चौल वंश का इतिहास

चौल वंश का इतिहास

चौल वंश दक्षिण भारत का प्राचीन राजवंश है। इसका वर्णन वाल्मीकि रामायण,नपाणिनि की अष्टाध्यायी तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलता है। इन ग्रंथों में चौल वंश को पांडव वंश की शाखा माना गया है। ये चन्द्रवंशी राजा थे चन्द्रवंशीय तीन भाइयों पांड्य, चौड़ (चौल) तथा चेरी के अपने-अपने नाम से ये तीन वंश चले। एक दूसरी धारणा के अनुसार भरतवंशी दुष्यंत की दूसरी पत्नी महती के करुरोम और द्वादश्व नामक दो पुत्र थे दूसरे पुत्र द्वादश्व के चार पुत्र कर्जीजर, केरल, पांड्य और चौल हुए। इनके नाम से ही इनके चार वंश चले। किसी समय ये दक्षिण भारत आ बसे और यहीं राज्य करने लगे। इस धारणा के अनुसार भी चौल चन्द्रवंशीय क्षत्रिय थे।


ईसा पूर्व चौथी सदी के काव्यायन, महाभारत तथा अशोक के शिलालेखों के अनुसार चौलों का प्रारम्भिक राज उरियारमें था। ईसा की दूसरी शताब्दी में इलारा चौल ने लंका विजय की तथा वहाँ काफी समय तक राज्य किया। फिर उरियार वंश में करिकेला प्रसिद्ध राजा हुआ। इसी के वंश में पोरुनर किला राजसूय यज्ञ किया। ई. तीसरी व चौथी सदी में चौलों की शक्ति कमजोर पड़ गई तथा ये सामंत मात्र रह गए। महाभारत व अशोक के शिलालेखों के अनुसार पांड्य के दूसरे भाई चौड़ का वश चौल वश कहलाया है। इस वश का राज्य उत्तर-पश्चिम पेटूनार नदियों के बीच में फैला हुआ था जिसमें तंजौर और त्रिचनापल्ली के जिले तथा पुटुकोट्टा का भाग शामिल था। इनकी राजधानी गंगकोड चोडरपुरम् जिला त्रिचनापल्ली थी। शिलालेखों से ज्ञात होता है कि चौल, चोरा और पांड्य जो स्वतन्त्र राज्य थे, का अस्तित्व उत्तरी और दक्षिणी भारत में भारी उथल-पुथल के बावजूद भी शताब्दियों तक बना रहा। उस काल को सगमकाल कहते हैं। सगमकाल का अनुमानतः समय ईसा की प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय शताब्दी में रहा होगा दक्षिण भारत के उस संगमकाल में चौलों ने महत्तवपूर्ण भूमिका अदा की। रानाडू व उरियार के चौल रानाडू (गुडप्पा जिला) के तेलगू चौल पल्लवों, चालुक्यों व राष्ट्रकूटों के सामंतनथे करीब नवीं शताब्दी तक अप्रसिद्धि में रहे चौल ने उरियार में सामंत के रूप में महत्तवपूर्ण भूमिका निभाई तथा अपना नाम और परम्परा को जीवित रखा। इनकी प्रारम्भिक राजधानी करिकल्ला थी।

उरियार (त्रिचनापल्ली के पास) के चौलों का इतिहास चौथी सदी से नौवीं सदी तक अप्रसिद्ध रहा। कलभरन वश का उस समय उस क्षेत्र पर अधिकार था। उरियार
निवासी समकालीन लेखक बुद्धदत्त लिखता है। व पांड्य उसके अधिकार में थे बुद्धदत्त के काबेरी पट्टम का शासक था। चोरा, चौल कि कलभरन वंश का अच्युत विक्रांत अनुसार अच्युत का शासन पाचवीं शताब्दी तक बताया जाता है। तेलगू राज्य के दक्षिण से कृष्णा में प्राप्त संस्कृत भाषा में लिखित प्राचीन पांड्य पत्रों के अनुसार पल्लव किसी दबाववश अपना नगर करिकल्ला चौलों के स्वामित्व में छोड़कर उत्तर की ओर चले गए थे, किन्तु पल्लव शिलालेख इस तथ्य की पुष्टि नहीं करते। पांड्यों एवं पल्लवों द्वारा कलभरनी को पराजित कर स्वतन्त्र राज्य की स्थापना के समय भी कहीं चौलों के राज्य का उल्लेख नहीं मिलता। पल्लव, चालुक्य एव पाड्य शिलालेखों में उनकी सेना आदि का विवरण अवश्य मिलता है।

तमिल साहित्य में भी चौल राजा-रानियों का उल्लेख प्राप्त होता है। संभवत: चौल, पांड्य व पल्लव अपने पैतृक घरों के आस-पास अधीनस्थ सामंत थे उन्होंने अपने प्रभाव में धीरे-धीरे वृद्धि की। एक दूसरे राज्य के राजाओं के साथ विवाह संबंध स्थापित कर आपसी सम्बन्धों को दृढ़ एवं विस्तृत बनाया तथा शैव मत व वैष्णव मत को बौद्ध व जैन धर्म के विरुद्ध समर्थन प्रदान किया। विजयल्ला जो चौल वंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है, उसने उरियार के पास में सामंत के रूप में मुखिया की हैसियत से कार्य आरम्भ किया। एक शिलालेख, जो रुन्दुगलम (त्रिचनापल्ली जिला) से प्राप्त हुआ है, उसमें ‘पाराकेशरी विजयल्ला’ चौलदेव का उल्लेख मिलता है यह शिलालेख विजयह्ला द्वारा भूमिदान के सम्बन्ध में है। चौलों के पतन के समय काबेरी क्षेत्र में उनका उल्लेख प्राप्त नहीं होता। संभवत: चौल राजकुमार अन्य क्षेत्रों में चले गए थे, जहाँ छोटे-छोटे चौल राज्य थे, जैसा कि तेलगू एवं कन्नड़ राज्यों से विदित होता है । इनमें महत्तवपूर्ण रानाडू राज्य के चौल गुडप्पा, अन्नतपुर एवं कुरनूल जिलों में स्थित थे प्राप्त पत्रों एवं अन्य जानकारियों के अनुसार उस वंश के चार राजाओं के नाम का उल्लेख मिलता है। ये राजा थे- नन्दी वर्मन, उसका पुत्र सिन्हा विष्णु, सुन्दरानन्द और धनंजय वर्मन जो कि अन्तिम शासक महेन्द्र विक्रम वर्मन का पुत्र था उसके पुत्र गुनामादित्य और पुन्यकर्मा या प्रमुखरामा थे । ये अपने को करिकल्ला, चौल के वंशज और चौल राजा मानते थे, किन्तु उनके नाम पल्लव व चालुक्य वंश के नामोंसे मिलते हैं तथा उनकी शील पल्लव राष्ट्रकूटों से मिलती है।

चौल वंश का इतिहास
चौल वंश का इतिहास

पुन्यकर्मा के वंशज एक शताब्दी तक शासन में रहे गुडप्पा जिले में अपनी विशिष्ट स्थिति के कारण उन्होंने पल्लवों व चालुक्यों के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। पुन्यकर्मा के बाद उसके वंशजों का गुडप्पा से अधिकार संभवत: समाप्त हो चुका था और वे दक्षिण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चले गए। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार धन्य कटका के दक्षिण पश्चिम के 200 मील के विस्तृत रानाडू राज्य पर चौल महाराजाओं का राज्य था। यह क्षेत्र जंगलों से आच्छादित था जिसमें कहीं-कहीं थी। राज्य की जलवायु गर्म व नर्म थी। यहाँ के लोग तीर्थकरों को मानते थे । देव मन्दिर कम तथा दिगम्बर मन्दिरों की बहुलता थी।

तंजौर के चौल

चौल वंश का वास्तविक इतिहास नवीं सदी के द्वितीय चतुर्थ से प्रारम्भ होता है जब विजयल्ला सामत से राज्य प्रमुख के रूप में उभर कर सामने आता है। विजयल्ला (विजयराज)-( ई. 850 से ई.871 ) तंजौर के चौलवंश का संस्थापक विजयल्ला, पल्लव सामंत था। उसके वंश ने दो शताब्दियों तक शासन किया। विजयल्ला उरियार के निकट शक्ति में आया, जो संगमकाल में चौलों की राजधानी था। एक शिलालेख में पाराकेशरी विजयल्ला चौलदेव का उल्लेख मिलता है। विजयल्ला के बाद चौल राजा भी पाराकेशरी व राजकेशरी का खिताब अपने नाम के साथ लगाते रहे हैं। हालांकि वंशावली के आधार पर उरियार शासकों (करिकल्ला व उसके उत्तराधिकारियों)से संबंध स्थापित नहीं होता, फिर भी उरियार क्षेत्र में चौलवंश का अभ्युदय महत्त्वपूर्ण है। विजयल्ला सम्भवत : ई. 850 से ई. 871 तक तंजौर का शासन करता रहा।


विजयल्ला ने मुक्तरयार से तंजौर जीती, जिसका मुख्यालय तंजौर के निकट संदली था। ये पहले पल्लवों के और बाद में पांड्यों के शासक थे। पांड्यों व पल्लवों के खुले संघर्ष में विजयल्ला ने अपने पल्लव शासक की ओर से तंजौर पर विजय प्राप्त की। विजयल्ला ने
संभवत: कावेरी क्षेत्र में अनिश्चितता का लाभ भी उठाया। तंजौर विजय के बाद उसने दुर्गा के मन्दिर का निर्माण कराया। वह स्वयं शैव मतावलम्बी था तथा उसके अनुयायी भी शैवमत के अनुयायी थे उसने जिन क्षेत्रों पर अधिकार किया, वे वैलारनदी के उत्तर दक्षिण के मध्य तथा कावेरी व कोलेरुन के निचले क्षेत्रों के भाग थे।


आदित्य (प्रथम)- (ई.871 से ई. 907) विजयल्ला के पुत्र और उसके राज्य के उत्तराधिकारी आदित्य प्रथम ने श्री पूराम्बियम के युद्ध में पल्लव राजा अपराजित की ओर से जो उसका प्रमुख था, भाग लिया। इस युद्ध में पांड्यों की बुरी तरह पराजय हुई। कुछ समय बाद आदित्य के मन में स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की अभिलाषा, वश की प्रतिष्ठा बनाए रखने की भावना कीनउत्प्रेरकता तथा पल्लवों की सैन्यिक कमजोरी देखकर ई. 891 में पल्लवों पर आक्रमण किया। इस युद्ध में आदित्य की विजय हुई और पल्लव राजा अपराजित मारा गया । टोडामंडलम चौल राज्य में मिला लिया गया।

दक्षिण के पल्लव वंश का अन्त हो गया और चौल वंश दक्षिण की प्रमुख राज्य शक्ति के रूप में उभरने लगा । इसके बाद आदित्य ने पांड्यों से कांगू देश (कोइम्बटूर व सेलम जिलों) तथा पश्चिमी संघ को जीत लिया। इस विजय में चेरी राजा सथानुरावी ने आदित्य को सहयोग दिया था। आदित्य का पश्चिमी संघ की राजधानी तलकाट पर भी अधिकार हो गया। पृथ्वीपति द्वितीय ने आदित्य की प्रभुसत्ता स्वीकार कर ली। आदित्य ने पल्लव राजकुमारी से विवाह किया, जिससे दो पुत्र हुए। आदित्य ने शिव मन्दिरों का निर्माण कराया, जिससे चौल वंश का बीजारोपण हुआ। आदित्य के नेतृत्व में वास्तविक
चौल शक्ति के रूप में उभर चुकी थी। आदित्य विलक्षण योग्यता, शक्ति और चतुराई का धनी था।
वास्तविक चौल वंश का सस्थापक था। परन्तक (प्रथम) – ( ई.907 से ई. 953) आदित्य प्रथम के बाद उसका पुत्र परन्तक राज्य का उत्तराधिकारी बना,जिसने 45 वर्ष तक शासन किया तथा सफल सैनिक अभियानों के माध्यम से चौल साम्राज्य का विस्तार किया। सैनिक अभियान में पश्चिमी संघ, केरल तथा कोदम्बलर उसके विशेष
सहयोगी व मित्रवत् रहे।


परन्तक ने शासन सम्भालने के तुरन्त बाद (प्रथम राज्य वर्ष) मदुरा पर आक्रमण किया तथा विजय प्राप्त कर ‘मदुरान्तका’ (मदुरा का विजेता) उपाधि धारण की । पांड्य राजा राजसिन्हा ने मदुरा राज्य पुन: प्राप्त करने के लिए सिलोन के राजा के साथ मिलकर ई. 915 में परन्तक पर आक्रमण किया जो वैल्लर के युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है । इंस युद्ध में पांड्य और सिंहली (सिलोन) संयुक्त रूप से पराजित हुए। ई. 920 में पांड्य राजा राजसिन्हा लंका भाग गया । परन्तक ने ‘मदुरैयम इलामुनकोंडा’ (मदुरा व सिलोन का विजेता) की उपधि धारण की। मदुरा विजय कोई आसान काम न था, बल्के परन्तक अपने शासन काल के आधे समय तक इसके लिए जूझता रहा। शेष शासनकाल में उसने राज्य में व्यवस्था स्थापित करने के प्रयास किए।

ई.915 के करीब परन्तक ने पृथ्वीपति द्वितीय व पश्चिम संघ के राजा के सहयोग से बानाओं को भगा दिया तथा पृथ्वीपति को बनाधिराज हस्तीमल, की उपाधि प्रदान की। ई. 915 में ही परन्तक ने रानाड़ू के बेदम्बस को पराजित किया, जो बानाओं का मित्र था। परन्तक ने वैलाल (तिरुबल्लम उत्तरी अमरकोट जिला) में निर्णायक युद्ध लड़ा, जिसमें पल्लवों की शेष शक्ति को समाप्त कर नेल्लूर के उत्तरी भागों पर अधिकार कर लिया। इन विजयों से चौल राज्य की सीमाएँ उत्तरी पैनार से कैप कामरीन तक (पश्चिमी तट को छोड़, जो केरलों द्वारा शासित था) समस्त दक्षिण भारत को छूने लगी। किन्तु चौल शक्ति की इस वृद्धि के कुछ समय बाद ही राष्ट्रकूट राजा कृष्णा

तृतीय ने संघ के प्रधान बुटुगा द्वितीय के सहयोग से टोडामंडलम पर आक्रमण कर दिया। ई. 949 में ठाकोलम के इस निर्णायक युद्ध में चौल परन्तक पराजित हुआ तथा राजकुमार राजादित्य मारा गया । इससे परन्तक की साम्राज्यवादी इच्छाओं पर तुषारापात हुआ।
परन्तक के हाथ से न केवल टोडामंडलम ही निकल गया, बल्कि पांड्य राजाओं से उसका नियन्त्रण भी समाप्त हो गया| परन्तक शिव भक्त था। चिदम्बरम में नटराज का मन्दिर उस समय की शिल्पकला का अनूठा उदाहरण है, जिसकी छत पर सोने की नक्काशी का उत्कृष्ट कार्य किया गया है। परन्तक का अगले 32 वर्षों तक चौलों का राज्य लुप्त प्राय: सा रहा। 953 में देहान्त हो गया और ई. 957 से ई. 973 के बीच चौल राजा सुदर्शन न वीर पांड्या व सिंहली गठबन्धन को पराजित कर राष्ट्रकूटों से टोडामंडलम पुन: जीत लिया, किन्तु इसका कोई स्थाई राजनैतिक लाभ नहीं मिला।

राजराजा प्रथम (ई. 985 से ई. 1014)

सुदर्शन चौल के पुत्र राजराजा प्रथम का शासन चौलवंश के साम्राज्य की महत्त्वपूर्ण शुरूआत थी। राजराजा (जिसे राजाराम भी कहते हैं) ने पश्चिमी संघ के राज्यों को जीतकर अपने साम्राज्य में शामिल कर लिया तथा चालुक्यों के साथ युद्ध आरम्भ किया।
राजराजा ने दक्षिण में केरल के राजा को पराजित कर उसकी नौसेना को कंडालूरसाली (त्रिवेन्द्रम) में नष्ट कर दिया। कोलम (स्कीलोन) पर आक्रमण किया । पांड्य राजा को पराजित कर मदुरा पर अधिकार स्थापित किया। उसके पश्चात् उदगी (कुंडमाली) पर विजय प्राप्त कर पांड्य और केरल राज्यों के विरुद्ध विशेष स्थिति प्राप्त कर ली। मालदीप पर नौसैनिक शक्ति से अधिकार कर सिलोन पर आक्रमण करके उसके उत्तरी भाग पर अधिकार कर लिया।


राजराजा पूर्वी व पश्चिमी चालुक्यों में गठबन्धन न हो इसके लिए पूर्वी चालुक्यों के मामले में हस्तक्षेप करने लगा राजराजा ने वेन्जी विजय कर वहाँ शक्तिवर्मन को राजा बना दिया तथा अपनी छोटी बहन कुंडली का विवाह शक्तिवर्मन से कर दिया। यह रिश्ता दक्षिण की भावी राजनीति में महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ। राजराजा ने कलिंग संघ को पराजित किया। यह इसलिए आवश्यक था, क्योंकि कलिंग संघ का राजा वेजिनी को हड़पने के
लिए दृष्टि जमाए हुए था।


वनन राजराजा दक्षिण भारत का महान शासक था, जो वास्तव में महान कहलाने का अधिकारी था। उसने अपने राज्य में महत्वपूर्ण प्रशासकीय सुधार किए जो भारतीय इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उसने ई. 1000 में भूमि सुधार कानून लागू किए तथा राज्य में स्वायत्त शासन की स्थापना की। उसने ई. 1012 से अपने पुत्र राजेन्द्र को अपने साथ रख प्रशासनिक अनुभव प्रदान किया। राजराजा का यह प्रयास उसके बाद उत्तराधिकार का संघर्ष टालने में भी सहायक सिद्ध हुआ। राजराजा द्वारा निर्मित ‘राजराजेश्वर’ नामक शिव मन्दिर उसकी शिल्पकला का अद्वितीय नमूना है। राजराजा ने शैव मतावलम्बी होते हुए भी विष्णु-मन्दिर का निर्माण कराया। उसने जावा के राजा शैलेन्द्र महाविजयोतुंगवर्मन को बुद्धविहार निर्माण में सहयोग दिया। यह राजराजा की धार्मिक सहिष्णुता का परिचायक राजेन्द्र (प्रथम) राजराजा की मृत्यु के बाद ई. 1018 में राजेन्द्र चौलवंश की गद्दी पर बैठा, किन्तु उसका वास्तविक राज्यकाल ई. 1012 से ही आरम्भ हो जाता है जब वह युवराज घोषित किया गया था। उसी समय से उसे राजका्यों का पूरा अनुभव था। राजेन्द्र एक योग्य पिता की योग्य संतान था राजेन्द्र ने चौलवंश की कीर्ति को महानता पर पहुँचाया। दक्षिण में इसने पांड्यों, चेरा व सिलोन राज्यों को परास्त कर अपने अधीन कर लिया। उसने चालुक्यों को अनेक युद्धों में परास्त किया, पर उन पर स्थाई विजय हासिल नहीं कर पाया।

उत्तर में राजेन्द्र के दो सैनिक अभियान महत्त्वपूर्ण हैं। जिनमें पहला है- पूर्वीतट के कलिंग, ओडिरा (ओरिसा) व दक्षिण कौसल से बंगाल का अभियान। इसने दक्षिण पश्चिम बंगाल के तीन राजाओं के अलावा महान पालराजा महिपाल को परास्त किया। यह अभियान गंगातट तक जारी रहा। इसका उर्देश्य गगा का पवित्र जल लाना था, जो पराजित राजाओं के कंधों पर लादकर लाया गया। यह मात्र आक्रामक अभियान था, इससे चौल राज्य की सीमाओं में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं हुई।


राजेन्द्र का नौसैनिक अभियान

राजेन्द्र का दूसरा साहसिक नौसैनिक अभियान भारतीय इतिहास में अपना विशिष्ट महत्त्व रखता है। इस अभियान का उद्श्य शैलेन्द्र राजवंश पर विजय प्राप्त करना था। शैलेन्द्र का राज्य जावा, सुमात्रा, मलाया व उसके पड़ीसी द्वीपों पर था। शैलेन्द्र राजवंश, राजेन्द्र के पिता राजराजा का मित्र था, किन्तु राजेन्द्र का इस पर आक्रमण अज्ञात है। राजेन्द्र के नौसैनिक बेड़े ने बंगाल की खाड़ी को पारकर सुमात्रा के सामंतों व जावा, मलाया के पठार के काथा या कहरम (कोडाह) जो शैलेन्द्र के प्रमुख आधार थे, पर विजय प्राप्त की। राजेन्द्र महान की विजय-वैजयन्ती गंगा के किनारे से सिलोन तक तथा सुदूर द्वीप राज्यों जावा, सुमात्रा व मलय द्वीपो तक फहराने लगी। उस समय किसी भी राजा के पास इतनी शक्तिशाली नौसेना नहीं थी।

राजेन्द्र चौल वास्तव में भारतीय इतिहास में महान विजेता था, जो वास्तव में कन्डरगोन्डा और गन्गईकोंडा की उपाधि धारण करने का अधिकारी राजा था। उसने कोंडासोलापुरम नाम से नई राजधानी की स्थापना की। उसकी राजधानी भव्य भवनों एवं कलात्मक मंदिरों से सुशोभित थी। राजेन्द्र का 16 मील लम्बा सिंचाई कुण्ड-निर्माण महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। राजेन्द्र चौल ने वैदिक साहित्य की विभिन्न शाखाओं के अध्ययन हेतु एक विद्यालय की स्थापना की। राजेन्द्र चौल विजेता के साथ ही कला व शिक्षा का संरक्षक भी धा।

राजाधिराज

राजेन्द्र चौल का पुत्र राजाधिराज ईं. 1044 में गद्दी पर बैठा। वह ई. 1018 से ही अपने पिता के राजकार्यों में सहयोग करता रहा था उसके शासन का अधिकांश समय उसके पूर्वजों के विशाल साम्राज्य में होने वाले विद्रोहों को दबाने में ही व्यतीतहुआ। वह पाड्य व सिलोन एंव अन्य छोटे राजाओं के विद्रोहों को दबाने में पूर्ण सफल रहा। राजाधिराज ने चालुक्य साम्राज्य पर बड़े वेग से आक्रमण कर अपनी तलवार की आग से कहर ढा दिया। यह चालुक्य राजा सोमेश्वर के साथ कोटम्मा के युद्ध में मारा गया, किन्तु राजाधिराज का भाई विजय राजेन्द्र युद्ध जीत गया। राजेन्द्र ने युद्ध क्षेत्र में ही अपने को राजा घोषित कर दिया था। चौलों व चालुक्यों में अपने प्रभुत्व की स्थापना को लेकर अनके बार युद्ध हुए। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण युद्ध कुदाल संगम स्थान पर लड़ा गया था। विजय राजेन्द्र (जो ई. 1063 में राजा बना था) ने अनेक युद्धों में विजयश्री प्राप्त की। इसके बाद ई. 1070 में
इसका पुत्र गरद्दी पर बैठा, किन्तु एक वर्ष के अन्दर ही उसे राज्य त्यागना पड़ा। इसके बाद चौल साम्राज्य कोलतुंग प्रथम के अधिकार में आ गया।

कोलतुंग प्रथम

पूर्वी चालुक्य राजा राजराजा का पुत्र अपने रक्त सबंधों के आधार पर स्वयं को चौल वंश का उत्तराधिकारी मानता था। उसके पिता की माँ राजराजा महान की लड़की थी। उसकी माता राजेन्द्र गनाई कोंडा चौल की पुत्री थी। वह स्वंय कोप्पाम विजेता चौल राजा राजेन्द्र की पुत्री को ब्याहा था। इन्हीं सब आधारों पर वह स्वयं को चौलवंश का उत्तराधिकारी मानता था। उसने विजय राजेन्द्र के पुत्र अधिराजेन्द्र के विद्रोह को कर ई. 1070 में चौल सिंहासन पर दृढ़ता से अधिकार कर लिया था। कोलतुंग वीर एवं महत्तवाकांक्षी शासक था। उसने अपने ई, 1070 से ई. 1118 तक के सुदीर्घशासन में चालुक्य आक्रमणों को सफलतापूर्वक दबा दिया, जिसमें कुचल राजा विक्रमादित्य छठे का विद्रोह भी शमिल था, किन्तु उसके राज्यकाल में सिलोन स्वतंत्र हो गया था।

कोलतुंग ने अपने पुत्र को वेन्जी का राज्यपाल नियुक्त किया तथा कलिंग के अनन्तवर्मा को पराजित किया 1118 में विक्रमादित्य छठे ने वेन्जी पर अधिकार कर लिया। उसी समय होयसल वंश का अभ्युदय चौल राज्य के लिए घातक सिद्ध हुआ। होयसलों ने चौलों को कावेरी नदी के पास खदेड़ कर मैसूर के पठार पर अपना राज्य स्थापित कर लिया। कोलतुंग के राज्यकाल में दो बार भू-सर्वेक्षण कराया गया था। कोलतुंग के बाद के 100 वर्षों तक ई. 1216 तक उसके उत्तराधिकारियों का शासनकाल राजनैतिक शून्यता का काल था, जिसमें अनेक सामंत राज्यों का उदय हुआ। रानाडू के तेलगू, चोड, बाना व कादव प्रमुखत: उभरे तथा होयसलों, पांड्यों व कलिंग के पूर्वी संघ व काकतियों की शक्ति में तेजी से वृद्धि हुई। इन घटनाओं का प्रभाव राजेन्द्र तृतीय के शासनकाल (ई. 1216 से ई. 1 246) में स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगा था वह पांड्यों द्वारा कई बार पराजित किया गया और उसकी राजधानी पर भी पांड्यों ने अधिकार कर लिया। होयसलों ने भी शक्तिशाली राज्य की स्थापना की ली। एक अवसर पर चौलों के सामंत ने ही चौल राजा को कैद कर लिया, जो इस शक्तिशाली राज्य के पतन का सूचक था। राजेन्द्र तृतीय ने पांड्यों के विरुद्ध आंशिक सफलता अर्जित की, किन्तु गनपति काकतिया ने ई.1250 में कांची पर अधिकार कर
पतनोन्मुख चौलवंश को करारा आघात पहुँचाया। जटवर्मन सुरेन्द्र पांड्या ने असमंजस की स्थिति का लाभ उठाते हुए उत्तर की ओर प्रस्थान किया तथा चौलों, होयसलों व काकतियों को पराजित कर नैलोर पर विजय प्राप्त कर ली। अब राजेन्द्र पांड्यों का मात्र सामंत ही
रह गया। चौल साम्राज्य का मलिक नबी काफर के ई. 1310 के आक्रमण ने अन्त कर दिया, जिससे चौल साम्राज्य सदा के लिए समाप्त हो गया।

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