौडी है । इसमें पत्थर काटकर एक सुन्दर सभागृह बनाया गया था । इस गुफा की छत, आंगन और दीवार अति भव्य और पॉलिशयुक्त हैं । सारनाथ से प्राप्त सिंहों की मूर्तियाँ तो अतीव ही सुन्दर और मनोरम हैँ । इससे प्रकट होता है कि मौर्यकाल में पत्थरों की तराशी का कार्य उन्नतावस्थर में पहुंचा हुआ था । विंसेंट स्मिथ ने अपनी पुस्तक में जॉन मार्शल का वाक्य उद्धृत किया है जिसमें सिंहमूर्तियों का वर्णन करते हुए उन्होंनै लिखा हे ।

‘वे सिंहं कला के प्रकार और उसके रूप में सर्वोत्तम तथा उच्च हैँ और उनकी उत्तम गढ़न प्राचीन संसार की इस प्रकार की कला में तथा भारतीय शिल्प में अद्वितीय है । ‘ अत: मौर्यकाल में निर्मित स्तूपों, गुफाओं और तत्कालीन लेखकों के वृतांतों के अध्ययन से यह प्रकट होता है कि वह काल कलाओं के क्षेत्र में समुन्नत और समृद्ध था ।

चितौड़ के मौर्य

मौर्य वंश के क्सि राजा ने चितौड़ क्षेत्र के आस-पास के प्रदेश पर अधिकार कर अपना राज्य स्थापित किया था, इसका कहीं भी कोई वर्णन तथा प्रमाण अभी तक उपलब्ध नहीं है । चित्तोड़ का दुर्ग और चित्तीड़ नगर का निर्माता चित्रांगद मौर्य शासक माना जाता है । इस तथ्य का ‘ कुमारपाल संम्रहम्’ में उलेख मिलता है 1 इस वंश को सूर्यवंशी लिखा है । ‘राज़रूपक’ में चित्रांगद मौर्य को चिसौड़ दुर्ग का निर्माता बताया गया है । ‘ चित्रकूट प्रबन्ध’ में भी उपर्युक्त तथ्य ही स्वीकार किया गया है । मेवाड में भी यही मान्यता प्रचलित है कि चित्तोड़ का दुर्ग और चित्रांग तालाब चित्रांगद मौर्य ने बनवाया था । चित्रांग तालाब अद्याविध स्थित है और इस्री नाम से जाना जाता है । महाराणा कुम्भा की कुम्भलगढ़ प्रशस्ति में भी चित्रांग तालाब का वर्णन है ।

चित्तोड़ के मौर्य शासकों के समय के जैन ग्रन्धों के उल्लेख अनुसार कन्नौज के शासक संभलीश ने चित्तोड़ पर आक्रमण किया था । मौर्यों के संभलीश से घमासान युद्ध लडा पर अन्त में पराजित होने का जोहर किया । राजा संभलोश मौर्य राजा के युद्ध में जीवित बचे पुत्र को चित्तोड़ का राज्य प्रदान कर, चित्तोड़. से कन्नौज लौट गया था ।
चित्तोड़ के उपर्युक्त मौर्यवंशीय शासकों के क्रम में राजा मान मौर्य के विस. 770 (ई. 713) का लेख प्राप्त हुआ है । यह लेख राजा मान द्वारा चित्तोड़ पर निर्मित मानसरोवर तालाब से सम्बन्धित है । उक्त लेख कर्नल जेम्स टॉड ने खोजा था, जिसे वह अपने साथ इंग्लैण्ड ले गया । इसलिए वह लेख अब उपलब्ध नहीं है, परन्तु उसका विवरण टॉड ने दिया है । उसमें उसने मौर्यबंश के महेश्वर, भीम, भोज और मान चार शासकों का संकेत दिया है, परन्तु उस लेख से यह स्पष्ट संकेत नहीँ मिलता कि महेश्वर और चित्रांगद के मध्य कितने और मौर्य राजा हुए। प्राप्त शिलालेख में महेश्वर को शत्रुओं का विनाशकर्चा लिखा है । उसने अवंति तक के भ्रू-भाग पर आधिपत्य जमा लिया था । उसका पुत्र भीम था । वह भी दुर्धर्ष वीर और युद्धकला में निष्णात था । भीम के पुत्र भोज ने शत्रु के हाथी का तलवार के एक ही प्रहार से शिरोच्छेद कर दिया था । सोमानी के अनुसार भीम को इन्द्रगढ़ के राठौड राजा नत्र के हाथों पराजित होना पडा था । फ़लत: मौर्यों के हाथ से मालवा निकल गया । इन मौर्य शासकों और नागदा के गुहिलोतों के सम्बन्ध अमैत्रीपूर्ण थे । नागदा के शासक अपराजित के सेनापति महाराज बराहसिंह ने मौर्यों पर आक्रमण किया था ।

भोज के पुत्र मान का एक लेख टॉड को मिला था और एक अन्य लेख विस. 770 (ईं. 71 3) का शंकर घट्टा में मिला हे । उसमें मान द्वारा तालाब और उतुंग महलों के निर्माण का वर्णन है । मान शक्तिशाली शासक था । उसके समकालीन चित्तीड़ निवासी हरिभद्र सूरि ने राजा मान द्वारा बसंतपुर के राजा गुणसेन पर आक्रमण करने का उलेख किया है ।

डा. दशरथ शर्मा के मत से मौर्य और राष्ट्रकूटों में मैत्री थी ‘और वे एक पक्ष में थे । उनका मानना है कि संभवत: चित्तोड़ के मौर्य शासक धरणीबराह की सभा में माघ कवि के वंशज हरमेरवला ने एक ग्रन्थ की रचना की थी । डा. शर्मा इसका समय वि. 887 ( ई. 831) मानते हैं । जबकि सोमानी लिखते हैं कि इसकी निश्चित तिथि निर्णित करने में कठिनाई होती है । इस पर विचार करने पर ऐसा प्रतीत होता है कि गुहिलोत्तों और प्रतिहारों में मैत्री थी । प्रतिहारों और मौर्यों में द्वेषता थी । यह मंडोर के शासक बाउक प्रतिहार के जोधपुर वाले लेख से ज्ञात होता है । दक्षिण के राष्ट्रकूट प्रतिहारों के विरुद्ध थे । राष्ट्रकूट गोविन्ददेब तृतीय ने विस. 863 (ई॰ 806 ) में चढाई की थी और वत्सराज प्रतिहार को हराया था । उसी चढाई में उसने चित्तोड़ पर भी अधिकार कर लिया था । मौर्यों ने उस आक्रमण में राष्ट्रकूटो का साथ दिया था । और अंत में गोविन्ददेव ने चित्तोड़ गुहिलोतों से छीन कर वापस मौर्यों को दे दिया था, जिस पर कुछ समय तक उनका अधिकार रहा। तदनंतर प्रतिहारों ने पुन: चित्तोड़ बिजय करके गुहिलोतों को लौटा दिया । तब फिर मौर्य उडीसा में चले गए। धरप्पीबराह के वंशज राजा रंक उदयबराह ने अपने लेख में चित्तोड़ से उडीसा में आगमन का लिखा है ।

चम्बल के मौर्य शासक

इस राजवंश का पूर्व वंशज राजस्थान के चित्तीड़ से किसी समय में हिमाचल की और चला गया था । कनिंघम को चम्बा क्षेत्र की अपनी खोज यात्रा में गुप्त लिपि में चम्बा के प्राचीन शासकों द्वारा उल्कीर्णित शिलालेख और बहुसंख्यक ताम्रपत्र मिले थे । इन शिलालेखों और ताम्रलेखों से चम्बा राजवंश के इतिहास पर सुन्दर प्रकाश पड़ता हे । उक्त प्राप्त अभिलेख से कनिंघम मानते हैँ कि चम्बा वंश भारत के प्राचीन राजवंशों में सबसे प्राचीन राजवंश है । उसने ईं. 550 के लगभग चम्बा राज्य की स्थापना व्यक्त की है । उसका अनुमान है कि इस शासक कुल के पूर्वजों ने नीचे से जाकर पार्वत्य भाग पर अपना राज्य स्थापित किया था । इस वंश की वंशावली बडी लम्बी है, जो अन्वेषित अभिलेखों और ताम्रलेखों के मिलान से सही सिद्ध होतीं है ।

वंशावली में इन्हें सूर्यवंशी और राम के पुत्र कुश की सन्तति में बताया गया है । चम्बा राजवंश वालों का मानना है कि उनके पूर्वजों ने चित्तोंड़ से आकर पहाडी भाग पर अपना राज्य स्थापित किया था । ईस्वी सम् 550 में चित्तोड़ पर मौर्यों का राज्य था और ये लोग सूर्यवंशी थे । इस बिषय पर इसी लेख में मौर्यों की उत्पत्ति के वर्णनान्तर्गत विस्तार से लिखा जा चुका है । अत: यह स्पष्ट हे कि चम्बा राजवंश वाले सूर्यवंशी हैँ और वितीड़ के सूर्यवंशी मौर्यों की ही एक शाखा हिमप्रदेश की ओर आईं थी ।
इस वंश का प्रथम शासक मरु था, जिसने पहाडी भ्रू-भाग पर अपने राज्य की आधारशिला रखी थी । इसने भरमोर बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया । वृद्धाबस्थक्व में उसने अपने पुत्र जयस्तंभ को राज्य सौंपकर सन्यास ले लिया था । जयस्तंभ का चौथा वंशानुयायी आदित्य वर्मा था । इसका पौत्र दिवाकर विक्रम और उसका पुत्र मेरुवर्मन था । यह भरमोर के शासकों में सर्वाधिक प्रतापी और वीर था । इसने अनेक इमारतों और देव मन्विरों का निर्माण करवाया था । उसके समय की प्राप्त विशाल मूर्तियाँ सर्व धातु की हैँ । इन पर मेरुबर्मन का नाम उल्कीपिति है । मेरुवर्मन ने अपने राज्य का काफी विस्तार किया । कनिंघम ने इसका शासनसमय 680 से 700 ईस्वी माना है ।

इस वंश का बीसवां राजा शाहिल वर्मन था । यह 920 ईं. में विद्यमान था । इसने लम्बे समय तक राज्य किया था । शाहिल वर्मन के राज्य में एक बार 84 योगियों की एक मंडली आई । राजा ने उनकी श्रद्धापूर्वक सेवाभक्ति की । उनके बरदान से शाहिल वर्मन के दस पुत्र और चम्पाबती नाम की एक कन्या का जन्म हुआ । शाहिल वर्मन ने रावी नदी की घाटी के नीचे का भाग और कतिपय छोटेछोटे राज्यों को जीता । कुछु बालों और शाहिल वर्मन में कोई बीस वर्ष तक युद्ध चला । इन युद्धों में योगी चरपटनाथ, राजा की एक रानी और राजकुमारी साथ रहतीं थी । राजकुमारी चम्पावती की इच्छा और चरपटनाथ की सलाह से राजा ने चम्पा को बसाया जिसका कालान्तर में ‘चम्बा’ नामकरण हो गया और भरमोर के स्थान पर इसे नवीन राजधानी का गौरव प्रदान किया ।
शाहिल की रानी नयनादेवी योग सिद्ध नारी थी । चम्बा क्षेत्र में उसका मन्विर है और उसकी देवो के रूप में पूजा होती है । शाहिल जैसा वीर था, वैसा ही धार्मिक भी था । उसने बिष्णु और लर्दमी नारायण के मंदिर बनवाए थे । कनिंघम का कथन है कि शाहिल और गजनी के तुरुष्ठकों के बीच युद्ध हुआ था और उसमें तुरुष्क पराजित हुए थे । इस विजय से इसका यश सर्वत्र फैल गया था ।

ईं. 1040 के लगभग शालिचाहन बर्मन हुआ । राजतरंगिणी में वर्णन है कि कश्मीर के राजा अनन्तदेव ( 1028 – 63 ) ने चम्बा के राजा शैला पर चढाई की थी । कनिंघम शालिवाहन क्रो ही शैला मानता है । इस युद्ध में चम्बा की पराजय हुई । राजा अनन्तदेव ने इसे पदच्युत कर इसके पुत्र सोम बर्मन को चम्बा का शासक बनाया । तदनंतर चम्बा की गद्दी पर कई राजा बैठे । ई. 1175 में बिजय वर्मन चम्बा का शासक बना । यह बडा वीर और योग्य शासक हुआ । इसने कश्मीर और लद्दाख पर आक्रमण कर वहॉ से खूब धन लूटा और अपनी सैन्य शक्ति में वृद्धि की ।

प्रतापसिंह बर्मन ई. 1559 में चम्बा के राज़ सिंहासनं पर बैठा । इसके और कांगड़ा के राजा के मध्य लडाई हुई । युद्ध मैं कांगडा की पराजय हुईं । इस अभियान में प्रतापसिंह वर्मन को काफी द्रव्य प्राप्त हुआ ।

प्रतापसिंह वर्मन के समय पें बिछी में मुगल बादशाह अकबर था । अकबर ने पहाडी राज्यों को मुगल आधिपत्य में लेने केलिए सैनिक चढाइयाँ कीं । परिणामत: पार्वत्य भाग के अन्य कतिपय स्वतन्त्र राज्यों की तरह प्रतापसिंह को भी मुगलों का आधिपत्य स्वीकार करना पडा । प्रतापसिंह के पौत्र जनार्दन के और नूरपुर के राजा के बीच युध्द हुआ । यह लडाई बारह बर्ष तक चलती रही । जनार्दन नूरपुर के राजा जगतसिंह के हाथ से मारा गया और चम्बा पर नूरपुर के राजा का अधिकार हो गया। राजा जनार्दन ने युद्धकाल में अपने पुत्र पृथ्वीसिंह को चम्बा से बाहर भेज दिया था । इसलिए वह जीवित बचा रहा। पृथ्वीसिंह मंडी में रहकर बड़ा हुअर ।

ई. 1641 में नूरपुर के राजा ने बादशाह शाहजहाँ के विरुद्ध विद्रोह कर दिया । उसका दमन करने के लिए शाही सेना भेजी गईं । इस सैन्थ अभियान की सहायता में पृथ्वीसिंह भी शाही सेना के साथ हो गया। जगतसिंह पराजित हो गया। तब शाहजादे मुरादबरदृश ने पृथ्वीसिंह को चम्बा वापस दे दिया । 1641 में पृथ्वीसिंह का उत्तराधिकारी उसका पुत्र छत्रसिंह हुआ । इसके शासनकाल में बादशाह औरंगजेब ने हिन्दुओं के मन्दिरों को ध्वस्त कर उनके स्थान पर मस्जिदें बनवाने की आज्ञा प्रसारित की । छत्रसिंह ने इस आदेश को स्वीकार नहीं किया और चम्बा के मन्दिर बच गए। वे मन्दिर अद्यावधि भी सुरक्षित विद्यमान है . छत्रसिंह के परचात् कई राजा चम्बा के शासक हुए । ईं. 1764 में नौ वर्ष की अल्याबस्थर में राजसिंह चम्बा की राजगद्दी पर बैठा । इसकी नाबालिगी में जम्यू का रणजीतदेब शासन कार्य का संचालन करता था । उसे दीवान के पद पर नियुक्त किया गया था । उससे प्रजा सन्तुष्ट नहीं थी और वह राजकोष का भी दुरुपयोग करता था । इसलिए वयस्क होते ही राजसिंह ने रणजीतदेब क्रो अपदस्थ कर बन्दीरवाने में डाल दिया । एक बार राजसिंह कहीँ अन्यत्र गया टुअर था । पीछे से रणजीतदेब के समर्थकों ने उसे कारावास से मुक्त कर चम्बा पर” अधिकार कर लिया । इस पर राजसिंह ने सिंक्खी की रामगढिया मिस्लवालों को एक लाख रुपया देकर सहायतार्थ बुलवाया और उनकी सहायता से जम्यू की सेना को राज्य सीमा से बाहर खदेड़ा ।

राजसिंह ने ईं. 1782 पर वंसाली पर हमला कर उस पर अधिकार कर लिया । फिर उनसे एक लाख रुपये सैन्य ठयय के लेकर बापस उन्हें लौटा दिया । तदनंतर जैलसिंह और उसके बाद चरहटसिंह छह वर्ष की अवस्था में चम्बा का शासक बना । उसके बाल्यकाल में राज्य शासन उसकी माता देखती थी । इसकी गद्दीनशीनी के एक वर्ष बाद ही 1809 में पंजाब के राजा रणजीतसिंह ने चम्बा पर आक्रमण कर दिया । उसे काफी धन देकर चम्बा की रक्षा की गई और उसे वापस लौटाया गया । पर वस्तुत: एक प्रकार से चम्बा लाहौर (पंजाब) के अधीनस्थ राज्य के रूप में बन गया ।

चरहटसिंह की मृत्यु के समय ई. 1844 में श्रीसिंह सिर्फ पांच बर्ष का था । पंजाब के महाराणा रणजीतसिंह की मृत्यु के बाद पंजाब की हालत बिगड़ गईं थी तथा प्रथम सिक्ख युद्ध में अग्रेजों ने सिवखाँ को हरा दिया था । अब जम्पू का महाराजा गुलाबसिंह बड़ा ताकतवर हो गया था । वह चम्बा को हजम कर जाना चाहता था । बजीर भागों स्वामी भक्ति से प्रेरित होकर लाहौर सर हैनरी लारेन्स के पास गया तथा सारी स्थिति से परिचित कराया। उसने भादरवा का इलाका तो गुलाबसिंह क्रो दिला दिया, परन्तु शेष चम्बा राज्य को अंग्रेजों के संरक्षण में लेकर 6 अप्रेल 1848 ईं. को राजा श्रीसिंह को सनद दे दी । इसके अनुसार चम्बा को 12 हजार रुपये सालाना अंग्रेजों को देना निश्चय हुआ । चरहटसिंह के कोई पुत्र नहीं था । इस पर उन्ही के वंश के गोपालसिंह को ई. 1870 में गोद बिठाया गया । दूसरी साल भारत के गवर्नर जनरल लाई मेयो चम्बा गए । राजा गोपालसिंह शासन नहीं चला सके । इसलिए उनके बडे पुत्र टीका श्यामसिंह के पक्ष में एबडीकेट कर दिया । श्यामसिंह बडे योग्य थे । इनके शासन में राज्य की बडी तरक्की हुईं । पुराना पैलेस अच्छी हालत में नहीं था, इसे नया बनवाया गया ।

इनकी शासन व्यवस्था बडी उत्तम धी । जिसकी प्रशंसा लॉर्ड कर्जन ने अपनी चम्बा यात्रा के समय की थी । इन्होने अपने छोटे भाई भ्रूरीसिंह क्रो वजीर बनाया । कुछ वर्ष बाद इनकी तबीयत बडी खराब रहने लगी । इनके कोई पुत्र नहीं था, इसलिए अंग्रेज सरकार को लिखा कि मैं मेरे भाई भ्रूरीसिंह के पक्ष में एबडोकेट कामां चाहता हूँ। पहले तो सरकार ने नहीं माना, परन्तु बाद में इनके ज्यादा जोर देने पर इसे स्वीकार का लिया गया।

सन् 1904 में भूरीसिंह चम्बा के राजा बनाए गए । भ्रूरीसिंह का जन्म ई. 1869 में हुआ था । दूसरे बर्ष ई 1905 में राजा श्यामसिंह का निधन हो गया । राजा धूरीसिंह बड़े योग्य शासक थे । इन्होंने राज्य बडी योग्यता से चलाया। जनता बडी सुखी धी । राज्य में सुधार तथा उन्नति के अनेक कार्य किए गए, जिससे जनता बडी प्रसत्र थी । इनके दो पुत्र तथा दो पुत्रियाँ थीं । बड़े पुत्र टीका रामसिंह थे तथा छोटे केशरीसिंह । इनकी छोटी पुत्री कश्मीर के महाराजा हरिसिंह को ब्याही गई थी । इनकी ईं. 1919 में मृत्यु होने पर इनके बड़े पुत्र टीका रामसिंह चम्बा के राजा हुए । रामसिंह ने अपने भाई केशरीसिंह को वजीर बनाया । 8 दिसम्बर ई. 1924 में इनके पुत्र टीका लक्ष्मणसिंह का जन्म हुआ ।

केशरीसिंह के दो पुत्र हैं । बडे पुत्र गुलाबसिंह जिन्हें इतिहास का काफी ज्ञान है और दूसरे कंवर शेरसिंह हैं । राजा लक्ष्मणसिंहजी की रानी देवेन्द्रकुमारी राजस्थान के प्रतापगढ कीं राजकुमारी है । ये हिमाचल प्रदेश से विधायिका रह चुकीं हैं । इनके तीन पुत्र है । बडे प्रेमसिंह जो अब राजा है । दूसरे हेमसिंह और छोटे ब्रजेन्द्रसिंह है । इनकी पत्नी पिछली बार हिमाचल प्रदेश में विधायिका थीं । चम्बा राज्य का क्षेत्रफल 3 2 16 वर्ग मील था । बिटिशकाल में चम्बा शासकों को 11 तोपों की सलामी का सम्मान प्राप्त था ।

मौर्यों के अन्य राज्य

मौर्यों के मुख्य राज्य के समाप्त हो जाने के बाद भी मौर्यों के कई अन्य राज्यों के वर्णन मिलते है । ये राज्य मौर्य साम्राज्य के समय उनकी ही जाति वालों को जागीर के रूप में दिए गए होंगे, जो कि उनके सामन्त थे या मुख्य राज्य के समाप्त होने पर उनका खानदान इधरउधर फैल गया तथा कहीं-कहीं उन्होंने छोटेछोटे राज्य स्थापित कर लिये थे ।
ईसा ‘की सातवीं शताब्दी में एक मौर्यबंशी राजा पुराण वर्मा का उछेख मिलता . है । इससे प्रतीत होता है कि मगध और उसके आसपास के प्रदेशों में सातवीं शताब्दी तक भी उनके राज्य विद्यमान थे । इसी प्रकार बम्बई गजेटियर में प्रकाशित कई लेखों से ईसा की छठी सदी से आठवीं सदी में कोंकण और पश्विमीभारत में मौर्यंवंशियों के राज्य होने के प्रमाण मिले हैँ ।
ईं. 7 3 8 के कोटा (राज़-. ) के पास कंसवा के लेख में वहॉ के मौर्य शासक राजा धवल का वर्णन है । इससे प्रतीत होता है कि उस क्षेत्र में मौर्यों का राज्य था ।
वर्तमान शेखावाटी प्रदेश में लम्बे समय से योघेर्यो का राज्य था । मौर्यो ने उम्हें पस्विम की ओर धकेलकर वहाँ अपना राज्य स्थापित किया था । ऐसा उस प्रदेश में प्रचलित है । मरहठों में भी मौर्य हैँ, जो अब भी मोरी कहलाते हैँ । ये लोग महाराष्ट्र में हैं । वर्तमानमें मौर्य उत्तरप्रदेश में मथुरा, आगरा, फ़तहपुर सीकरी तथा मध्यप्रदेश के उज्जैन, इन्दौर और लीमाड़ जिलों में हैँ । मौर्यों के गोत्रादि निम्म प्रकार है । गोत्र-गौतम, प्रवंर तीन गौतम, वसिष्ठ, बार्हस्पत्य, वेद-यजुवेंद शाखावाजसनेयी सूत्रन्यारस्का ” गृहसूत्र, कुलदेव-खाण्डेराव, शुभ कार्य में मोर के पंख रखते हैं ।

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