प्राचीन भारत का गौरवशाली वंश : गुहिलोत

प्राचीन भारत का गौरवशाली वंश : गुहिलोत

गुहिलोत सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं। इनका गौत्र वैजपाय (वैजवापायन ) है। प्रवर तीन हैं-कच, भज और मेश। कुलदेवी वाणमाता, वेद-यजुर्वेद, शाखा-वाजसनेई, सूत्र- पारस्कर, गुरु-वशिष्ठ, ऋषि- हारित, इष्ट- एकलिंगजी, झंडा-लाल, चिह्न-सुनहरा सूर्य.और नदी-सरयू है। इस वंश का गोत्र कहीं गौतम और कश्यप भी पाया जाता है।
गुहिलोत अयोध्या नरेश सम्राट राम के पुत्र लव के वंशज हैं। अयोध्या के बाद.यह वंश कहाँ -कहाँ रहा, इसका इतिहास में प्रामाणिक वर्णन नहीं मिलता। जैन ग्रंथों के
अनुसार जेम्स टॉड ने माना है कि शत्रुओं द्वारा वल्लभी राज्य पर आक्रमण कर दिए जाने.के समय वहाँ के तत्कालीन राजा शिलादित्य की रानी अपने पुत्र गुहदत्त को लेकर तीर्थाटन.करने के लिए मेवाड़ की तरफ आई हुई थी। ताम्रपत्रों के संवतों के मिलाने से गोहिल (गुहदत्त) शिलादित्य प्रथम का पुत्र प्रतीत होता है। इसी गुहदत्त के वंशज होने से यह वंश गुहिलोत कहलाया। उदयपुर राज्य का प्रसिद्ध इतिहास-ग्रंथ ‘वीर विनोद’ भी इनके वल्लभीपुर से आने की पुष्टि करता है। इनके नामों की समानता भी यही सिद्ध करती है कि गुहिलोत वंश वल्लभीपुर से सम्बन्धित है ।


ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जाय तो गुहिलोत वंश तथा वल्लभी वंश के नामों में समानता पाई जाती है, जैसे-गुह, गुहसेन और शिलादित्य के नाम जो दूसरे किसी वंश में नहीं मिलते। इसी प्रकार आहाड़ (मेवाड़) के शिलालेख में आनन्दपुर के ब्राह्मणों को मेवाड़ के शासक शक्तिकुमार द्वारा मान-सम्मान और आनन्द प्रदान करने वाला लिखा.गया है। वल्लभी के शासकों द्वारा भी आनन्दपुर (वडनगर) के ब्राह्मणों का सम्मान करना भी वहाँ के शिलालेखों में पाया जाता है। कुछ वल्लभी वंश के ताम्रपत्रों पर बैल की मुहर लगी होने से और इनके राज्य में बड़े शिवलिंग और पत्थर की न्दी की मूर्तियों के मिलने से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि ये राजा शैव थे। इसी प्रकार मेवाड़ के शासक भी शैव ही है। यह भी इनका समान कुल का होना प्रकट करता है।

गुहिलोत सूर्यवंशी हैं। ह्वेनसांग ने वल्लभी वंश को भी क्षत्रिय लिखा है तथा.वल्लभीपुर वाले भी अपने को सूर्यवंशी मानते थे । उपर्युक्त सभी समानताएँ यह सिद्ध करती.है कि मेवाड़ का गुहदत्त वल्लभीपुर वंश का ही था । इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा इन्हें वहल्लभीपुर से आए हुए नहीं मानते, परन्तु उन्होंने यह भी नहीं बताया कि फिर ये कहाँ से आए? उस समय के मेवाड़ प्रदेश में नागदा में सूर्यवंश के शासकों के विषय में डॉ. ओझा ने राजपूताने के इतिहास में लिखा है कि इस वंश में गुहिल के प्रतापी होने से उसके.बाद यह वंश गुहिलोत कहलाने लगा। शिलालेखों में भी इनकी वंशावली उसी से प्रारम्भ.की गई है। उस युग के इतिहास का अवलोकन करने से यह प्रतीत होता है कि गुहिल ने

प्राचीन भारत का गौरवशाली वंश : गुहिलोत
प्राचीन भारत का गौरवशाली वंश : गुहिलोत

अपनी शक्ति को बहुत बढ़ाया और उसने एक विस्तृत राज्य की स्थापना की। गुहिल का अभी तक कोई शिलालेख नहीं मिला है। इसलिए उसके सही समय के लिए कुछ भी नहीं कहा जा सकता, परन्तु उसके वंशज शिलादित्य के वि.सं. 703 (ई. 646) के लेख से
वर्षादि की फलावट के आधार पर ओझा ने गुहिल का अनुमानित समय ईस्वी 566 माना है। इस अनुमान में पाँच-दस वर्ष का अन्तर हो सकता है। ईस्वी 1869 में मि. कार्लाइल को आगरा से दो हजार चाँदी के सिक्के मिले थे,.उन पर श्री गुहिल लिखा है। कार्लाइल ने एक साथ इतने सिक्के मिलने से यह माना है कि.आगरा तक गुहिल का राज्य था। चाटसू के गुहिलवंशियों का भी शिलालेख मिला है। इससे यह सिद्ध होता है कि गुहिल ने वह प्रदेश भी आगरा की ओर से अभियान के समय विजय करके वहाँ अपने एक वंशज को स्थापित कर दिया था। इसी प्रकार अजमेर भू- भाग के नासूण गाँव से गुहिलवंशियों का लेख मिलने से वहाँ पर भी उनका राज्य होना सिद्ध होता है। मारवाड़ (जोधपुर) के खेड़ स्थान पर गुहिलों का राज्य था। जोधपुर का डीडवाना भू-भाग भी गुर्जर-मण्डल में माना गया है। जोधपुर के पाली जिले के पीपाड़ में भी गुहिलों का राज्य था । ये सारे राज्य गुहिल के राज्य के विस्तार की ओर संकेत करते 12 पूर्वी राज्यों की विजय के बाद गुहिल ने अपनी नजर दक्षिण की ओर डाली।


इसके सामन्त ने लाट के शासक निरुहला को परास्त किया और फिर नागों को पराजित करते हुए उसने विन्ध्याचल तक विजय पताका फहराई। मालवा में इससे कुछ पूर्व ही यशोधर्मन का शक्तिशाली राज्य था, जिसका सूबेदार अभयदत्त पारियात्र (अरावली) से नर्मदा तक के भू-भाग पर शासन करता था, परन्तु यशोधर्मन के मरते ही हम देखते हैं कि वह राज्य समूल नष्ट हो गया इसलिए अब दद्द को गुर्जर-सेनाओं के साथ नर्बदा तक कोई
रोकने वाला नहीं था दद् की राजधानी नदिपुर थी जो अब भड़ौंच के पास नन्देवाल नामक ग्राम है। दद्द ने अपने को गुजरानपतिवंश का माना है और गुर्जर नृपति का सामंत लिखा है।
कनिंघम को नरवर इलाके में गुहिल का सिक्का मिला था। वह भी नबेदा तक उसका राज्य होने की पुष्टि करता है। दद्द का समय उसके पौत्र के शिलालेखों के आधार पर ई. 560- 605 मानते हैं। ई. 571 और 588 के बीच गुहदत्त ने वल्लभी के शासक ध्रुवसेन (द्वितीय) को भी परास्त किया था। इसी से ध्रुवभट्ट ने अपना विरुद महाराज से बदल कर महासामत कर लिया था। इस प्रकार गुहिल ने वल्लभी को भी अपने साम्राज्य का एक अग बना लिया था।।उपलब्ध प्रमाणों का अध्ययन करने से यह निर्विवाद सिद्ध हो जाता है कि छठी सदी में
गुर्जर देश की शक्ति को एकत्र करके एक साम्राज्य का रूप देने वाला व्यक्ति गुहिल ही।था। उसका राज्य-विस्तार समग्र मेवाड़ (उदयपुर), मारवाड़ (जोधपुर), मध्य राजस्थान व।पूर्वी राजस्थान को पार करके आगरा तक हो गया था। दक्षिण में गुहिल ने मालवा तथा।लाट को करद या अधीनस्थ बना लिया था। मालवा से आगे बढ़ते हुए उसके सूबेदार द्द।ने नर्बदा नदी तक गुर्जरदेश की सीमा पहुँच दी थी। गुहिल की शासन व्यवस्था कैसी थी तथा सैनिक गठन किस प्रकार का था, इसका तो हमें कोई वर्णन नहीं मिलता है, परन्तु अनुमान यही होता है कि इतने बड़े साम्राज्य के संचालन के लिए उसने।शासन-प्रणाली गुप्तकालीन पद्धति के आधार पर ही रखी होगी। इतने बड़े राज्य की रक्षा के लिए सेना का संगठन भी सुदृढ़ होना जरूरी होता है। राजस्थान और काठियावाड़ के घोड़े सदैव ही श्रेष्ठ नस्ल के होते थे। अतएव उसकी सेना का बड़ा भाग घुड़सवार सेना ही रहा होगा। इसी प्रकार बीकानेर और जैसलमेर के ऊँट उत्तम होते हैं। लम्बे सफर तय करने के लिए ऊँट घोड़ों से भी अधिक द्रुतगामी होते हैं। उसकी सेना को लम्बे-लम्बे धावे करने होते थे इसलिए सेना में पैदलों की बजाय घोड़े और ऊँट ही अधिक मात्रा में होने चाहिए, बाद के युग में भी राजपूत सेना में पैदल सेना बहुत कम होती थी। विशाल राज्य की देखभाल तथा सुरक्षा के लिए प्रशासनिक व्यवस्था का सुदृढ़ होना भी अनिवार्य होता था। यशोधर्मन के बाद से लेकर और हर्षवर्धन के बीच के समय में उत्तर-पश्चिम भारत में गुहदत्त के अलावा इतना शक्तिशाली शासक दूसरा कोई भी नजर नहीं आता है। इसलिए हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचने में कि उस युग में इस पूरे भू-भाग का सम्राट गुहदत्त ही था, कोई दुविधा नहीं दिखाई देती। गुहदत्त द्वारा स्थापित यह साम्राज्य इसके पुत्र भोज के समय तक संगठित तथा व्यवस्थित रहा। इतिहास की घटनाओं को देखने से ऐसा विदित होता है कि गुहदत्त के पौत्र महेन्द्र के समय में कन्नौज का वंश शक्तिशाली होता जा रहा था।

प्रभाकरवर्धन ने गुर्जरदेश पर आक्रमण किया था। बाण ने ‘हर्ष चरित्र’ में प्रभाकरवर्धन को ‘गुर्जर प्रभाकर अर्थात् गुर्जर की निद्रा को भंग करने वाला लिखा है। इस आक्रमण के कारण वह महान् साम्राज्य विशृंखलित हो गया| इसी का लाभ उठाकर बुद्धराज कलचुरी ने भी वल्लभी से मिलकर अपने राज्य को वापस विजय कर लिया था और तब वल्लभी राज्य भी इनकी अधीनता से स्वतन्त्र हो गया इसके कुछ समय उपरान्त ही दक्षिण के प्रतापी नरेश पुलकेशी द्वितीय ने भी उत्तर की ओर आक्रमण करके गुर्जरदेश के दक्षिण भाग पर अधिकार कर लिया था। इस प्रकार वह विशाल साम्राज्य इन थपेड़ों को नहीं सह सका तथा उसके टुकड़े हो गए।

कन्हैयालाल माणिक्यलाल मुंशी ने माना है कि गुर्जरदेश का यह सम्राट मंडोर का हरिश्चन्द्र पड़िहार था तथा लाट का दद्द उसका चौथा पुत्र था। मंडोर के प्रतिहारों का इतिहास उस वंश के शासक बाउक और उसके पुत्र कक्कुक के तीन शिलालेखों से ही मिलता है। ये शिलालेख वि. 894 (ई. 837) और वि.सं. 918 के हैं। शिलालेखों में हरिश्चन्द्र को किसी राजा का प्रतिहार ही लिखा है व उसके पुत्र द्वारा मंडोर विजय करके वहाँ दुर्ग बनाना लिखा है। इस प्रकार हरिश्चन्द्र तो एक सामान्य सामंत ही था और उसके पुत्र भी भीनमाल और कन्नौज के प्रतिहारों के सामंत मात्र ही थे । ऐसी स्थिति में समझ नहीं आता कि मुंशी ने उसे बेबुनियाद ही सम्राट कैसे बना दिया? राजपूताने के इतिहास में ओझाजी शिलालेखों को मुख्य आधार लेकर चले हैं। तथा राजाओं के समय निर्धारण भी शिलालेखों की काल गणना पद्धति पर किया है। उनका यह निर्णय बड़ा सही है। इस आधार पर बाउक पड़िहार (प्रतिहार) मंडोर के शिलालेख के संवत् से फलाकर ओझा ने हरिश्चन्द्र का समय वि. 654 (ई. 597) निर्धारित किया है। इस प्रकार उसके पुत्र दद्द का समय ई. 617 बैठता है। उधर पूर्वोक्त दद्द का भृगुकच्छ पर अधिकार ई. S60 का मिलता है। प्रभाकरवर्धन का समय ई. 580 से 604 तक का है, जिससे गुर्जर शक्ति को बड़ा आघात पहुँचा था। इन सब वर्णनों से हरिश्चन्द्र का सम्राट होना तथा उसके पुत्र दद्द का भृगुकच्छ का विजेता होना सर्वथा आधारविहीन है। इसलिए मुंशीजी की उक्त स्थापना मान्य नहीं है। भृगुकच्छ के दद्द और उसके वंशजों को बूलर (Bhuler ) भीनमाल के गुर्जरवंश का मानता है। इसी विचारधारा का समर्थन मजूमदार भी करता है। इसके विपरीत मुंशी ने उन्हें हरिश्चन्द्र का पुत्र दद्द माना है और उसी को मानते हुए बी.एन.पुरी और बी. बी.मिश्रा ने भी उसी मान्यता को दोहराया है। जब इसे गहनता से देखते हैं तो बूलर और मजूमदार की मान्यताएँ अधिक ठोस प्रतीत होती हैं। भृगुकच्छ के भीनमाल अधिक नजदीक पड़ता है। ह्वेनत्सांग ने भी भीनमाल को गुर्जरदेश माना है । उसके विपरीत मंडोर काफी उत्तर में है। प्रथम का समय मिश्रा ने ईस्वी 580 माना है, जो कुछ पीछे भी जा सकता है।


ओझा ने हरिश्चन्द्र के वंशज बाउक के लेख से फलावट के आधार पर हरिश्चन्द्र का समय 597 ई. माना है। ओझा हरिश्चन्द्र के बारे में लिखता है कि ‘मंडोर के प्रतिहारों के उन तीनों शिलालेखों से हरिश्चन्द्र किसी राजा का प्रतिहार होना पाया जाता है। द्द उसका सबसे छोटा पुत्र था, उसके 25 वर्ष मानें तो द्द का समय ई. 622 आता है। इसके अनुसार भी भृगुकच्छ का दद्द मंडोर का नहीं हो सकता, उस समय तक तो हरिश्चन्द्र और पुत्र सामान्य सामंत ही थे। इन सब वर्णनों को देखते हुए हमें मानना होगा कि बूलर और मजूमदार की मान्यता अधिक ठीक है। इस प्रकार भूगुकच्छ का दद्द और उसके वंशज प्रतिहार नहीं थे। उस समय भीनमाल पर चापोत्कट (चावड़ा) वश का राज्य था। इस प्रकार दद्द आदि भीनमाल के चावड़ा थे न कि मंडोर के प्रतिहार । द्द के भीनमाल के सूर्य का इष्ट था। यह भी उसका भीनमाल के वंश का होना सिद्ध करता है।


इस वंश के प्रतापी शासकों में बाप्पा रावल (कालभोज) का नाम काफी चर्चित रहा है। बाप्पा ने चित्तौड़ के मौर्यों को परास्त किया था । इसके समय में विश्व शक्ति बड़ी तीव्र गति से बढ़ रही थी। खलीफा जहाँ-जहाँ पहुँचे, वहाँ की संस्कृति और धर्मादि को उन्होंने समूल नष्ट कर दिया तथा वहाँ के लोगों की धन सम्पत्ति लूटकर उन्हें कंगाल बना दिया। खून की नदियाँ बहाना उनका शौक था। स्त्रियों और बच्चों को गुलाम बनाकर बेचा जाता था। खलीफाओं के विजय कर लेने के कारण आज ईरान, मिश्र आदि देशों को अपनी महान् संस्कृति और धर्मों का पता भी नहीं है। उनकी क्रूरता के परिणामस्वरूप उन देशों की गौरवशाली अतीत की झांकियाँ भी देखने को नहीं मिलतीं। इतिहासकार उनके धर्म और संस्कृति को आज भी खोज रहे हैं । सिन्ध पर विजय प्राप्त कर विश्वविजयी बनने की दृढ़ इच्छा लेकर खलीफाओं ने गुजरात और राजस्थान की ओर बढ़ने की कोशिश की। उस महान् विप्लव को रोकने और उनका मुकाबला करने के लिए भीनमाल के नागभट्ट प्रतिहार और मेवाड़ के बाप्पा रावल ने अनेक राज्यों के राजाओं का एक बहुत बड़ा सशक्त संगठन बनाया, जिसमें लाखों की संख्या में सेना थी। इन भारतीय वीरों की तलवारों के मृत्युरूपी तांडव के सामने उन तथाकथित विश्वविजयी खलीफाओं को अपने प्राण बचाने मुश्किल हो गए। वहाँ से भागकर वे सिन्धु नदी के उस पार एक सुरक्षित स्थान पर चले गए।

खलीफा शान्ति होने पर बाप्पा रावल के संन्यास लेने के बाद खलीफाओं के देश पर फिर आक्रमण हुए और नागभट्ट प्रतिहार और बाप्पा के पुत्र खुमान प्रथम ने खलीफाओं को दुबारा परास्त किया। रावल खुमान प्रथम के कारण ही गुहिलोतों को ‘खुमाणा’ भी कहा जाने लगा। बाप्पा रावल और नागभट्ट प्रतिहार के सशक्त संगठन की खलीफाओं पर यह विजय निश्चय ही धर्म और देश के लिए भारतीय क्षत्रियों का महान् त्याग और सेवा थी। यदि वे खलीफाओं को परास्त नहीं कर पाते तो ईरान और मिश्र आदि देशों की तरह आज हमारा हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति भी अतीत में खो चुके होते। कई पीढ़ियों के बाद गुहिलवंशीय रावल सामंतसिंह अपर नाम समरसिंह प्रसिद्ध भारतीय सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय का समकालीन था समरसिंह ने पृथ्वीराज के सहयोगी के रूप में उसके साथ मिलकर मुसलमानों से अनेक युद्ध लड़े। वह पृथ्वीराज का संबंधी था। सामंतसिंह का
चतुर्थ वंशधर राव जैन्नसिंह हुआ। वह बड़ा वीर था। डॉ. ओझा के अनुसार उसकी राजधानी नागदा पर दिल्ली के सुलतान अल्तमश द्वारा आक्रमण करने पर उसने उसे पराजित किया था। जेत्रसिंह ने सिन्ध प्रान्त के मुसलमानों के वि.सं. 1305 (ई. 1248) के आक्रमण को असफल किया तथा मुसलमानों से अन्य कई युद्ध लड़कर उन्हें हराया था।


इस प्रकार मेवाड़ के प्रारम्भिक गुहिलवंशीय शासकों में खुमाण प्रथम के बाद जैत्रसिंह बड़ा शक्ति सम्पन्न शासक हुआ। इनकी तीन पीढ़ी उपरान्त रावल रतनसिंह हुआ। इतिहास प्रसिद्ध महारानी पद्मिनी इन्हीं रतनसिंह की रानी थी । दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन खिलजी ने ई. 1303 में रतनसिंह पर चढ़ाई की थी और चित्तौड़ में भयंकर युद्ध हुआ। राजपूत वीरों के मारे जाने पर महारानी पद्िनी के नेतृत्व में चित्तौड़ दुर्ग में राजपूत वीरांगनाओं ने जौहर किया था। इस प्रकार राजपूत योद्धा तो ‘केसरिया बाना पहनकर रण में जूझ मरे थे और राजपूत महिलाओं ने अग्नि-स्नान कर प्राण विसर्जन किया था। इस तरह 26 अगस्त 1303 ई. में राजपूतों ने अपने देश और भारतीय गौरव की रक्षार्थ बलिवेदी पर चढ़ जाने के बाद ही अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ के प्रसिद्ध दुर्ग पर अपना
झंडा फहरा पाया था। राजस्थान के इतिहास में यह घटना चित्तौड़ के प्रथम जौहर और शाका के नाम से प्रसिद्ध थे।


सिसोदिया मेवाड़ के रावल कर्णसिंह के क्षेमसिंह, माहप और राहप तीन पुत्र थे। रावल कर्णसिंह के निधन के बाद क्षेमसिंह चित्तौड़ की राजगद्दी पर बैठा तथा माहप और राहप को सीसोदा नामक गाँव जागीर में मिला। सीसोदा में निवास करने के कारण इनके वंशज सीसोदिया कहलाए।


राणा राहप की कतिपय पीढ़ियों के पश्चात् सीसोदा में राणा भुवनसिंह हुए। राणा भुवनसिंह के सम्बन्ध में राणकपुर से प्राप्त शिलालेख में उसे चौहानों और सुल्तान पर विजय प्राप्तकर्ता वर्णित किया है। भुवनसिंह के छोटे पुत्र का नाम चन्द्र था । चन्द्र की संतति चन्द्रावत सीसोदिया कहलाई। मुगलकाल में इनका राज्य रामपुरा भानपुरा (मध्य भारत) में था। मुगल सम्राट अकबर के समय में राव दुर्गा रामपुरा का शासक था। वह जहाँगीर के समय में चार हजारी मनसबदार था। राणकपुर अभिलेख में भुवनसिंह के प्रपौत्र लक्ष्मणसिंह को मालव प्रदेश के परमार शासक गोगादेव का विजेता अंकित किया है। लक्ष्मणसिंह के ज्येष्ठ पुत्र अरिसिंह का विवाह चौहानों की चन्द्राणा शाखा की वीर कन्या के साथ हुआ था। उसी चन्द्राणा रानी से अरिसिंह के राजकुमार हम्मीर का जन्म हुआ था। अलाउद्दीन के चित्तौड़ आक्रमण के समय रावल रतनसिंह के प्रधान राणा लक्ष्मणसिंह अपने पुत्रों सहित अलाउद्दीन की सेना से भीषण युद्ध करके बीरगति को प्राप्त हुए थे।

मेवाड़ के राणा शासक अलाउद्दीन के इस भीषण युद्ध में लक्ष्मणरसिंह का एक पुत्र अजयसिंह घायल होकर जीवित बच गया। जोधपुर के पाली भू-भाग के भुंजा बालेचा द्वारा सीसोदा के गाँवों पर हमले व लूटपाट से अजयसिंह ने अपने पुत्र सज्जनसिंह और क्षेमसिंह को मुंजा को मारने का आदेश दिया तथा उनके असफल रहने पर अजयसिंह ने अपने बड़े भाई अरिसिंह के पुत्र हम्मीर को भुंजा को मारने की आज्ञा दी। हम्मीर बड़ा बहादुर योद्धा था। उसने भुंजा बालेचा पर आक्रमण किया और उसका मस्तक काटकर अपने चाचा अजयसिंह को प्रस्तुत किया। उसके पराक्रम और पौरुष से मुग्ध होकर अजयसिंह ने मुंजा बालेचा से मस्तक के रक्त से हम्मीर के ललाट पर तिलक किया। इस घटना से रुष्ट होकर सज्जनसिंह और क्षेमसिंह मेवाड़ त्यागकर दक्षिण में चले गए। मेवाड़ के वंश में महाराष्ट्र के छत्रपति शिवाजी का होना बताया है।


जब अलाउद्दीन खिलजी के बाद के अन्तिम वर्षों में दिल्ली की खिलजी सल्तनत की राजनीतिक स्थिति कमजोर पड़ गई तब उसने चित्तौड़ का किला और वहाँ का शासन संचालन जालौर के मालदेव सोनगरा (चौहानों की एक शाखा) को सौंप दिया था। वह खिलजियों का आश्रित शासक था। राणा हम्मीर दुर्धर्ष वीर और अप्रतिम योद्धा था। वह येन-केन प्रकारेण अपने पूर्वजों का चित्तौड़ राज्य और किला लेना चाहता था, अतः निरन्तर चित्तौड़ प्रान्त पर आक्रमण करता रहता था। इस आए दिन की विपत्ति और आक्रमणों से बचने के लिए मालदेव ने अपनी पुत्री का हम्मीर के साथ विवाह किया। मालदेव के निधन के बाद हम्मीर ने उसके पुत्र जैसा (जयसिंह) से चित्तौड़ छीन लिया और कुछ समय बाद समस्त मेवाड़ पर अधिकार कर लिया। डॉ. ओझा वि.सं. 1383 के आसपास हम्मीर का चित्तौड़ लेना मानते हैं। वंश की ख्यातों में नर्सिंह मुहम्मद बिन ऐसा ओझाजी मानते हैं। भगवान एकलिंग के उपासक महाराणा हम्मीर के शासनकाल में दिल्ली के सुल्तान ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की। वह हम्मीर के आगे परास्त होकर भागा। तुगलक
हम्मीर ने रतनसिंह के बाद से ही बर्बाद मेवाड़ राज्य को पुनः उन्नत बनाया।

हम्मीर के पुत्र महाराणा क्षेत्रसिंह के राज्यकाल ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की। क्षेत्रसिंह ने उसे चित्तौड़ के रणक्षेत्र में पराजित किया। मालवा के सुल्तान अमीशाह दिलावरखाँ चूडा का त्याग महाराणा लाखा के ज्येष्ठ कुंवर चूंडा के लिए राठौड़ रणमल द्वारा अपनी बहिन हंसाबाई के सम्बन्ध हेतु नारियल आया तो वृद्ध महाराणा लाखा ने हँसी में कहा कि नारियल हम वृद्धों के लिए कौन भेजे? यह सुनते ही पितृभक्त चूंडा ने रणमल से कहा, आपकी बहिन की शादी मेरे बजाय महाराणा से कर दें। रणमल ने इसे अस्वीकार करते हुए कहा कि आप ज्येष्ठ पुत्र है, आपसे शादी करने पर हंसाबाई से होने वाला पुत्र राज्याधिकारी होगा, लेकिन महाराणा से शादी होने पर वह नौकर ही होगा इस पर चूंडा ने एकलिंगजी की शपथ खाकर कहा कि मैं इस बात का इकरार करता हूँ के आपकी बहिन को जो पुत्र होगा, वही मेवाड़ का स्वामी होगा और मैं उसका सेवक बनकर रहँगा। इस आशय का प्रतिज्ञा-पत्र लिखकर और पिता को बाध्य कर हंसाबाई से उनकी शादी करा दी। महाराणा के उससे मोकल का जन्म हुआ। महाराणा ने अन्तिम समय में अपने पुत्र बालक मोकल की रक्षा का भार चूडा पर छोड़ दिया। महाराणा लाखा के गुजरने पर जब हंसाबाई सती होने के लिए तैयार हुई तो चूंडा ने कहा कि मोकल अभी बच्चा है। और पूरे मेवाड़ का स्वामी है। मैं इसका सेवक मात्र हूँ। आप सती न होकर राजमाता बनकर प्रबन्ध संभालें। चूंडा ने मोकल को गद्दी पर बिठाकर पहला नजराना किया। जिस तरह की पितृभक्ति चूंडा ने प्रदर्शित की, वह राघवेन्द्र रामचन्द्रजी जैसी थी।

महाराणा कुंभा

महाराणा मोकल के पुत्र महाराणा कुंभा मुस्लिम काल के भारतीय नरेशों में सर्वाधिक प्रसिद्ध और प्रभावशाली महाराणा हुए। महाराणा कुंभा के पिता मोकल को महाराणा क्षेत्रसिंह की उप-पत्नी के पुत्र-चाचा मेरा और उनके सहयोगी महिपाल पंवार आदि ने मिलकर छल से मारा था। यह सूचना जब महाराणा मोकल के मामा मंडोर के राठौड़ रणमल्ल को मिली, तब वह सेना सहित चित्तौड़ आया। उसके भय से चाचा, मेरा और महिपाल चित्तौड़ से भागकर माडू के सुल्तान के पास चले गए। तब महाराणा कुंभा ने रिड़मल राठौड़ को साथ लेकर मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी पर चढ़ाई की। इस युद्ध में महाराणा की सेना में एक लाख सवार और 1400 हाथी थे। इस युद्ध में महाराणा ने सुल्तान को परास्त किया।

फरिश्ता लिखता है कि वि.सं. 1503 में सुल्तान महमूद खिलजी ने महाराणा कुंभा के मांडलगढ़ पर चढ़ाई की । इस युद्ध में भी वह विफल होकर लौटा, फिर उसने कई बार हार का बदला लेने की कोशिश की, लेकिन हर बार वह विफल होकर लौटा। यह बात ओझाजी ने सप्रमाण सिद्ध की है। फरिश्ता ने लिखा है कि वि.सं. 1513 में नागौर के नवाब फिरोजखाँ के मरने पर उसका बेटा शम्सखाँ नागौर का स्वामी हुआ, परन्तु उसके छोटे भाई मुजाहिदखाँ ने उससे नागौर छीनकर उसे बाहर निकाल दिया, जिससे वह भागकर सहायता के लिए महाराणा कुंभा के पास आया। शम्सखाँ की मदद हेतु राणा कुंभा ने नागौर पर चढ़ाई की तथा शम्सखाँ को वहाँ का नवाब बनाया, परन्तु शर्सखो ने जो वायदे महाराणा से किये थे, उस पर वह कायम नहीं रहा। तब महाराणा ने दूसरी बार नागौर पर चढ़ाई की। इस पर नागौर के नवाब शर्सखाँ ने अपनी मदद पर झुझनू के कायमखानी राजपूत नवाब शम्सखाँ प्रथम को बुलाया। महाराणा ने दोनों नवाबो को परास्त कर दिया तथा नागौर को लूटकर वापस लौटे। झुझुनू के नवाब ने महाराणा के विरुद्ध नागौर के नवाब की मदद की थी, इसलिए महाराणा कुंभा ने झुंझुनू पर चढ़ाई की। सोमानी भी झुंझुनू पर महाराणा सुल्तान का हमला करना मानता है। झुझुनू के नवाब शम्सखों प्रथम ने दिल्ली के लोदी बहलोल शाह को अपनी मदद पर बुलाया। झुझुनू के पास महाराणा का दिल्ली के सुल्तान युद्ध हुआ तथा उसने दोनों को परास्त करके झुझुनू को लूटा तथा तथा झुझुनू के नवाब से
उसके बाद वापस चित्तौड़ लौटा।

महाराणा कुम्भा
महाराणा कुम्भा

गुजरात के सुल्तान कुतुबद्दीन से महाराणा कुंभा के कई युद्ध हुए। उन सभी युद्धों सुल्तान को कहलवाया कि हम दोनों संयुक्त होकर महाराणा पर हमला करें। तब गुजरात और मालवे के सुल्तानों ने मेवाड़ पर चढ़ाई की। उन्होंने निश्चित स्थान पर एकत्र होकर महाराणा पर आगे बढ़ना तय किया था, परन्तु महाराणा कुभा ने उनके एक स्थान पर एकत्र होने से पूर्व ही तीव्र गति से आगे बढ़कर पहले गुजरात के सुल्तान को करारी हार देकर भगा दिया। उसके बाद लौटकर मालवे की सेना पर टूट पड़ा और उसे भी पूर्णरूपेण परास्त करके पीछे खदेड़ दिया। इस प्रकार महाराणा कुंभा ने अपने चारों तरफ के मुसलमान शासकों को अनेक में सुल्तान पराजित हुआ। तब गुजरात सुल्तान ने मालवा के बार युद्धों में परास्त किया।

महाराणा कुभा बड़ा उद्भट, वीर और रणनीति का ज्ञाता था। उसके पराक्रम और युद्ध संचालन के समक्ष मालवा, गुजरात और नागौर के सुल्तान अकेले तो क्या, सम्मिलित रूप से भी नहीं ठहर सकते थे। महाराणा ने अपने रणचातुर्य और युद्धकौशल से उनकी सम्मिलित नीति और युद्ध नीति को सफल नहीं होने दिया। महाराणा कुंभा एक कुशल शासक ही नहीं, बड़े विद्वान, विद्वानों के आश्रयदाता तथा संगीतादि विभिन्न ललित एवं स्थापत्य कलाओं के जानकारी और अनुरागी थे। उन्होंने महाराष्ट्री, करनाटी और मेवाड़ी भाषा में चार नाटकों की रचना की थी। महाराणा कुंभा ने सुल्तानों से विजय के उपलक्ष्य में चित्तौड़ का प्रसिद्ध विजय स्तम्भ बनवाया, जो शिल्पकला का अद्वितीय नमूना माना जाता है। महाराणा कुभा का 1468 ई में परलोकवास हुआ।

महाराषणा रायमल

महाराणा कुंभा के बाद उनके पुत्र रायमल महाराणा हुए। इनके राज्यकाल में सुल्तान म्यासशाह ने चित्तौड़ पर हमला किया। वि.सं. 1545 (ई. 1488) में उत्कीर्ण एकलिंग प्रशस्ति में लिखा है कि इस भयंकर युद्ध में महाराणा रायमल ने मालवा के सुल्तान
गयासशाह के गर्व का भंजन किया। महाराणा रायमल का बड़ा पुत्र राजकुमार पृथ्वीराज बड़ा साहसी, पराक्रमी और प्रचण्ड वीर था। मेवाड़ के इतिहास में उन्हें उड़ना पृथ्वीराज कहते हैं, क्योंकि वे इतनी तेजी से दुश्मन के पास पहुँच जाते थे, जिसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता था।

महाराणा रायमल की जीवितावस्था में ही राजकुमार पृथ्वीराज की मृत्यु हो गई थी। इनकी कुम्भलगढ़ के पास एक स्मारक बना हुआ है। स्मृति में राजकुमार पृथ्वीराज के असामयिक निधन के कारण महाराणा रायमल की मृत्युके बाद वि.सं. 1566 जेठ सुदी 5 (24 मई, 1509 ई.) के दिन द्वितीय राजकुमार संग्रामसिंह मेवाड़ के राज्यासन पर आरूढ़ हुआ। इनका जन्म वैशाख कृष्णा नवमी (12 अप्रैल, 1482 ई.) को हुआ। महाराणा संग्रामसिंह की सहायता से राठौड़ रायमल ईडर का स्वामी बना। गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर ने जब यह सुना तो उसने रायमल को अपदस्थ करने हेतु एक बड़ी सेना ईडर पर भेजी। रायमल ने गुजरात की सेना को हराकर भगा दिया। इस पराजय से मुजफ्फर बड़ा क्रुद्ध हुआ और अपने प्रसिद्ध वीर सेनानायक मुबारिजुल्मुल्क को ससैन्य ईडर पर भेजा। उसने जाकर ईडर पर अधिकार करा लिया। इस पर रायमल ईडर से भागकर चित्तौड़ पहुँचा। महाराणा संग्रामसिंह ने एक सबल सेना लेकर ईडर को प्रयाण किया मेवाड़ की सेना के ईडर के समीप पहुँचने से पूर्व ही मुबारिजुल्मुल्क ईडर से भागकर अहमदनगर के किले में जा बैठा और को अपनी मदद के लिए बुलाया। महाराणा, रायमल को ईडर की गद्दी पर पुनः बैठकर
आगे बढ़ा और अहमदनगर के किले को जा घेरा। मुसलमान किले में रहकर महाराणा से सामना करने लगे। किला बड़ा मजबूत था और उसके किंवाड़ों पर लोहे के बड़े-बड़े भाले जड़े हुए थे। मदमस्त हाथी भी उन किंवाड़ों के भालों से डरकर कपाटों के टक्कर मारकर तोड़ने में घबराकर वापस मुड़ जाते थे। इस विकट स्थिति को देखकर महाराणा के एक प्रसिद्ध सरदार डूंगरसिंह चौहान की अध्यक्षता में किले के प्रवेश द्वार पर धावा बोला
गया। किले के किंवाड़ों को तोड़ने के लिए हाथी का मोहरा करवाया गया पर किंवाड़ों के लोहे के भालों के कारण हाथी पीछे हट गया| यह देखकर डूंगरसिंह के वीरवर कानसिंह ने आगे बढ़कर अपने हाथों से उन भालों को पकड़ लिया और फिर हाथी आगे ठेलने के लिए महावत को कहा । महावत ने हाथी को आगे बढ़ाकर टक्कर दिलाई। हाथी के मस्तक और भालों के बीच में कानसिंह की छाती आ जाने के कारण हाथी के मोहरे से किंवाड़ टूट गए और कानरसिंह का शरीर कुचलकर प्राण पंखेरू उड़ गए। इस प्रकार कानरसिंह ने अद्भुत साहस दिखाया तथा मृत्यु से गंठजोड़ा जोड़ कर स्वर्गलोक गया । इस वीर का कितना महान् बलिदान था। वह किसी मिट्टी से बना था। उस युग के राजपूत इस प्रकार अपने प्राणों का उत्सर्ग करने में एक क्षण भी न सोचते थे और न हिचकते थे । फलत: महाराणा की विजय हुई। वे मुसलमानों के हाथी-घोड़े और लूट का माल लेकर वापस चित्तौड़ लौटे। मुबारिजुल्मुल्क इस युद्ध में घायल होकर अहमदाबाद भाग गया था ।


गुजरात के सुल्तान पुत्र दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी के समय में दिल्ली भू-भाग के कुछ हिस्से के बाद उसके पुत्र सुल्तान मेवाड़ का अधिकार हो गया था सिकंदर लोदी की मृत्यु इब्राहिम लोदी ने सुल्तान का पद ग्रहण करते ही एक बड़ी सेना के साथ महाराणा संग्रामसिंह पर चढ़ाई की इसकी सूचना मिलने पर महाराणा संग्रामसिंह भी एक सेना लेकर उसका सामना करने के लिए चला। हाड़ीती (कोटा-बूंदी) क्षेत्र के खातोली स्थान पर दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। इसमें मेवाड़ की विजय हुई। सुल्तान इब्राहिम मैदान छोड़कर भाग गया। युद्ध में सुल्तान का एक शाहजादा बंदी बना लिया गया, जिसे
दण्ड लेकर बाद में छोड़ दिया गया यह युद्ध वि.सं. 1574 (ई. 1517) में हुआ था। युद्ध में महाराणा संग्रामसिंह का तलवार के प्रहार से एक हाथ कट गया था और पैर के
घुटने में तीर लग गया था। इससे वे सदैव के लिए लंगड़े हो गए थे।


इस पराजय का बदला लेने के लिए दूसरे ही वर्ष सुल्तान ने अपने सेनापति मियां माखन के नायकत्व में पुनः मेवाड़ पर एक सेना भेजी। आगरा के पास धौलपुर की समरस्थली पर दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ। पर इस बार भी दिल्ली की सुल्तानी सेना कुट- पिट और हारकर मैदान छोड़ भागी। बादशाह बाबर ने बाबरनामा में सुल्तान की सेना की पराजय का वर्णन किया है। इब्राहिम को परास्त करने के बाद महाराणा ने चंदेरी के भू- भाग पर अधिकार कर लिया। चंदेरी पहले दिल्ली सल्तनत के अन्तर्गत था। मेदिनीराय तोमर मालवे का बड़ा शक्तिशाली सरदार था। वह सुल्तान महमूद द्वितीय के भय से मालवा छोड़कर मेवाड़ में महाराणा के पास चला आया था। संग्रामसिंह ने अपने आश्रित राजा बनाकर गागरौन और चंदेरी पर उसे स्थापित कर दिया। इस पर सुल्तान महमूद ने गुजराती सेना के साथ मेदिनीराय पर चढ़ाई की। महाराणा पचास हजार सेना लेकर मेदिनीराय की सहायतार्थ गागरौन जा पहुँचे। गुजराती सेना के सेनानायक आसफखां ने महाराणा से न लड़ने की सलाह दी, पर वह नहीं माना। परिणामतः युद्ध हुआ और उसमें मालवे के तीन बड़े सरदारों सहित गुजरात की अधिकतर सेना नष्ट हो गई। सुल्तान महमूद घायल होकर युद्ध में गिर पड़ा, जिसे बदी बनाकर महाराणा चित्तौड़ ले आए। महाराणा ने तीन माह तक चित्तौड़ के कारावास में रखने के बाद क्षमादान दे दिया। इस पर सुल्तान ने अपने पूर्वज सुल्तान हुशंगशाह के समय में राजसम्मान और राजचिह्न के रूप में व्यवहार में लिए जाने वाले रत्नजड़ित मुकुट और स्वर्ण की कमरपट्टिका महाराणा को भेंट कर दिए। महाराणा ने भविष्य में सद्ब्यवहार न करने तथा उत्पात करने की आशंका के तौर पर सुल्तान की इस उदारता और महानता की मुस्लिम इतिहासकार ने मुक्तकंठ से प्रशंसा की है, पर यह महाराणा की अदूरदर्शिता और बड़ी राजनीतिक भूल थी। सुल्तान को एक शाहजादे को अपनी ओळ (प्रतिभूति) के रूप में रख लिया। महाराणा गुजरात के सेनाध्यक्ष की इस प्रकार ईडर और अहमदनगर की हार का प्रतिशोध लेने के लिए सुल्तान मुजफ्फर ने महाराणा से की। इसके लिए सोरठ प्रदेश का हाकिम मलिक अयाज बीस हजार सवारों के साथ इस युद्ध करने के लिए एक विशाल सेना संगठित चढाई में शामिल होने के लिए अहमदाबाद आया। उसने सुल्तान से कहा कि मैं महाराणा संग्रामसिंह को पकड़ लाऊंगा। यह बात सुल्तान को बड़ी पसंद आई। इस पर उसने एक लाख घुड़सवार सेना, एक सौ हाथी और मलिक अयाज को सेनापति बनाकर महाराणा पर भेजा तथा उसकी सहायता के लिए पीछे से बीस हजार अश्व सेना मुबारिजुल्मुल्क को देकर भेजी। यह विशाल सेना डूंगरपुर, बांसवाड़ा आदि बागड़ देश को लूटती, जलाती और बर्बाद करती मंदसौर पहुँची और मंदसौर के किले के घेरा लगा लिया। इस पर महाराणा संग्रामसिंह भी एक बड़ी सेना लेकर मदसौर गया। उधर मालवा का सुल्तान भी गुजरात की सेना की मदद हेतु मंदसौर में उससे आ मिला। महाराणा ने बड़ी तेजी के साथ मुसलमानों की इस सेना पर आक्रमण किया, जिससे कुछ समय के युद्ध के बाद गुजराती सेना का सेनानायक मलिक अयाज दस कोस पीछे हट गया। इस पर मालवा का सुल्तान रणभूमि त्यागकर भाग निकला।


महाराणा संग्रामसिंह के कार्यकाल में भारतीय सांग्रामिक प्रणाली और यौद्धिक इतिहास में एक नया परिवर्तन आया। मुगल बादशाह बाबर ने काबुल से भारत पर चढ़ाई की। वह सर्वप्रथम भारत में तोपें लेकर आया। बाबर और दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के बीच पानीपत के मैदान पर युद्ध हुआ। इस युद्ध में इब्राहिम मारा गया और बाबर की जीत हुई। वह पानीपत की विजय के बाद दिल्ली का बादशाह हुआ। उस समय भारत में सबसे शक्तिशाली हिन्दू राजाओं और मुसलमानों नवाबों-सुल्तानों में संग्रामसिंह ही था । वह कई युद्धों में मुसलमानों को हरा चुका था। इसलिए बाबर और संग्रामसिंह के बीच एक-न-एक दिन युद्ध होना निश्चित ही था। अन्ततः वह घड़ी आ ही गई और दोनों ही दिल्ली की सल्तनत पर अधिकार स्थापित करने तथा भारत के भावी राजनीतिक भाग्य का निर्णय करने के लिए एक-दूसरे से लड़ने के लिए चल पड़े। महाराणा के पास एक बड़ी विशाल सेना थी। उसके पक्ष में सुल्तान इब्राहिम लोदी का पुत्र महमूद लोदी, हसनखा मेवाती जैसे वीर और राजस्थान के आमेर के राजा पृथ्वीराज कछवाहा, अमरसर के राव रायमल शेखावत और मेड़ता के स्वामी वीरमदेव मेड़तिया जैसे 108 राजा और योद्धा सम्मिलित थे। खानवा के समरांगण में वि.सं. 1584 की चैत्र सुदी 14 (17 मार्च, 1527 ई.) में यह भयंकर युद्ध हुआ। प्रारंभ के आक्रमणों में तो बाबर की सेना की हार हुई पर निर्णायक अंतिम मुकाबले के समय महाराणा के सिर में एक घातक बाण लगा और वे उससे घायल होकर मूर्च्छित हो गए। बाद में राजपूत सेना का संचालन सादडी के झाला अज्जा ने संभाला। इसमें महाराणा की पराजय हुई। तुजुके बाबरी में इस युद्ध का वर्णन दिया है, परंतु बयाना के क्षेत्र के लोगों की मान्यता है कि बाबर ने हारकर महाराणा से संधि कर ली और फिर रात्रि में असावधान राजपूत सेना पर बाबर ने आक्रमण कर अपनी पराजय को विजय में परिणत कर दिया था। महाराणा खानवा से रणथभौर आए। इसके पश्चात् दूसरी साल बाबर ने महाराणा के पक्षधर चंदेरी के मेदिनीराय तोमर पर चढ़ाई की, तब महाराणा मेदिनीराय की मदद पर चदरी के लिए रवाना हुए। पर मार्ग मेंनही कालपी नामक स्थान पर वि.सं. 1.584 माघ शुक्ला 9 (30 जनवरी, 1528 ई.) के दिन उनका देहान्त हो गया। महाराणा के तेज बुखार हुआ और वे मर गए-ऐसा बाबर।ने लिखा है। महाराणा संग्रामसिंह के भोजराज, रतनसिंह, विक्रमादित्य और उदयसिंह नामक चार पुत्र हुए। सबसे बड़े पुत्र भोजराज का विवाह भारतीय हिन्दी तथा राजस्थानी साहित्य की प्रसिद्ध कवयित्री भक्तवर मीरांबाई के साथ हुआ था। मीरांबाई मेवाड़ के प्रसिद्ध राठौड़ शासक राव दूदा के छोटे पुत्र रतनसिंह की पुत्री थी। विवाह के कुछ समय पश्चात् ही भोजराज की मृत्यु हो गई थी। महाराणा संग्रामसिंह द्वारा बनवाया गया भगवान श्रीकृष्ण का मन्दिर चित्तौड़ दुर्ग पर अब भी स्थित है और वह मीरांबाई के मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध महाराणा संग्रामसिंह के देहावसान के बाद उनका द्वितीय पुत्र रतनसिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठा। रतनसिंह स्वभाव से निर्भीक और साहसी था। इसके समय में प्रजा सुखी और निर्भय थी। उस समय चित्तौड़ दुर् के रात्रि में भी किवाड़ खुले रहते थे घर के झगड़ों में सूर्यमल हाडा के हाथों रतनसिंह के मारे जाने पर उसका वैमातृक अनुज विक्रमादित्य मेवाड़ के सिंहासन पर बैठा। यह क्षुद्रमति और अयोग्य शासक था। विक्रमादित्य और मेवाड़ के सामन्तों के मध्य तीव्र अनबन और राज्य की राजनीतिक अस्थिरता देखकर गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने एक विशाल सेना लेकर मेवाड़ पर आक्रमण कर चित्तौड़ को घेर लिया। इससे घबराकर महाराणा की माता क्मावती हाडी ने संधि के लिए बहादुरशाह के पास अपने प्रतिनिधियों को भेजा और महाराणा संग्रामसिंह द्वारा विजित और अधिकृत मालवा का वह भाग, जो मेवाड़ में मिला लिया था तथा जड़ाऊ मुकुट और स्वर्ण की कमरपट्टिका बहादुरशाह को लौटाकर संधि कर ली। इतना होने पर भी विक्रमादित्य के व्यवहार और आचरण में कोई परिवर्तन नहीं आया । कुछ समय बाद बहादुरशाह ने भी प्रथम संधि को भंग कर दिया और एक विशाल सेना लेकर चित्तौड़ पर चढ़ाई कर दी। इस शक्तिशाली गुजरात के आक्रमण की सूचना से चिन्तित राजमाता कर्मावती ने मेवाड़ की रक्षा के लिए सामंत-सरदारों को महाराणा विक्रमादित्य के व्यवहार को संगठित होकर गुजराती सेना का सामना करने का आह्वान किया। इस पर मेवाड़ के सरदार राजमाता के पास आए। उमरावों की सलाह पर महाराणा विक्रमादित्य और अनुज उदयरसिंह को चित्तौड़ से उनके ननिहाल बूंदी भेज दिया गया और युद्ध संचालन का भार प्रतापगढ़ के शासक महारावत बाघसिंह को सौपा गया। भुलाकर और इस भयंकर युद्ध की विकट स्थिति से बचने के लिए राजमाता कर्मावती देवी ने दिल्ली के मुगल बादशाह हुंमायूँ को राखी भेजकर अपना भाई बनाया और उससे सहायता का आग्रह किया। हुमायूँ आगरा से चलकर ग्वालियर आया। इस पर बहादुरशाह ने अपना दूत भेजकर हुमायूँ को कहलवाया कि वह तो जिहाद (धर्मयुद्ध) कर रहा है। इस सन्देश से हुंमायूँ वहीं ठहर गया और आगे नहीं बढ़ा। इधर गुजरातियों ने सुरंगे लगाकर किले की ‘वीकाखोह’ के पास की दीवार उड़ा दी । यह सूचना मिलते ही महाराणान संग्रामसिंह की राठौड़ महारानी जवाहरबाई मर्दाना वस्त्र धारण कर तथा घुड़सवार होकर क्षत्रिय योद्धाओं के साथ जाकर किले की क्षतिग्रस्त दीवार के मोर्चे पर डट गई तथा मातृभूमि के लिए युद्ध करती हुई वीरगति को प्राप्त हुई। ऐसा मेवाड़ के इतिहास में रामनारायण दुग्गड़ ने लिखा है। विशाल गुजराती सेना को रोकने के लिए राजमाता कर्मावतीदेवी की अगुवाई में किले पर वीर राजपूत नारियों ने जौहर किया। युवा, वृद्ध और बाल हजारों राजपूत नारियों ने जौहर कुण्ड की धधकती ज्वाला में कूद-कूद कर अपने जीवन का उत्सर्ग कर दिया और वीर योद्धा किले के किवाड़ खोलकर शत्रुओं पर टूट पड़े। चित्तौड़ के किले में बरसाती नालों की भांति लहू-धारा बहने लगी। युद्ध का सचालन करते प्रकार देसूरी के सोलंकी भैरूंदास, देलवाड़े के राजराणा सिघा, देवगढ़ वालों के पूर्वज दूदानचूडावत, रावत शक्ता चूडावत, डोडिया भाण आदि कई प्रसिद्ध सरदार अलग-अलग द्वारोंनपर युद्ध कर खेत रहे। यह चित्तौड़ का दूसरा जौहर कहलाता है। सर्वत्र प्रलयकाल-सा दृश्य उपस्थित हो गया | किले पर गुजराती बहादुरशाह का अधिकार हो गया।


यह सब सुनकर हुंमायूँ चित्तौड़ की ओर अग्रसर हुआ और बहादुरशाह विजय मद में मस्त, हुंमायूँ के सामने से चित्तौड़ होकर आगे बढ़ा। मंदसौर के पास दोनों यवन सेनाओं का मुकाबला हुआ, जिसमें बहादुरशाह हारकर गुजरात की ओर पलायन कर गए ।
गढ़ रावत बाघसिंह प्रथम द्वार पर वीरगति को प्राप्त हुए। कुछ समय बाद मेवाड़ के युद्ध में बचे राजपूतों ने संगठित होकर बाहर से चित्तौड़ पर आक्रमण किया और किले की रक्षार्थ बहादुरशाह द्वारा नियत सेना को समाप्त कर चित्तौड़ पर पुनः अधिकार कर महाराणा विक्रमादित्य और उनके अनुज उदयसिंह को बूंदी से बुलाया। अपार जनधन की क्षति के बाद भी महाराणा विक्रमादित्य के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया। उसकी अयोग्यता और लापरवाही का लाभ उठाकर राजकुमार पृथ्वीराज की उप-पत्नी का पुत्र बनवीर, महाराणा का कृपापात्र बनकर उसका प्रधानमन्त्री बन गया तथा एक दिन अवसर देखकर बनवीर ने रात्रि में विक्रमादित्य को मार डाला। यह खबर सुनते ही महाराणा के अनुज उदयसिंह की धाय पन्नादेवी खीची राजपूतानी ने उदयसिंह के स्थान पर उनके सम आयु अपने पुत्र को सुला दिया और उदयसिंह को बारी जाति के एक विश्वस्त सेवक के साथ किले से बाहर निकाल दिया। बनवीर ने महल में पहुँचकर पन्नादेवी के पुत्र को उदयसिंह समझकर उसकी भी हत्या कर दी। इसके बाद बनवीर ने निश्चिंत होकर मेवाड़ के महाराणा के पद को हथिया लिया। पन्ना जैसे-तैसे चित्तौड़ से उदयसिंह को लेकर सीसोदियों के तत्कालीन अन्य राज्य प्रतापगढ़ और डूंगरपुर राजपूत शाखाओं का इतिहास पहुँची। बनवीर के भय से इन शासकों में उदयरसिंह को अपने यहाँ रखने का साहस नहीं हुआ। तब पन्नादेवी कुम्भलगढ़ गई और वहाँ के राजभक्त दुर्गपाल आशा देवपुरा ने उसे अपने पास रख लिया।


इधर जब बनवीर ने अपने भोजन करते समय पकवान का कोई व्यंजन कोठारिया के स्वामी खान-चौहान की पत्तल में रख दिया तो इस पर खान नाराज होकर उदयसिंह के पास कुम्भलगढ़ चला गया । फिर खान की सलाह से मेवाड़ के चूंडावतों ने देवगढ. सलूम्बर और आमेट के जागीरदारों को कुम्भलगढ़ बुलवाया। मारवाड़ के पाली के स्वामी अखैराज सोनगरा को भी कुम्भलगढ़ बुलवाया और मेवाड़ के सामन्तों के कहने पर उसने
अपनी पुत्री का विवाह उदयसिंह के साथ कर दिया। फिर मेवाड़ और मारवाड़ के राजपूतों की एक सेना तैयार कर बनवीर पर चढ़ाई कर दी। उदयपुर के पास मावली नामक स्थान पर यह युद्ध हुआ, जिसमें विजय प्राप्त कर उदयसिंह चित्तौड़ के किले पर अधिकार कर वि.सं. 1597 में मेवाड़ की राजगद्दी पर बैठा। महाराणा उदयसिंह ने चारों ओर से गिरिमालाओं से आवेष्टित पीछोला नामक विशाल तालाब के पास अपने नाम पर उदयपुर नगर बसाया। महाराणा उदयसिंह के समय दिल्ली पर मुगलों का राज्य था। हुमायूँ ने ग्वालियर के राजा रामशाह तोमर से युद्ध किया और उसे हरा दिया। राजा रामशाह तोमर ग्वालियर से भागकर महाराणा उदयसिंह के पास मेवाड़ आया। महाराणा ने उसे जागीरें और दैनिक व्यय का खर्चा तय कर मेवाड़ में रख लिया। मुगल बादशाह ने गम्भीरता से विचार किया कि राजपूत शासकों में सबसे. मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह है, इसलिए उन्हें अ्धान करना आवश्यक है। बादशाह अकबर चित्तौड़ विजय के लिए एक िशाल सेना लेकर चल पड़ा। उधर सरदारों की सलाह पर महाराणा उदयसिंह भी परिवार सहित पहाड़ों की ओर सुरक्षित स्थान पर चले गए। वि.सं. 1624 में शाही सेना मांडलगढ़ से कूच करके चित्तौड़ पहुँची और किले पर घेरा डाल दिया। जब बादशाह अकबर को समाचार मिला कि महाराणा किला छोड़कर उदयपुर और कुम्भलगढ़ की ओर चले गए हैं तो उसने हुसैनकुलीखां को एक सेना देकर उसका पीछा करने को भेजा। हुसैन जहाँ-तहाँ महाराणा का पता लगाने को भटकता रहा और न मिलने पर चित्तौड़ वापस आ गया। करीब चार माह तक किले के चारों ओर शाही सेना घेरा डाले रही। किले के अन्दर खाद्यान्र का अभाव देखकर किले के रक्षक वीर राजपूतों ने जौहर का निर्णय किया। समस्त राजपूत वीरांगनाएँ अग्नि में प्रवेश कर गईं। रात्रि होने पर जौहर किया गया और सूर्योदय के साथ ही किले के द्वार खोल दिए गए। रात्रि में जौहर की लाल-लाल लपटें और अग्नि स्फुर्लिंगों के पीत प्रकाश को देखकर बादशाह अकबर ने अपनी समग्र सेना को रात्रि में ही दुर्ग के द्वारों पर लगा दिया था।

राजपूतों ने कुपित सिंहराज की भाँति शाही-गज सेना पर अपने पंजों रूपी भालों और दंष्ट्रारूपी तलवारों के प्रहार किये, फलतः उनके शस्त्राघातों के भय से कितने ही शाही सैनिक भाग छूटे। बादशाह अकबर की गोली से दुर्गरक्षक वीरवर राव जयमल के दोनों पैर टूट गए थे इसलिए इस जौहर वाले दिन के कन्धे पर चढ़कर शाही सेना से युद्ध किया था इस युद्ध में जयमल और उनके सहयोगी समस्त राजपूत योद्धा मातृभूमि के लिए बलिदान हो गए उसके बाद विजय-गर्व में उन्मत्त सम्राट् अकबर ने 25 फरवरी, 1586 ई. की भयावह काली रात में चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार आठ हजार राजपूत, शूरमाओं और वीर वनिताओं के आत्मोत्सर्ग पर यह चित्तौड़ का तीसरा जौहर और शाका सम्पूर्ण हुआ । जयमल ने कल्ला राठौड़ के बादशाह अकबर के चित्तौड़ पर अधिकार कर लेने तथा उसके वापस चले जाने के बाद महाराणा उदयसिंह गोगूंदा में रहने लग गए थे। महाराणा का अपनी छोटी रानी भटियानी पर अधिक प्रेम होने के कारण उसके कहने पर उन्होंने भटियानी रानी के पुत्र जगमाल को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत किया। जब मेवाड़ के सरदार लोग महाराणा की मृत्यु होने पर दाह संस्कार हेतु शरमशीन में पहुँचे, तब वहाँ पर कुमार जगमाल को उपस्थित नहीं देखकर ग्वालियर के राजा रामशाह तोमर ने इसका कारण जानना चाहा। इस पर जगमाल के छोटे भाई ने कहा कि क्या आपको मालूम नहीं है कि महाराणा ने उनको अपना उत्तराधिकारी बना दिया है। उस काल में राजाओं के उत्तराधिकारी शमशानों में दाह-संस्कार में शामिल नहीं होते थे, क्योंकि उस समय आशंका रहती थी कि पीछे से कहीं शत्रु राज्य पर आक्रमण करके अधिकार न कर ले। महाराणा उदयसिंह के ससुर सोनगरा ( चौहान) अखैराज ने इस पर चूंडावत कृष्णदास सलूम्बर से कहा कि आप चूंडावर्तो के होते गलत परम्परा हो रही है, कारण कि महाराणा का बड़ा पुत्र तो प्रताप है, जो योग्य भी है। जब सामन्त लोग दाह-संस्कार करने के बाद वापस राजमहल में पहुँचे तो देखा कि जगमाल गद्दी पर बैठा हुआहै। इस पर रावत कृष्णदास चूडावत सलूम्बर तथा रावत सांगा चूंडावत देवगढ़ ने हाथ पकड़ कर जगमाल को राजगद्दी से उठा दिया और प्रताप को राजगद्दी पर बैठाकर राजतिलक किया।

महाराणा प्रतापसिंह

महाराणा प्रतापसिंह का जन्म महाराणा उदयसिंह की पटरानी जयंतीबाई के गर्भ से कुम्भलगढ़ के किले में ज्येष्ठ सुदी 3 वि.सं. 1597 (9 मई 1540 ई.) को हुआ था।महाराणा प्रताप अपने पिता की मृत्यु के बाद गोगून्दा में फाल्गुन सुदी 15 वि.सं. 1628 (28 फरवरी, 1572) को मेवाड़ की गद्दी पर बैठे। चित्तौड़ आदि क्षेत्रों पर मुगल
बादशाह अकबर का अधिकार होना उन्हें बड़ा अखरता था। उनको जब भी कोई अच्छा मौका मिलता, वे मुगल थाने और चौकियों पर आक्रमण करते और उन्हें लूटते थे।

महाराणा प्रताप
महाराणा प्रताप


बादशाह अकबर ने अनेक बार अपने प्रसिद्ध व्यक्तियों को भेजकर प्रताप को समझाया कि वे उसकी अधीनता स्वीकार कर लें, परंन्तु प्रताप की मुगलों की अधीनता स्वीकार करने की जब कोई आशा नहीं रही तथा अन्य युद्धों से जब बादशाह को अवकाश मिला, तब उसने अजमेर से 2 अप्रैल 1576 ई. को एक सेना महाराणा प्रतापसिंह के विरुद्ध कुंवर मानसिंह आमेर के नेतृत्व में भेजी। इस सेना के मेवाड़ पर चढ़ आने के समाचार सुनकर महाराणा प्रताप कुम्भलगढ़ से चलकर गोगून्दा आ गए। वहाँ से आगे बढ़कर हल्दीघाटी के नीचे के मैदान में, जो कि बनास नदी के किनारे पर था, दोनों सेनाओं का युद्ध आषाढ़ वदी 6 वि.सं. 1633 (18 जून 1576 ई.) को हुआ। इस युद्ध में महाराणा प्रताप के अनेक प्रसिद्ध योद्धा काम आए। प्रताप ने मुगल सेना में धुसकर, घोड़े को हाथी पर कुदाया तथा कुंवर मानसिंह आमेर पर प्रहार किया। इसी वार के पश्चात् वे मुगल सेना के बीच चारों ओर से घिर गए। उस समय उनके सामंत झाला बीदामान मुगलों से बायें बाजू में शत्रु ही शत्रु थे। जब उन्होंने देखा कि महाराणा प्रताप शत्रु से घिर गए हैं, तब वे युद्धरत सेना को चीरते हुए वहाँ पहुँचे तथा उस स्वामी-भक्त वीर ने महाराणा प्रताप को घेरे में से सुरक्षित निकालकर युद्ध क्षेत्र से बाहर भेज दिया और स्वयं शत्रुओं से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। इस हल्दीघाटी के युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रतापसिंह ने कोई भी मैदानी युद्ध मुगलों से नहीं किया तथा पहाड़ों की ओट से छापामार युद्ध करके मुगलों को परास्त करते रहे। बादशाह अकबर ने अनेक बार अपने अनेक सेनापतियों के नेतृत्व में बड़ी सेनाएँ भेजीं, परन्तु वे सभी हर बार असफल रहे। एक बार तो स्वयं अकबर एक बड़ी सेना के साथ मेवाड़ आया, परन्तु वह भी महाराणा प्रताप का कुछ नहीं बिगाड़ सका। अन्त में परेशान होकर 6-7 वर्षों तक अकबर ने मेवाड़ पर कोई सेना नहीं भेजी। इन समस्त युद्धों के समय दक्षिणी मेवाड़ के पहाड़ी क्षेत्र चामुण्ड में महाराणा प्रताप की राजधानी थी, वहीं पर माघ शुक्ला 11, वि.सं. 1653 में इनकी मृत्यु हुई। वहीं पर इनके बड़े पुत्र अमरसिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठे। महाराणा प्रतापसिंह के तमाम युद्धों का वर्णन राणारासो में दिया है।

महाराणा अमरसिंह

महाराणा अमरसिंह के गद्दी पर बैठते ही अकबर ने मेवाड़ पर मुगल सेना भेजी। महाराणा अमरसिंह का भी मुगलों के साथ काफी संघर्ष चलता रहा। एक दो बड़े युद्धों में इन्होंने मुगलों को परास्त किया। इन लम्बे संघर्षों के कारण मेवाड़ काफी बर्बाद हो गया था। मेवाड़ के सामन्तों की तीन-तीन, चार-चार पीढ़ियाँ मुगलों के विरुद्ध हुए युद्धों में मारी जा चुकी थी। इस समय तक मेवाड़ में खाद्य सामग्री का भी बड़ा अभाव हो गया था। जहाँगीर बादशाह बनने के बाद स्वयं अजमेर आया तथा एक बहुत बड़ी सेना के साथ अपने पुत्र खुर्रम को मेवाड़ पर भेजा। मुगल सेना का मेवाड़ में भीषण संघर्ष हुआ। महाराणा की राजधानी चामुण्ड पर भी मुगलों का अधिकार हो गया। इसके पश्चात् कुछ पहाड़ी क्षेत्र ही अब महाराणा के अधिकार में रहे थे कुछ सरदारों ने महाराणा अमरसिंह के पुत्र करणसिंह को सलाह दी कि अगर सम्मानपूर्वक संधि हो जाए तो अब मेवाड़ सुरक्षित बच जाएगा। सरदारों का यह परामर्श कुंवर करणसिंह को पसन्द आया, इस पर शाहजादे खुरेम के मुशी द्वारा मालूम करवाया गया। यह परामर्श शाहजादे को भी पसन्द आया और उसने अजमेर बादशाह जहाँगीर से इस विषय में पुछवाया। बादशाह जहाँगीर तो स्वयं यह चाहता था कि मेवाड़ के महाराणा मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ले और फिर वे जो भी शर्ते रखें, उन्हें मंजूर कर लें। इस पर यह सुनिश्चित हुआ कि सन्धि के बाद महाराणा कभी भी मुगल बादशाह के दरबार में नहीं जाएँगे, केवल उनका बड़ा पुत्र ही दरबार में जाएगा। यह तय होने पर कुंवर करणसिंह, सरदारों तथा प्रमुख व्यक्तियों ने जाकर यह सब महाराणा अमरसिंह को बतलाया। महाराणा अमरसिंह को यह सब सुनकर बड़ा दुःख हुआ, परन्तु जब सभी लोग सन्धि चाहते थे तो उन्हें विवश होकर यह सब सहन करना पड़ा। सन्धि के पश्चात् बादशाह ने चित्तौड़ सहित सभी परगने तथा कुछ अन्य प्रान्त भी महाराणा को दिए। बादशाह जहाँगीर ने अपनी दिनचर्या की पुस्तक में बड़े गौरव से लिखा है कि मेवाड़ का महाराणा आज तक दिल्ली के किसी बादशाह के सामने नहीं झुका था, वह आज मेरे अधीन हुआ। महाराणा अमरसिंह को इस सन्धि से इतना दुःख हुआ कि वे अपनी शेष आयु में महल से बाहर नहीं निकले।

महाराणा राजसिंह

महाराणा करणसिंह के पौत्र महाराणा राजसिंह हुए, जो बड़े वीर प्रकृति के थे। इनके समय में जोधपुर के महाराजा जसवंतरसिंह की मृत्यु होने के बाद बादशाह औरंगजेब ने मारवाड़ को खालसे कर लिया था । इस पर वीरवर सोनग चांपावत और दुर्गादास राठौड़ जसवंतरसिंह के शिशु पुत्र महाराजा अजीतसिंह को लेकर महाराणा के पास उदयपुर पहुँचे। तब महाराणा राजसिंह ने शिशु महाराजा अर्जीतसिंह को अपने संरक्षण में रख लिया।
उधर मारवाड़ में मुगलों से युद्ध चल रहे थे। यह समाचार औरंगजेब को मिलते ही उसने एक बड़ी सेना के साथ महाराणा पर चढ़ाई की। सीसोदियों और राठौड़ों ने संयुक्त होकर मुगलों से लोहा लिया, जो महाराणा राजसिंह की मृत्युपर्यन्त चलता रहा। महाराणा राजसिंह के पुत्र जयसिंह ने बादशाह औरंगजेब से सन्धि की। महाराणा जयसिंह के बाद अनेक महाराणा हुए। अंग्रेजों के समय में महाराणा भीमसिंह हुए। उनके समय में प्रसिद्ध इतिहासकार जेम्स टॉड ने उदयपुर में रहते हुए ‘टॉड राजस्थान’ ग्रंथ लिखा। भीमसिंह के पुत्र महाराणा सज्जनसिंह ई. 1874 से ई. 1884 तक उदयपुर के बड़े योग्य शासक हुए। महाराणा सज्जनसिंह बड़े साहित्यानुरागी और विद्या-प्रेमी थे। इन्होंने प्रसिद्ध विद्वान कविराज श्यामलदास चारण से मेवाड़ का वृहद् इतिहास ‘वीर विनोद’ तैयार करवाया, परन्तु इनकी लम्बी उम्र नहीं हुई। इनके पश्चात् महाराणा फतहसिंह उदयपुर के शासक हुए। ये बड़े ही स्वाभिमानी और मर्यादा-रक्षक शासक थे। इनके समय में दिल्ली में वायसराय कर्जन ने एक बड़ा दरबार किया, महाराणा फतहसिंह दिल्ली तो गए लेकिन मेवाड़ की परम्परा का ख्याल करते हुए दरबार में शामिल नहीं हुए। महाराणा फतहसिंह के पुत्र महाराणा भोपालसिंह के समय मेवाड़ राज्य राजस्थान में विलय इतने लम्बे समय तक एक ही स्थान पर एक ही कुल का राज्य होने का उदाहरण विश्व के इतिहास में दूसरी जगह नहीं मिलता। महाराणा भोपालसिंह के दत्तक उत्तराधिकारी भगवतसिंह और उनके पुत्र महे्द्रसिंह तथा अनुज महाराज अरविन्दसिंह विद्यमान हैं। श्री अरविंदसिंह साहित्य, इतिहास और कला प्रेमी हैं तथा क्षत्रिय संस्कृति के अनुरागी व संरक्षक हैं ।

महाराष्ट्र और भौंसला वंश

भौंसला वंश की उत्पत्ति चित्तौड़ के सीसोदिया कुल से है। इनका गोत्र वैजपायण तथा कहीं-कहीं कौशिक है। शाखा वाजसनेयी तथा सूत्र पारस्कर गृह्यसूत्र है वेद यजुर्वेद है। ये सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं। चित्तौड़ का जब अलाउद्दीन के समय में पहला जौहर हुआ था, उससे पूर्व ही राणा लक्ष्मणसिंह ने अपने दूसरे पुत्र अजयसिंह को चित्तौड़ से बाहर भेज दिया था, जिससे उसके जीवित रहने से आगे वंश-परम्परा चलती रहे, इसके बड़े भाई अरिसिंह की स्त्री भी जौहर के समय अपने पीहर में थी, जिसके गर्भ से बालक हम्मीर का जन्म हुआ। अजयसिंह के दो पुत्र थे-सज्जनसिंह और क्षेमसिंह । अजयसिंह को गोड़वाड़ का मुंजा बालेचा बड़ा तंग करता था। अतः उसने अपने पुत्रों को आज्ञा दी कि वे मुजा बालेचा का वध कर दे, परन्तु वे दोनों ही इस कार्य में असफल रहे, तब अजयसिंह ने यह कार्य अपने भतीजे हम्मीर को सौंपा| हम्मीर ने मुंजा बालेचा को परास्त करके उसका सिर काटकर अपने चाचा के पास पेश किया। इस पर प्रसन्न होकर अजयसिंह ने चित्तौड़ का राज्य हम्मीर को दे -दिया। इस कारण अजयसिंह के दोनों पुत्र अपने िता से रुष्ट होकर मेवाड़ छोड़कर दक्षिण में चले गए। पहले के समय में जब कोई राजा या राजकुमार जब दूसरे प्रदेश में जाते थे तो उनकेसाथ सैकड़ों आदमी होते थे। इस प्रकार जब सज्जनसिंह मेवाड़ से दक्षिण में गए तब उनके साथ भी विभिन्न शाखाओं के राजपूत परिवार के व्यक्ति थे, जैसे-मौर्य, गुहिलोत, पंवार, यादव, सोलंकी, चौहान और तोमर आदि। इन्हीं के वंशजों का आगे चलकर विस्तार हुआ, जो महाराष्ट्र में मराठा क्षत्रिय कहलाए।


सज्जनसिंह दक्षिण में जाकर बहमनी राज्य के संस्थापक जफरखा (हसन गंगू) की सेवा में रह गया। सज्जनसिंह ने उसकी सेवा में रहकर बड़ी वीरता दिखलाई। उसके पुत्र दुलहसिंह (दलीपरसिंह) ने भी जफरखां की सेवा में रहकर वीरता के साथ अच्छी सेवा की। इसके उपलक्ष्य में जफरखां ने दलीपसिंह को देवगिरी की तरफ मीरत प्रांत में दस गाँवों की जागीर दी। हसन गंगू के हिजरी 753 (ई. 1352) के फरमान में दलीपसिंह को सज्जनसिंह का पुत्र तथा राणा अजयसिंह का पौत्र लिखा है। (डॉ. गौरीशंकर ओझा) हसन गंगू की के बाद बहमनी राज्य में बहुत बखेड़े हुए। कई सुल्तान गद्दी पर बैठे। दलीपसिंह का मृत्यु के बाद पुत्र सिंहा सागर का थानेदार नियुक्त हुआ। फिरोजशाह के बहमनी की गद्दी पर बैठने के पूर्व हुए अनेक झगड़ों में बहुत से सरदार उसके विरोधी हो गए थे, उस समय सिंहा और उसका पुत्र भैरवरसिंह (भौंसला) उसके पक्ष में रहे। सिंहा शत्रुओं से लड़ता हुआ मारा गया।
फिरोजशाह ने गद्दी पर बैठने के बाद सिंहा और भैरवरसिंह को 84 गाँवों से मुघोल की जागीर दी-इसका हिजरी 800 तिथि 25 रवि उल आखिर (15 जनवरी ई. 1398) का फरमान है। (गौरीशंकर हीराचन्द ओझा) भैरवसिंह उर्फ भौंसले के उपनाम ‘भौंसले’ से उसके वंशज भौंसले कहलाने लगे। भौंसले का पुत्र राणा देवराज था, उसके दो पुत्र उग्रसेन (इन्द्रसेन) और प्रतापसिंह थे। उग्रसेन की फिरोजशाह के उत्तराधिकारी अहमदशाह ने अपने फरमान में वीरता तथा स्वामीभक्ति की बड़ी प्रशंसा की है । वह अपने स्वामी के लिए कोंकण के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ। इसके दो पुत्र थे-कर्ण और शुभकर्ण। मुहम्मदशाह दूसरे के समय में कोंकण में लड़ाई चल रही थी। उस समय एक किले की सीधी सपाट दीवार को पार करने की आवश्यकता हुई। राणा कर्णसिंह और उसके पुत्र भीमसिंह ने सैकड़ों गोहों (मराठी में घोरपड़) के कमर में रस्सियाँ बांधकर उन्हें किले की दीवार पर फैंका और उनके द्वारा उन्होंने किले में प्रवेश कर फतह किया। उस युद्ध में राणा कर्णसिंह मारा गया। इस सेवा के उपलक्ष्य में सुल्तान ने उसके को राणा के बदले ‘राजा घोरपड़े बहादुर’ की उपाधि दी और रायबाग तथा वेग के परगनों के दो किले तथा ‘घोरपड़ (गोह) के चिह्न वाला झंडा दिया। इस समय में मुध्धाल वाले राजा घोरपड़े कहलाए। बाद में बहमनी राज्य के स्थान पर पाँच राज्य दक्षिण में हो गए। जब अहमदनगर के निजामशाह ने अन्य शासकों से मिलकर बीजापुर के इस्माइल आदिलशाह पर चढ़ाई की, तब भीम के पुत्र खेलोजी ने बीजापुर के पक्ष में पुत्र भीमसिंह युद्ध में भाग लिया और वीरता से लड़ता हुआ मारा गया। इस समय से घोरपड़े खानदान का सम्बन्ध बीजापुर के साथ हुआ।
खेलोजी के पुत्र मालोजी की बीजापुर के सुल्तान इस्माइल आदिलशाह ने अपने फरमान में बड़ी प्रशंसा की है। उसने लिखा कि तुमने अपनी जान पर खेलकर बारम्बार शत्रुओं पर आक्रमण करके हमारे प्राणों की रक्षा की। तुम हमारे राज्य के स्तम्भ जब औरंगजेब ने बीजापुर से युद्ध किया, उसमें मुधोल का मालोजी औरंगजेब की सेना से खूब लड़ा। बीजापुर विजय करने के बाद औरंगजेब ने उसकी वीरता से- प्रभावित होकर उसे अपना मनसबदार बना लिया। बाद में मुधोल वाले पेशवा के साथ हो गए। गोविन्दराव घोरपड़े पेशवा के पक्ष में अंग्रेजों से ई. 1818 में अष्टी की लड़ाई में लड़ता हुआ काम आया था। उसके छोटे भाई वेंकराव (प्रथम) ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार कर ली। तब से भारत देश की आजादी तक मुधोल अंग्रेजों के अधीन रहा। इस राज्य का क्षेत्रफल 368 वर्गमील था।

भैरवसिंह उर्फ भौंसले के बंशज इन्द्रसेन (उग्रसेन) के बड़े पुत्र कर्ण के वंशज घोरपड़े कहलाने लगे, परन्तु छोटे पुत्र शुभकर्ण और उसके वंशज अपने पूर्व उपटंक भौंसले
ही कहलाए। शुभकर्ण के बाद क्रमशः रूपसिंह, भूमन्द्रि, राणाबरहट (बरड वावा), खेला, कर्णसिंह शांभा बाबा और मालूजी हुए। मालूजी ने वि.सं. 1657 (ई. 1600)
में अहमदनगर के सुल्तान की सेवा स्वीकार की। शाहजी भौंसले-नालूजी भौंसले का पुत्र शाहजी हुआ। इनका जन्म 15 मार्च ई. 1594 को हुआ। शाहजी भौसले वीर शिवाजी के पिता थे, शाहजी का विवाह यादव सरदार की पुत्री जीजाबाई से ई. 1604 में हुआ। जब खानजहां लोदी बगावत करके दक्षिण में गया और उसका पीछा करता हुआ बादशाह शाहजहाँ भी उधर गया, तब बहाँ के युद्धों में शाहजी भौंसले ने खानजहाँ का साथ दिया और मुगलों से लड़ा। निजामशाह-वंश के मुर्तिजा नामक एक लड़के को वहाँ की गही पर बिठलाकर शाहजी स्वयं राजकार्य देखते थे। उन्होंने कोकण का बहुत-सा भाग जीत लिया था। इस पर शाहजहाँ स्वयं दक्षिण में आया और आदिलशाह को संदेश भेजा कि शाहजी का पक्ष छोड़ दो, परन्तु उसने बह बात मानी नहीं, अतः मुगल सेना को कई भागों में विभक्त करके शाहजहाँ ने शाहजी का पीछा करवाया। शाहजी को इधर-उधर भटकना पड़ा। अन्त में शाहजी ने मुगलों की सेवा स्वीकार कर ली। उन्हें पूना तथा सूपा परगनों की जागीर मिली। शाहजी बाद में मुगलों की सेवा छोड़कर बीजापुर की सेवा में चले गए और जब ई. 1633 में शाहजहाँ ने बीजापुर पर चढ़ाई की, तब शाहजी नौ हजार सेना लेकर बीजापुर की तरफ से मुगलों से लड़े। उन्होंने बीजापुर और अहमदनगर की सेनाओं के साथ मुगलों को कई शिकस्तें दीं।

बीजापुर के मुस्तफाखा नामक सेनापति के विश्वासघात के कारण शाहजी को 16 जुलाई 1648 ई. को जिंजी में कैद कर लिया गया। शाहजी को कैद करने के पश्चात् बीजापुर से मुस्तफाखों ने फरादखों तानाजी डुरे और विदठल गोपाल नामक सरदारों को सेना देकर फतेहखाँ के नेतृत्व में शिवाजी की जागीर पर चढ़ाई करवाई। फतेहखँ ने पुरदर पर आक्रमण किया, परन्तु वह वहाँ से हारकर वापस भाग गया। मुस्तफाखों की जिनके अनुसार शिवाजी सिंहगढ़ किले को वापस दे देवें, तो शाहजी को मुक्त कर दिया जाएगा। इस पर शिवाजी ने सिंहगढ़ किले को वापस दे दिया और 16 मई 1649 को शाहजी को कैद मुक्त कर दिया गया। शाहजी फिर बीजापुर के सम्पर्क में आ गए। जब ई. 1653 में कर्नाटक में बहुत से झगड़े उठ खड़े हुए, तब आदिलशाह ने शाहजी भौंसले को शांति स्थापित करने हेतु वहाँ भेजा। शाहजी को शिकार खेलने की बड़ी रुचि थी, एक बार किसी हिरण का पीछा करते हुए शाहजी ने अपना घोड़ा सरपट दौड़ाया, अचानक घोड़े का पैर खडे में गिरा और घोड़े के साथ शाहजी भी गिर पड़े। 23 जनवरी 1664 को घटित इस घटना में ही शाहजी भौसले की भसवापटन में मृत्यु हो गई। शाहजी की मृत्यु के बाद आदिलशाह ने शिवाजी के साथ कुछ शर्ते रखीं, भैरवसिंह उर्फ भौंसले के बंशज इन्द्रसेन (उग्रसेन) के बड़े पुत्र कर्ण के वंशज घोरपड़े कहलाने लगे, परन्तु छोटे पुत्र शुभकर्ण और उसके वंशज अपने पूर्व उपटंक भौंसले ही कहलाए। शुभकर्ण के बाद क्रमशः रूपसिंह, भूमन्द्रि, राणाबरहट (बरड वावा), खेला, कर्णसिंह शांभा बाबा और मालूजी हुए। मालूजी ने वि.सं. 1657 (ई. 1600) में अहमदनगर के सुल्तान की सेवा स्वीकार की।


शाहजी भौंसले-नालूजी भौंसले का पुत्र शाहजी हुआ। इनका जन्म 15 मार्च ई. 1594 को हुआ। शाहजी भौसले वीर शिवाजी के पिता थे, शाहजी का विवाह यादव सरदार की पुत्री जीजाबाई से ई. 1604 में हुआ। जब खानजहां लोदी बगावत करके दक्षिण में गया और उसका पीछा करता हुआ बादशाह शाहजहाँ भी उधर गया, तब बहाँ के युद्धों में शाहजी भौंसले ने खानजहाँ का साथ दिया और मुगलों से लड़ा। निजामशाह-वंश के मुर्तिजा नामक एक लड़के को वहाँ की गही पर बिठलाकर शाहजी स्वयं राजकार्य देखते थे। उन्होंने कोकण का बहुत-सा भाग जीत लिया था। इस पर शाहजहाँ स्वयं दक्षिण में आया और आदिलशाह को संदेश भेजा कि शाहजी का पक्ष छोड़ दो, परन्तु उसने बह बात मानी नहीं, अतः मुगल सेना को कई भागों में विभक्त करके शाहजहाँ ने शाहजी का पीछा करवाया। शाहजी को इधर-उधर भटकना पड़ा। अन्त में शाहजी ने मुगलों की सेवा स्वीकार कर ली। उन्हें पूना तथा सूपा परगनों की जागीर मिली। शाहजी बाद में मुगलों की सेवा छोड़कर बीजापुर की सेवा में चले गए और जब ई. 1633 में शाहजहाँ ने बीजापुर पर चढ़ाई की, तब शाहजी नौ हजार सेना लेकर बीजापुर की तरफ से मुगलों से लड़े। उन्होंने बीजापुर और अहमदनगर की सेनाओं के साथ मुगलों को कई शिकस्तें दीं।

छत्रपति शिवाजी
छत्रपति शिवाजी


बीजापुर के मुस्तफाखा नामक सेनापति के विश्वासघात के कारण शाहजी को 16 जुलाई 1648 ई. को जिंजी में कैद कर लिया गया। शाहजी को कैद करने के पश्चात् बीजापुर से मुस्तफाखों ने फरादखों तानाजी डुरे और विदठल गोपाल नामक सरदारों को सेना देकर फतेहखाँ के नेतृत्व में शिवाजी की जागीर पर चढ़ाई करवाई। फतेहखँ ने पुरदर पर आक्रमण किया, परन्तु वह वहाँ से हारकर वापस भाग गया। मुस्तफाखों की जिनके अनुसार शिवाजी सिंहगढ़ किले को वापस दे देवें, तो शाहजी को मुक्त कर दिया जाएगा। इस पर शिवाजी ने सिंहगढ़ किले को वापस दे दिया और 16 मई 1649 को शाहजी को कैद मुक्त कर दिया गया। शाहजी फिर बीजापुर के सम्पर्क में आ गए। जब ई. 1653 में कर्नाटक में बहुत से झगड़े उठ खड़े हुए, तब आदिलशाह ने शाहजी भौंसले को शांति स्थापित करने हेतु वहाँ भेजा। शाहजी को शिकार खेलने की बड़ी रुचि थी, एक बार किसी हिरण का पीछा करते हुए शाहजी ने अपना घोड़ा सरपट दौड़ाया, अचानक घोड़े का पैर खडे में गिरा और घोड़े के साथ शाहजी भी गिर पड़े। 23 जनवरी 1664 को घटित इस घटना में ही शाहजी भौसले की भसवापटन में मृत्यु हो गई। शाहजी की मृत्यु के बाद आदिलशाह ने शिवाजी के साथ कुछ शर्ते रखीं । शाहजी की मृत्युपरांत शिवाजी की माता जीजाबाई ने सती होने का निश्चय किया। शिवाजी ने माता से आग्रह किया कि यदि आप सती हो जाओगे, तब मुझे किसका सहारा रहेगा। तब पुत्र के आग्रह पर उन्होंने सती होने का इरादा त्याग दिया। शिवाजी भौंसले-इतिहास प्रसिद्ध वीर शिवाजी भौंसले शाहजी के छोटे पुत्र थे। इनका जन्म जीजाबाई के गर्भ से ई. 1627 में हुआ। जब ये पाँच वर्ष के थे, तब इन्हें इनकी माता के साथ पूना भेज दिया गया। वहाँ दादा कोंणदेव पण्डित को इनके अभिभावक व इनकी जागीर के प्रबन्ध के लिए नियुक्त किया गया। वहाँ रहते हुए शिवाजी सैनिक शिक्षा में तो प्रवीण हो गए, परन्तु पढ़ने-लिखने पर उन्होंने बहुत कम ध्यान दिया। शिवाजी बाल्यकाल में रामायण, महाभारत और पुराणों की कथा तथा दक्षिण भारतीय एवं विजयनगर साम्राज्य के वीरों की शौर्य गाथाएँ भी सुना करते थे। इनकी आराध्य देवी भवानी थी, जिसकी आराधना किया करते थे। बचपन से ही उनके मस्तिष्क में यह विचार संचरित हो गया था कि मैं किसी प्रकार स्वतन्त्र राजा बनूँ। शिवाजी मिलनसार प्रकृति के धनी, चतुर और स्वभाव के वीर थे। उन्होंने मवालियों को संगठित करना शुरू किया तथा उनके साथ दूर-दूर तक जगलो में घूमते थे। उन्होंने बीजापुर और गोलकुण्डा की दुर्व्यवस्था का लाभ उठाकर अपने पुरुषार्थ और पराक्रम द्वारा कई गढ़ और परगने दबा लिए।


बीजापुर के अली आदिलशाह ने अपने सेनापति अफजलखाँ को शिवाजी पर चढ़ाई करने को कहा, तब अफजलखाँ ने यह प्रतिज्ञा की कि मैं शिवाजी को पकड़कर आपके सामने पेश करूँगा। अफजलखाँ सेना को लेकर शिवाजी पर चढ़ाई करने हेतु वाई की तरफ बढ़ा। रास्ते में उसने पंढ़रपुर और तुलजापुर के देवस्थानों को नष्ट किया। इसके समाचार सुनकर शिवाजी जावली पहुँच गए, जिससे अफजलखाँ का सरलता से आगे बढ़ने का मार्ग अवरुद्ध हो गया। अफजलखाँ ने जावली पर चढ़ाई करने के बजाय कूटनीति चाल अपनाते हुए शिवाजी के पास धमकी भरे संधि-संदेश भिजवाए तथा उन्हें यह भय दिखलाया कि उनके समस्त शत्रु एक होकर उन पर आक्रमण कर रहे है। शिवाजी को उसकी कूटनीति चाल का आभास हो गया, अतः उन्होंने यह संदेश भिजवाया कि अगर वह जावली आ जाएँ तो मुलाकात करके संधि की सब बातें मंजूर कर ली जाएंगी। अफजलखाँ ने भेंट का सन्देश तुरन्त स्वीकार कर लिया और उसने आकर कोयना नदी पर डेरा डाला।

अफजलखाँ ने निश्चय कर लिया कि शिवाजी ने मुझ पर विश्वास कर लिया है, अतः मैं उनसे मुलाकात के समय उनके पेट में कटार घुसेड़ कर उन्हें मार डालूगा, परन्तु उसकी इस चाल के प्रति शिवाजी सचेत थे। अफजलखाँ ने शिवाजी से मिलते ही अपनी कटार का वार उन पर किया, परन्तु शिवाजी ने जिरहबख्तर पहन रखा था, इसलिए वार निष्फल हुआ। तब शिवाजी ने अपने बाघनख से अफजलखां का पेट चीर डाला और उसकी मृत्यु हो गई।
मुगलों का दक्षिण का सूबेदार शाइस्ताखाँ अपने जनानखाने के साथ पूना में लाल महल में डेरा डालकर रह रहा था। शिवाजी ने अपने विश्वस्त एक हजार वीर सिपाहियों को साथ लिया और नेताजी पालकर तथा मोरोपत पेशवा को एक-एक हजारनसैनिक देकर उन्हें अलग-अलग रास्तों से भेजा। फिर चार सौ चुने हुए सैनिकों के साथ शिवाजी मुगलों के डेरे पर आए। वहाँ तैनात मुगल पहरेदारों को उन्होंने यह कह दिया कि हम मुगल पक्ष के मराठे हैं। शिवाजी ने एक बरात के साथ शहर में प्रवेश किया और मध्यरात्रि के समय शाइस्ताखाँ के डेरे पर आक्रमण कर दिया। रमजान का महीना था इसलिए मुस्लिम सैनिक दिन भर के रोजे के बाद भोजन करके सोए हुए सैनिकों ने रसोईघर को अपने कब्जे में किया और उधर से रास्ता बनाकर शिवाजी और उनके दो सौ सैनिक जनानखाने में घुस गए । जनानखाने में लगे हुए पर्दों को फाड़कर शिवाजी स्वयं शाइस्ताखाँ के पास पहुँच गए, तब उसकी स्त्रियों ने उसे जगाया| शाइस्ताखाँ खिड़की से कूदा तब शिवाजी ने तलवार से उसके हाथ की तीन अंगुलियाँ काट दीं पर वह जान बचाकर भाग गया। मुगल डेरे में भयानक अफरा-तफरी मची और मारकाट होने लगी। नक्कारखाने के नगाड़े बजने से मुगल सेना जाग उठी और युद्ध की तैयारी करने लगी। शाइस्ताखाँ का पुत्र अब्दुल फतहेखाँ तुरन्त अपने पिता की सहायता पर पहुँचा, परन्तु मराठों ने उसका काम तमाम कर दिया। शिवाजी ने अपने सैनिकों को एंकत्र किया और वहाँ से चले गए।


ईस्वी सन् 1664 में शिवाजी ने सूरत पर हमला किया। वहाँ छह दिन तक शिवाजी कर वसूल करते रहे और सूरत से धन लेकर वे सुरक्षित रायगढ़ आ गए। इसी समय शिवाजी के जहाजी बेड़े के अधिकारियों ने मक्का को जाने वाले यात्रियों से भरे हुए जहाज पकड़े और लोगों से बहुत-सा द्रव्य लेकर उन्हें छोड़ दिया। इन सब घटनाओं की जानकारी जब औरगजेब को मिली तब वह बहुत क्रोधित हुआ। वह स्वयं शिवाजी पर चढ़ाई करना चाहता था, परन्तु उत्तर भारत में चल रहे झगड़ों के कारण वह दक्षिण में नहीं आ सका।
शिवाजी औरंगजेब जैसे शक्तिशाली और कट्टर मुगल बादशाह से भी भय न खाकर दिल्ली की तरफ के इलाकों तक हाथ बढ़ाने लग गए थे। मुगल सेना के बार-बार शिवाजी के सामने परास्त होने पर आखिरकार औरंगजेब ने आमेर के कछवाहा शासक मिर्जा राजा जयसिंह को 1665 में शिवाजी के विरुद्ध दक्षिण में सूबेदार बनाकर भेजा। मुगलसेना ने पूना से होते हुए पुरंदर किले को जा घेरा, दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ, जिसमें मराठा किलेदार मुरारबाजी देशपांडे मारा गया, परन्तु किले पर कब्जा मराठा सेना का ही रहा। इस युद्ध के समय शिवाजी कोंकण में थे। वापस आने पर उन्हें मुगलों की चढ़ाई का पता चला। शिवाजी को यह स्पष्ट आभास हो गया था कि पुरंदर मुगलों के हाथ में गए बगैर नहीं रहेगा और मुगल एक के बाद एक करके मेरे समस्त किले विजय कर लेंगे। इसी विचार के अन्तर्गत शिवाजी ने मुगलों से संधि करना ही उचित समझा । उन्होंने रघुनाथ पण्डित के द्वारा मिर्जा राजा जयसिंह से सुलह की बातचीत शुरू करवाई। राजा जयसिंह ने रघुनाथ पण्डित का सम्मानपूर्वक स्वागत किया और उसका सन्देश सुना तथा शिवाजी से भेंट करना स्वीकार किया।


शिवाजी मुगलों से संधि करने हेतु पुरंदर गए, उन्होंने भेंट के समय सादी पोशाक धारण की। शिवाजी को भेंट के लिए आते देख आमेर के कछवाहा मिर्जा राजा जयसिंह ने कुछ आगे बढ़कर शिवाजी का स्वागत किया। फिर एक डेरे में उनकी परस्पर संधि से सम्बन्धित बातचीत हुई। संधि के अनुसार शिवाजी ने अपने किले बादशाह को दिए। सन्धि के बाद छत्रपति शिवाजी अपने पुत्र शंभाजी सहित आगरा गए। राजा जयसिंह ने आगरा में अपने बड़े पुत्र कुंवर रामसिंह को लिख भेजा कि शिवाजी मेरे आश्वासन पर आगरा आ रहे हैं, इसलिए उनकी पूर्ण सुरक्षा रखी जाए। आगरा पहुँचने के बाद बादशाह का रुख शिवाजी के प्रति अच्छा नहीं रहा। उसने शिवाजी को एक मकान में नजर कैद करवा दिया। एक बार जब कुवर रामसिंह को ज्ञात हुआ कि औरंगजेब शिवाजी को मरवाना चाहता है, तब कुं. रामसिंह बादशाह के पास गए और कहा कि शिवाजी मेरे पिता के आश्वासन पर आगरा आए है। इसलिए अगर आप इन्हें मरवाना चाहे तो पहले मुझे और मेरे पुत्रों को मरवा दीजिए फिर आपकी इच्छा हो वह करें। इस पर बादशाह ने शिवाजी को खत्म करने का विचार छोड़ दिया। अन्त में शिवाजी चतुराई के साथ मिठाइयों के टोकरों में बैठकर वहाँ से निकल गए। इनको कैद से निकलवाने में कुंवर रामसिंह आमेर का हाथ था। यह इससे भी सिद्ध होता है कि शिवाजी को कैद किए हुए मकान पर शिवाजी के पहरे पर रामसिंह के चार ब्राह्मण थे, जो किसी भी समय किसी भी कमरे में आ-जा सकते थे। उसके बाहर रामसिंह के राजपूत सैनिकों का पहरा था और उनके बाद चार घेरे मुगल सेना के पहरेदारों के थे।


इसलिए उन ब्राह्मणों के संकेत के बिना शिवाजी कैद से आजाद नहीं हो सकते थे। आगरा से दक्षिण की तरफ लौटने के कुछ वर्ष बाद शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक कराने का विचार किया। इस कार्य के लिए उन्होंने बनारस से पं. गंगाभट्ट को बुलाया, जो कि उस समय भारत में सबसे उच्च विद्वान माना जाता था। उसने रायगढ़ आकर यहनकहा कि मैं एक क्षत्रिय का ही राज्याभिषेक करवा सकता हूँ। जब तक मुझे यह नहीं मालूम हो कि आप क्षत्रिय हैं, मैं राज्याभिषेक नहीं कराऊँगा । इस पर शिवाजी ने अपने आदमी उदयपुर महाराणा राजसिंह के पास भेजे । महाराणा ने तब अपने पुरानी पीढ़ीनामों के आधार पर यह लिखा कि भौंसले मेंवाड़ के राणा वंश से ही हैं। इसके बाद ई. 1674 में रायगढ़ में शिवाजी का बड़ी धूम-धाम के साथ राज्याभिषेक उन्होंने अपनी मुद्रा में यह अंकित करवाया ‘क्षत्रिय कुलावतंस श्री राजा शिवा छत्रपति’ और उन्होंने अपने हुआ।


नाम के सिक्के भी निकलवाए। शिवाजी ने सुयोग्य और बुद्धिमान मंत्रियों की सलाह से राजकार्य चलाया उनके गुरु संत रामदास थे। इनका जन्म सन् 1608 ई. में हुआ था तथा इनकी मृत्यु शिवाजी के दो वर्ष बाद ई. 1682 में हुई थी। ये आजीवन ब्रह्मचारी रहे, इन्होंने शिवाजी और उनकी प्रजा को स्वराज्य स्थापना और धर्माचरण रीति-नीति के अनुसार स्वाभिमान का उपदेश दिया। वे उनका प्रत्येक कार्य में मार्ग-दर्शन करते थे। इसी
प्रकार जब तक शिवाजी की माता जीजाबाई जीवित रही, वह भी उन्हें हर कार्य में राय दिया करती थी। जीजाबाई महत्त्वाकांक्षी एवं धर्मपरायण नारी थी माता की धार्मिक
प्रवृत्ति और परिपोषण से तथा वात्सल्यपूर्ण व्यावहारिक ज्ञान के कारण ही शिवाजी को वीरत्व प्राप्त हुआ था। दादाजी कोंडदेव का भी शिवाजी की जीवनचर्या पर गहरा प्रभाव पड़ा। दादाजी कोंडदेव पहले हिंगाणी, वरेड़ी, देऊल गाँव आदि ठिकाणों के पटवारी थे। इन्होंने शिवाजी को युद्ध-शिक्षा से लेकर राज्य प्रबन्धन तक सक्षम किया। राज्याभिषेक के छह वर्ष बाद 3 अप्रैल ई. 1680, को रायगढ़ में ही शिवाजी का स्वर्गवास मआसिरुल उमरा में लिखा है कि शिवाजी न्यायकर्ता, गुणग्राहक और वीरता में प्रसिद्ध थे। शिवाजी के चरित्र के बारे में सर यदुनाथ सरकार ने अपने ग्रन्थ ‘औरंगजेब में लिखा है-शिवाजी ने सर्वदा अपने आक्रमण के समय धार्मिक स्थानों एवं धार्मिक पुरुषों को संरक्षण प्रदान किया, चाहे वे किसी भी धर्म के हो ।


शिवाजी का व्यक्तिगत जीवन का एक उच्च मानवीय सद्व्यवहार का प्रतीक है। वे एक आज्ञाकारी कर्त्तव्यपरायण पुत्र, एक प्रिय पिता एवं एक चैतन्य (सचेत) पति थे। उन्होंने जीवनपर्यन्त अपने सद्व्यावहारिक विचारों में कोई परिवर्तन नहीं किया। वे बचपन से ही बड़े धार्मिक थे, क्योंकि जीवन के प्रारम्भ से ही उनको धार्मिक ग्रन्थों की वीरतापूर्ण कहानियाँ व मधुर संगीत आदि सुनने को मिले थे । अतः उनमें स्पष्टवादिता, धार्मिक पुरुषों का आदर-सत्कार करना तथा निर्भीकता आदि गुणों का समावेश हो गया था। उनमें दूसरों को प्रभावित करने की आकर्षण शक्ति थी। शिवाजी एक सच्चे कर्त्तव्यपरायण देशभक्त थे, वे अपनी सेना के उच्चाधिकारियों का सदैव आदर करते थे और उनकी सेवाओं का पूर्ण लाभ उठाते थे। उनकी सेना का संगठन एक आदर्श योग्यता का उदाहरण था। प्रत्येक चीज अपने उचित स्थान पर सजग प्रहरियों की संरक्षता में रहती थी, प्रत्येक आक्रमण से पूर्व उनके पास अग्रिम सूचनाएँ हो जाती थीं शिवाजी की वास्तविक महत्ता उनकी सच्चरित्रता और आभ्यासिक योग्यता में निहित है। राजनैतिक दृष्टिकोण में भी चरित्र की उत्कृष्टता रहती थी। परिस्थिति अनुसार अपने चरित्र को किस प्रकार सफलता से उच्च रखना एवं प्रबन्ध करने की योग्यता आदि ही उनके जीवन की सफलता की कुंजी थी। उनके पूर्व मराठा जाति दक्षिण के राज्यों की वेतन-भोगी सैनिकों के रूप में थी। वे सुल्तानों की सेवा करते थे, परन्तु उनकी शासन में कोई भागीदारी नहीं थी। शिवाजी के जीवन समाप्ति के नौ वर्ष पश्चात् ही उनका राज्य समाप्त हो गया था, परन्तु उनके जीवन की प्रभावशाली सफलता इसी में थी कि उन्होंने अपने जीवनकाल में एक मराठा राज्य की स्थापना की तथा उनको स्वतन्त्र वायुमण्डल मे श्वास लेना सिखाया। उनके उत्थान से पूर्व मराठा शक्ति दक्षिण में अलग-अलग छोटे-नछोटे बहुत से राज्यों में विभाजित थी, जिनको उन्होंने एक सूत्र में बाँधकर राष्ट्र के रूप में स्थापित किया था ।


शिवाजी के दो पुत्र थे-शंभाजी और छोटे राजाराम। शंभाजी की कुपात्रता औरनउद्दण्डता के कारण शिवाजी ने उन्हें पन्हाले के किले में कैद कर दिया था। शिवाजी की मृत्यु पर मंत्रियों ने उनके छोटे पुत्र राजाराम को रायगढ़ की गद्दी पर बैठा दिया। वह अभीनबालक ही था शंभाजी ने पन्हाले के किले से निकल कर सेना एकत्र की और रायगढ़ जाकर स्वयं राजा बन गए तथा राजाराम को कैद कर दिया। आगरा से भागने के समय शंभाजी को शिवाजी ने कवि कलश के पास छोड़ दिया था। अब राजा बनने पर शंभाजी ने उसे बुलाकर अपना मंत्री बनाया औरंगजेब की बीजापुर और गोलकुण्डा से लड़ाइयाँ चल रही थीं, उस समय शंभाजी भी मुगलों से कुछ लड़ाइयाँ कर लेता था। उनसे निपटने के बाद औरंगजेब ने सम्पूर्ण शक्ति से शंभाजी पर आक्रमण किया। ई. 1689 में सेनापति मुकर्रबखाँ ने संगमनेर ने शंभाजी और उनके मंत्री कवि कलश को बन्दी बनाकर बादशाह के शिविर में पेश किया। औरंगजेब ने बड़ी निर्दयता के साथ उन दोनों को मरवा दिया। शंभाजी के पुत्र शाहू को भी बादशाह के यहाँ कैद कर लिया गया।


मराठों का जीवन संग्राम

शंभाजी की मृत्यु के बाद मुख्य-मुख्य मराठे सरदार रायगढ़ में एकत्र हुए और उन्होंने मुगलों से मराठा राज्य की रक्षा के लिए रणनीति पर विचार-विमर्श किया। बादशाहनऔरंगजेब द्वारा शंभाजी का वध कर दिए जाने के कारण महाराष्ट्र में मुगलों के विरुद्ध भयानक विद्रोह की ज्वाला फैल गई। स्वराज्य की रक्षा हेतु सैकड़ों मराठे सरदार जगह- जगह औरंगजेब की सेना से लोहा लेने लग गए । रायगढ़ में एकत्र होने वालों में मुख्यतः जनार्दन पन्त हणमन्ते, प्रह्लाद निराजी, रामचन्द्र पत, बहुतकर खंडों, बलाल चिटनीस, महाजी नायक, सन्ताजी घोरपड़े, धनाजी यादव और खाण्डेराव दाभाडे आदि मराठे सरदार थे। इन्होंने मराठा राज्य की रक्षा करते हुए मुगलों को कड़ी चुनौती दी। राजाराम भौंसले शिवाजी के दूसरे पुत्र राजाराम ने मुगलों से कई लड़ाइयाँ लड़ीं। उसने सतारा को अपनी राजधानी बनाया और बारह वर्ष तक राज्य किया। राजाराम की मृत्यु के पश्चात् उनकी पत्नी ताराबाई ने अपने बालक पुत्र शिवाजी द्वितीय को गद्दी पर बैठाया। वह बालक था, अतः ताराबाई ने ही समस्त राज्य प्रबन्ध किया और उनके नेतृत्व में मराठों ने मुगलों से कई किले वापस विजित किए। राजाराम ने 22 दिसम्बर, 1699 को बादशाह औरंगजेब के ब्रह्मपुरी स्थित शिविर पर सफल छापा मारा। बादशाह औरंगजेब की मृत्यु पर उसके पुत्र आजम ने शाहू को कैद से छोड़ दिया। शाहू ने जाकर ताराबाई से सतारा का राज्य छीन लिया, तब ताराबाई ने अपने पुत्र को लेकर कोल्हापुर जाकर अपना राज्य कायम किया। शाहू ने बालाजी विश्वनाथ को अपना पेशवा बनाया। यह पहला पेशवा था। बाद में मराठा राज्य की शक्ति पेशवा के ही हाथ में चली गई।


कोल्हापुर में भौंसला राज्य चलता रहा। अंग्रेजों के भारत आगमन के पश्चात् ई. 1765 और 1795 में अंग्रेजों से दो युद्ध हुए। अन्त में ई. 1812 में अंग्रेजों से सन्धि होने पर कोल्हापुर का भौंसला राज्य अंग्रेजों के अधीन हो गया। कोल्हापुर राज्य के नौ बड़े जागीरदार थे। इस राज्य का क्षेत्रफल 3217 वर्ग मील था। सांवतवाड़ी के भौंसला शासक-सांवतवाड़ी के शासक भी भौंसला ही थे तथा बीजापुर के अधीन थे। ई. 1554 में भाग सांवत ने बीजापुर की सेवा छोड़ दी। इस पर बीजापुर ने सेना भेजी जिसे उसने परास्त कर दिया और अपनी मृत्यु तक स्वतन्त्र रहा| इसके वंशज बाद में बीजापुर के मातहत हो गए। बाद में खेम सांवत फिर स्वतन्त्र हो गया और इसने ई. 1627 से 1640 तक स्वतन्त्र राज्य किया। इसके पुत्र लखम सांवत ने ई. 1650 में शिवाजी की अधीनता स्वीकार की। इस वंश के फोड़ सांवत तीसरे ने ई. 1730 में अंग्रेजों से संधि कर ली। उसके बाद खेम सांवत तीसरे ने पोर्चुगीज और अंग्रेजों से लड़ाई की। ई. 1812 अंग्रेजों ने फोड़ सांवत चौथे से पुनः संधि प्राप्त कर ली। उसे अंग्रेजों ने बैगुरला का बंदरगाह दिया और समुद्री डाकुओं को दबाने के लिए उसे लड़ाकू जहाज भी दिए। उस समय में ये शासक समुद्री युद्धों में बड़े प्रसिद्ध थे। इस राज्य का क्षेत्रफल 925 वर्गमील था। नागपुर के भौंसले-ये छत्रपति शिवाजी के परदादा बाबाजी के छोटे भाई परसोजी केनवंशज हैं। परसोजी का पुत्र मुधोजी निजामशाही में सेवारत था और अमरावती व भामगाँव उसकी जागीर में थे। फिर वह शम्भाजी की सेवा में रहा। उसके पुत्र परसोजी द्वितीय ने बराड़ आदि जिलों पर अपना अधिकार जमा लिया, जिस पर राजाराम ने खिलअत देकरनउन प्रांतों का स्वामी मान लिया। शाहू के राजा बनने पर परसोजी द्वितीय 15,000 सवारों के साथ उनसे जा मिला, उन्होंने उसे बराड़ आदि की बड़ी जागीर दी। इसके वंशज राघोजी भौंसले के समय में छिंदवाड़ा जिले में गोड़ों का राज्य था। उन्होंने नागपुर शहर बसाया और उसे अपनी राजधानी बनाई। जब गोड़ शासक चाँद सुल्तान के मरने पर गद्दी के लिए झगड़ा हुआ तब उन्होंने राघोजी भौंसला को फैसला करने हेतु बुलाया, परन्तु उनके झगड़े खत्म नहीं हुए तब अन्त में राधोजी भौसले ने नागपुर गोड़ों से छीन लिया। इसका पुत्र जामोजी, पेशवा और निजाम की लड़ाई में पेशवा की ओर से लड़ा था। राघोजी द्वितीय के समय में हुशंगाबाद और नर्मदा के दक्षिण का प्रवेश उसके राज्य में मिलाया गया। ई. 1803 में अंग्रेजों और सिन्धिया की लड़ाई में यह अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ा, परन्तु असई और आर गाँव की लड़ाइयों में इन दोनों की हार हुई। इसके फलस्वरूप राघोजी को कटक, दक्षिण बरार और सम्भलपुर अंग्रेजों को देने पड़े। बाद में इनका छोटा भाई आपा साहब (मुधोजी) नागपुर का स्वामी हुआ। इसके समय में अंग्रेजों का रेजीडेण्ट नागपुर में रहने लगा। ई. 1817 में अंग्रेजों और पेशवा के बीच युद्ध में उसने पेशवा का पक्ष लेकर अंग्रेजी सेना पर आक्रमण किया, परन्तु सीताबल्दी और नागपुर की लड़ाइयों में उसकी पराजय होने के कारण बरार एवं नर्मदा के दक्षिण प्रवेश के शेष बचे भू-भाग को भी अंग्रेजों को सौंपना पड़ा। इसके बाद भी वह अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई की तैयारी कर रहा था, इसका अंग्रेजों को पता चलने पर अंग्रेजों ने उसे गद्दी से हटाकर इलाहाबाद भेजने का निश्चय किया। रास्ते में से ही वह भागकर जोधपुर के महाराजा मानसिंह के पास
चला गया। मानसिंह ने उसका बड़ा स्वागत किया।


अंग्रेजों ने आपा साहब भौंसले (नागपुर) को उन्हें सौंपने हेतु महाराजा मानसिंह पर बड़ा दबाव डाला, परन्तु महाराजा मानसिंह ने उन्हें नहीं सौंपा। अन्त में ई. 1840 में आपा साहब भौसले की जोधपुर में ही मृत्यु हो गई। अंग्रेजों ने आपा साहब की जगह बाजीराव को नागपुर का शासक बनाया, परन्तु शासन का समस्त राजकार्य अंग्रेज रेजीडेंट के हाथ में ही रहा। ई. 1853 में उसकी भी निःसंतान मृत्यु हो जाने से डलहौजी ने नागपुर के राज्य को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया।

तन्जौर के भौंसले-छत्रपति शिवाजी के एक भाई बेंकाजी ने तन्जौर के नायक वंश को हटाकर वहाँ पर ई. 1674 में अधिकार किया। इनके कर्नाटक के नवाबों से कई युद्ध हुए थे। वहाँ के शासक शिवाजी की नि:संतान मृत्यु हो जाने पर तन्जौर के राज्य को भी डलहौजी ने अंग्रेजी राज्य में मिला लिया ।

गुहिलोत के अन्य राज्य

डूगरपुर-बांसवाड़ा-डूंगरपुर राज्य के सोलज गाँव के पास वोरेश्वर महादेव के मन्दिर में लगे हुए वि.सं. 1236 (ई. 1179) के शिलालेख से यह निश्चित है कि उस समय
गुहिलवंशी सामंतसिंह ड्रंगरपुर का शासक था। ई. 1179 से ई. 1947 में देश स्वतन्त्र होने तक डूंगरपुर पर गुहिलोतों का राज्य था। इस वश के अन्तिम शासक महारावल लक्ष्मणसिंह 15 नवम्बर 1918 ई. को डूंगरपुर राज्य के सिंहासन पर बैठे थे। महारावल उदयरसिंह प्रथम के पुत्र महारावल जगमाल ने वि.सं. 1575 (ई. 1518) को बांसवाड़ा राज्य की स्वतन्त्र रूप से स्थापना की। गुहिलोत वंश के महारावल पृथ्वीसिंह ने वि.सं. 1970 (ई, 1914) को बांसवाड़ा राज्य का शासन सभाला, जो भारत देश की स्वतन्त्रता तक सुचारु रूप से कायम रहा।

डूगरपुर

प्रतापगढ़-वि.सं. 1585 (ई. 1529) में प्रतापगढ़ राज्य के संस्थापक गहलोत राजवंश की सीसोदिया शाखा के राव सूर्यमल थे। इनके अन्तिम उत्तराधिकारी के रूप में वि.सं. 1985 (ई. 1929) में महारावल रामसिंह ने प्रतापगढ़ राज्य का शासन सभाला। इस तरह ई. 1529 से भारत के स्वतन्त्र होने तक प्रतापगढ़ राज्य पर गुहिलोतो का राज्य था।

शाहपुरा-शाहपुरा राजघराने के मूल पुरुष सुजानसिंह थे। ये राणावत सीसोदिया धरगने के थे तथा इन्होंने वि.सं. 1688 (ई. 1637) को शाहपुरा राज्य की नींव डाली। सीसोदिया राणावतों में राजाधिराज उम्मेदसिंह द्वितीय वि.सं. 1989 (ई. 1932) में बड़ी धूमधाम से शाहपुरा राज्य के सिंहासन पर बैठे और देश की स्वतन्त्रता तक शाहपुरा के शासन को संभालते रहे।

चन्द्रावत

सीसोदा के राजा भीमसिंह के छोटे पुत्र का नाम चन्द्रसिंह था जो मेवाड़ त्यागकर बाहर चला गया था। इसी चन्द्रसिंह के वंशज चन्द्रावत कहलाए। चन्द्रसिंह ने आंतरी परगने में अपनी जागीर कायम कर ली थी। इसके वंश में शिवसिंह हुए, जो बड़े बहादुर थे। मांइू के सुल्तान हुशमगोरी की बेगम आांतरी क्षेत्र के निकट नाव पर सवार होकर नदी पार कर रही थी, कि अचानक नाव डूब गई। संयोग से उस समय निकट ही शिवसिंह शिकार कर रहे थे जैसे ही शिवसिंह ने नाव को डूबते देखा, वे तुरन्त नदी में कूद पड़े और बेगम को बचा लिया। बेगम ने सुल्तान को शिवसिंह की वीरता की चर्चा कर उन्हें राव का खिताब और 1400 गांवों की जागीर दिलवाई। शिवसिंह का प्रपौत्र दुर्गाकरण था, जिसने रामपुरा बसाया जो बाद में सम्राट अकबर के अधीन हो गया था। इसका मनसब चार हजार तक पहुँच गया था। बाद में यह परगना होलकर के नीचे चला गया था, तब ये उसके मातहत हो गए थे।

विजियानगरम्

उत्तरी तमिलनाडु में विजियानगरम् की बड़ी जमींदारी थी । यह वंश गुहिलवंशी (सीसोदिया) है। इस वंश का मूल पुरुष माधववर्मन था। इसके वंश में पशुपति माधववर्मन ने ई. 1662 में विजियानगरम् राज्य स्थापित किया। बाद में इसके वंश में विजय रामराज्य था, जो बड़ा वीर था। उसने पोतनूर के बदले विजियानगरम् को राजधानी बनाया। इस वंश में सर बिजी बड़े प्रसिद्ध खिलाड़ी हुए हैं। इन्हें ‘राजू’ कहा जाता है, जिनकी
आन्ध्रप्रदेश में काफी आबादी है।

काठियावाड़ के गोहिल

मारवाड़ में खेड़ पर पहले गुहिलवंशियों का राज्य था। ये गुहिलवंशी मेवाड़ के गुहिलवंशीय शासक शालिवाहन के वंशज थे। इनका खेड़ पर कई पीढ़ियों तक शासन रहा। इन गुहिलो में से एक साहार हुआ। उसका पुत्र सहजिग (सेजक) था। ये लोग राजस्थान से काठियावाड़ गए तथा वहाँ सोलंकी राजा कुमारपाल की सेवा में रहे। ये
कुमारपाल के अगरक्षक रहे। सहजिग ने वहाँ सहजिगेश्वर नामक शिवालय बनवाया। वि.सं. 1202 के शिलालेख में इसे गुहिलवंशी लिखा है तथा इस शिलालेख में इसके
पिता का नाम साहार लिखा है। सोमराज के बड़े भाई मुलूक ने जो सौराष्ट्र का शासक था, इस शिवालय की पूजा-व्यवस्था के लिए विभिन्न स्थानों पर कर लगाए। दूसरा शिलालेख वि.सं. 1287 का सौराष्ट्र के शासक सहजिग के पुत्र मुलूक का है। इन दोनों शिलालेखों से यह सिद्ध होता है कि ये गोहिल मारवाड़ से काठियावाड़ में गए तथा सोलंकी शासकों के सामन्तों के रूप में रहे। ।
मारवाड़ में राठौड़ सीहा ने अपना राज्य स्थापित किया तथा उसके ने खेड़ के गुहिलों के मन्त्री डाभी राजपूतों से मिलकर खेड़ पर अधिकार कर लिया। उसके बाद गुहिलों की जैसलमेर में रिश्तेदारी होने के कारण वे जैसलमेर चले गए। गुहिलों के भाई-बन्धु पहले से ही काठियावाड़ में थे जैसलमेर से वे उनके पास काठियावाड़ चले
पुत्र आस्थान गए।

भावनगर

वि.सं. 1202 के करीब सहजिंग की मृत्यु के बाद मुलूक का पुत्र राणक शासक हुआ। भावनगर के राजा उसी राणक के वंशज हैं। राणक का पुत्र मोखला हुआ।
मोखला के दो पुत्र डूंगरसिंह और समरसिंह हुए। डूंगरसिंह ने घोघा राज्य स्थापित किया तथा समरसिंह राजपीपला (रेवाकांठा में) का स्वामी हुआ। डूंगरसिंह के बाद वीजा, काना और सारंग हुए। काना के समय अहमदाबाद के सुलतान की फौज उससे कर वसूल
करने गई। पूरी रकम न देने पर फौज को अपने साथ ले आई। इस बीच सारंग का काका राम राज्य का स्वामी बन गया। सारग अहमदाबाद से भागकर चापानेर के रावल की सहायता लेने उमराला गया और फिर लाठी आदि के अपने रिश्तेदारों की सहायता से उसने अपना राज्य वापस लिया। सारंग के बाद क्रमशः शिवदास, जेठा और रामदास गद्दी पर बैठे। रामदास ने वि.सं. 1557 से 1592 तक राज्य किया। रामदास के बाद सुरताण
और वीसा ने क्रमशः राज्य संभाला। वीसा ने सीहोर पर अधिकार कर उसको अपनी राजधानी बनाया। वीसा के बाद क्रमशः धूणा, रतन और हरभम राज्य के स्वामी हुए।
हरभम की वि.सं. 1679 में मृत्यु के बाद उसका बालक पुत्र अखैराज प्रथम राज्य का उत्तराधिकारी हुआ। हरभम के भाई गोविन्द ने अखैराज के राज्य पर कब्जा कर
लिया, जिसे अखैराज ने गोविन्द की मृत्यु के बाद उसके पुत्र सत्रशाल से वापस लिया। वि.सं. 1717 में अखैराज प्रथम की मृत्यु के बाद रतन द्वितीय और रतन के बाद भावसिंह राज्य का उत्तराधिकारी हुआ।

वीर मोखडाजी
वीर मोखडाजी


भावसिंह ने वि.सं. 1780 में भावनगर बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया। उसने घोघे की तरफ भूमि दबाकर राज्य का विस्तार किया। भावरसिंह के समय राज्य व्यापार में वृद्धि हुई और उसने राज्य के पास स्थित समुद्री डाकुओं और लुटेरों का दमन किया, जिससे भावनगर राज्य और बम्बई की सरकार में घनिष्ठ सम्बन्ध हुए। रावल भावसिंह ने खंभात के नवाब से रक्षा के नाम पर सूरत के सीदी को भावनगर के बन्दरगाह की चुंगी में से चौथाई देना स्वीकार किया, जो वि.सं. 1816 से अंग्रेजी सरकार को जाने लगी।


भावसिंह के पाँच पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र अखैराज द्वितीय उसका उत्तराधिकारी हुआ तथा वीसा बल्ला का स्वामी हुआ। रावल अखैराज द्वितीय ने लुटेरों से तलाजा और
महआ छुड़ाने में बम्बई सरकार की सहायता की, जिससे उन जिलों पर बम्बई सरकार का अधिकार हो जाने पर उसने तलाजा का किला अखैराज को देना चाहा, परन्तु
करने पर वह खंभात के नवाब को दिया गया वि.सं. 1829 में अखैराज द्वितीय का देहान्त होने पर वख्तसिंह उसका उत्तराधिकारी हुआ। वख्तसिंह ने नवाब से तलाजा का किला छीन लिया, परन्तु अन्त में उसे उसके लिए 75,000 रुपये देने पड़े।


मरहठों के उत्कर्ष के बाद गुजरात और काठियावाड़, पेशवा और गायकवाड़ के बीच बंट गए तथा भावनगर राज्य का पश्चिमी बड़ा भाग गायकवाड़ के और पूर्वी छोटा भाग, जिसमें भावनगर था, पेशवा के अधिकार में माना गया। वि.सं. 1859 मेंनवसीन की सन्धि के अनुसार धंधुका और घोघा के जिले अंग्रेजी सरकार के अधीन था तब से इस राज्य का सम्बन्ध अग्रेजी सरकार तथा गायकवाड़ के साथ रहा। कर के रूप में अंग्रेजों को 11,600 रुपये तथा गायकवाड़ को 74,500 रुपये सालाना देना पड़ता था।


वि.सं. 1869 में बख्तसिंह ने वृद्धावस्था के कारण राज्य के अधिकार अपने पुत्र विजयसिंह को दे दिए। विजयसिंह के पुत्र भावसिंह द्वितीय का पिता के जीवनकाल में ही स्वर्गवास होने के कारण उसके पुत्र अखैराज तृतीय वि.सं. 1909 में अपने दादा कानउत्तराधिकारी हुआ। अखैराज तृतीय के बाद उसका भाई जसवन्तरसिंह गद्दी पर बैठा। वि.सं. 1927 में जसवन्तरसिंह के निधन के बाद उसका बालक पुत्र तख्तसिंह द्वितीय राज्य का स्वामी हुआ। उसे शिक्षा के लिए राजकुमार कॉलेज, राजकोट भेजा गया तथा राज्य का काम एक अग्रेज अफसर और दीवान गौरीशकर उदयशकर ओझा चलाते रहे। तख्तसिंह द्वितीय की मृत्यु के बाद वि.सं. 1953 में उसका पुत्र भावसिंह तृतीय गद्दी पर बैठा। भावसिंह तृतीय की वि.सं. 1976 में मृत्यु होने पर उसका पुत्र कृष्णकुमारसिंह सात वर्ष की उम्र में भावनगर राज्य का स्वामी हुआ।

पालीताणा

पालीताणा काठियावाड़ में दूसरे दर्जे का राज्य था। गोहिल सेजक के पुत्र को मांडवी की जागीर मिली। इस वंश में आगे सरजण, अरजण और नौघन हुए। जब भावनगर के पूर्वज सारंग को अहमदाबाद के सुलतान की फौज कर न चुका पाने के कारण उठा ले गई, तब उसके काका राम ने उसका राज्य दबा लिया, तो उसने चांपानेर के रावल और नौघन की सहायता से राज्य वापस लिया। नौघन को उसने प्रसन्न होकर 12 गाँव।दिए, जिससे इनके राज्य गारियाघर का विस्तार हुआ। नौघन के बाद क्रमशः भारा, वन्ना, शिवा, हद्दा, खांधा और नौघन द्वितीय गारियाघर राज्य के शासक हुए उसके बाद अर्जुन द्वितीय, खांधा द्वितीय और शिवा द्वितीय क्रमशः राज्य के स्वामी हुए।

शाहजहाँ बादशाह के समय यह क्षेत्र मुगल साम्राज्य के अन्तर्गत रहा, जिसको मुरादवख्श ने शान्तिदास नाम के जैन जौहरी को दे दिया। शान्तिदास ने दारा और औरंगजेबनके बीच हुए युद्ध में दारा की रुपयों से मदद की थी। औरंगजेब के मरने के बाद मुगल राज्य का पतन हुआ तथा यह क्षेत्र गारियाघरों के गोहिलों के हाथ में आ गया और पालीताणा को उन्होंने अपनी राजधानी बनाया। शिवा द्वितीय के बाद सुरताण, पृथ्वीराज, नौघन तृतीय और सुरताण द्वितीयराज्य के क्रमशः स्वामी हुए। सुरताण द्वितीय को उसके भाई अल्लू ने धोखे से मरवा दिया तथा राज्य पर कब्जा कर लिया। इस विषय और घटना को लेकर भावनगर और पालीताणा के बीच युद्ध हुआ तथा अन्त में समझेऔता हो गया। इसके बाद सुरताण का भाई उनड़ राज्य का स्वामी हुआ।


पालीताणा राज्य की आर्थिक स्थिति कमजोर होने से उसने सेठ वखतचन्द खुसालदास जौहरी से काफी कर्ज लिया तथा राज्य का अधिकांश भाग उस जौहरी के
पास गिरवी रखना पड़ा। उनड़ के बाद उसका पुत्र खाधा चतुर्थ राज्य का स्वामी हुआ। अंग्रेजों के समय भी यह राज्य सेठ वखतचन्द की कर्जदारी में डूबा रहा। वि.सं. 1897 मेंनखांधा के देहान्त के बाद उसका पुत्र नौघन चतुर्थ राज्य का स्वामी हुआ। उसके कुंवर प्रतापसिंह ने पिता का राज्य संभालते समय, पिता के समय में ही सेठ का कर्ज चुकाकर राज्य की आय अपने हाथ में ले ली थी। वि.सं. 1917 में पिता की मृत्यु पर वह राज्य का स्वामी हुआ, लेकिन उसी वर्ष ही उसकी मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र शूरसिंह राज्य की गद्दी पर बैठा। शूरसिंह योग्य और बुद्धिमान शासक था। उसके देहावसान के बाद वि.सं. 1942 में उसका पुत्र मानसिंह पालीताणा का शासक हुआ तथा मानसिंह के बाद वि.सं. 1962 में उसका पुत्र बहादुरसिंह राज्य का स्वामी हुआ।

लाठी

काठियावाड़ के राज्यों में लाठी चौथे दर्जे के राज्यों में था। गोहिल सेजक के पुत्र सारंग के वंशज लाठी वाले गोहिल हैं। सारंग को आर्थिला का परगना जागीर में मिला। उसका पुत्र जस्सा हुआ तथा जस्सा के पुत्र नौघन ने लाठी को विजय किया। नौघन के बाद उसका भाई भीम गद्दी पर बैठा । भीम के अर्जुन और दूदा मंडलीक महाकाव्य के अनुसार अर्जुन ने बहुत-से मुगल सैनिकों को मारा तथा अन्त में स्वयं भी मारा गया और उसके बाद दूदा राज्य का स्वामी हुआ। अर्जुन के कुन्ता नाम की पुत्री थी, जिसका पालन-पोषण दूदा अपनी पुत्री समझकर करता था। उसका विवाह गिरनार के राजा महीपाल के पुत्र मंडलीक के साथ हुआ। दूदा ने मुगल सुल्तान की भूमिनपर कब्जा कर रखा था। सुल्तान महीपाल का मित्र था। सुल्तान ने महीपाल को कहलवाया ।


तुम्हारा रिश्तेदार मेरी भूमि पर कब्जा करता जा रहा है, उसके रोको। महीपाल ने सुल्तान की सहायता करना स्वीकार किया। इस पर मंडलीक ने दूदा के राज्य पर चढ़ाई नकी। दूदा ने मंडलीक से कहा कि मेरी भरतीजी तुम्हें ब्याही है, इसलिए मैं तुमसे युद्ध नहीं करूंगा, जिसे मंडलीक ने नहीं माना। अन्त में दूदा युद्ध में मारा गया तथा आर्थिला का काफी नुकसान हुआ। इसके बाद दूदा के पुत्र लूणशाह ने लाठी को अपनी राजधानी बनाया। भावनगर वालों के पूर्वज सारंग को गया हुआ राज्य वापस दिलाने में सहायता की, जिसके बदले सारंग ने उसे 12 गाँव दिए। लाठी के स्वामी बड़े बहादुर और उन्होंने आस-पास के गाँव जीतकर राज्य का विस्तार किया, परन्तु पिछले समय भावनगर, पालीताणा आदि द्वारा किए गए आक्रमणों से राज्य का अधिकांश हिस्सा उनके हाथ से निकल गया। राज्य में काफी आर्थिक नुकसान होने के कारण गायकवाड़ को तय कर नहीं पहुँच सका । ऐसी स्थिति में उसने अपनी पुत्री का विवाह दामाजी गायकवाड़ के साथ कर दिया। इस रिश्ते से लाठी राज्य का अन्त होते हुए बच गया। उसके बाद गायकवाड़ ने उसके राज्य से कर लेना छोड़ दिया। इसके बाद शूरसिंह और तख्तसिंह क्रमशः लाठी राज्य के स्वामी हुए। तख्तसिंह के बाद शूरसिंह द्वितीय (बापूभा) उसका उत्तराधिकारी हुआ तथा इसके बाद प्रतापसिंह
का पुत्र प्रह्लादसिंह लाठी का स्वामी हुआ।

राजपीपला


गुजरात के रेवाकांठा क्षेत्र में राजपीपला नामक राज्य, भावनगर के गोहिलनराजवंश से निकला था। भावनगर वालों का पूर्वज मोखड़ा में रहता था, उसका ज्येष्ठ पुत्र डूंगरसिंह घोघा में रहा और दूसरा पुत्र समरसिंह राजपीपला का स्वामी हुआ। वह अपने ननिहाल में रहता था, जो परमार वंश के अपने नाना की मृत्यु के बाद राजपीपला राज्यनका मालिक हुआ और उसने अपना नाम अर्जुनसिंह रखा । इसके बाद भाणसिंह और गेमलसिंह हुए। गेमलसिंह के समय गुजरात के सुल्तान ने राजपीपला छीन लिया, परन्तु उसके पुत्र विजयपाल ने राज्य पर वापस अधिकार कर लिया। इसके बाद पृथ्वीराज, दीपा, करण, अभयराज, सुजानसिंह और भैरवसिंह आदि राजपीपला के राजा हुए। भैरवरसिंह की दुर्गशाह, मोहराज, रायसाल, चन्द्रसेन, गंभीरसिंह, सुभेराज, जयसिंह, मूलराज, उदयकरण, चन्द्र, छत्रसाल, वैरीसाल, जीतसिंह, प्रतापसिंह, रायसिंह और उसके बाद पृथ्वीराज द्वितीय गद्दी पर बैठा। इसके पश्चात् दिलीपसिंह, अजबसिंहनआदि राजपीपला के शासक हुए। ।

धरमपुर

धरमपुर गुजरात के सूरत जिले में स्थित गुहिलवंशियों का राज्य था। चित्तौड़ के शासक रणसिंह (कर्णसिंह) का उत्तराधिकारी क्षेमसिंह हुआ। उसके दो भाई माहप और
राहप थे। माहप को सीसोदा ग्राम की जागीर मिली। उसके पश्चात् उसका छोटा भाई सीसोदा का स्वामी बना। राहप के वंशजों में से भामाशाह (रामराजा) नामक एक पुरुष गुजरात में गया, उसने भील राजा को परास्त करके राज्य छीन लिया और राज्य का नाम रामनगर रखा। इसी के वंशजों में धरमपुर वाले है। रामशाह के बाद क्रमश: सोमशाह,।पुरंदरशाह, धर्मशाह, भोपशाह, जगतशाह, नारायणशाह, धर्मशाह(दूसरा), जगतशाह(दूसरा) वहाँ के शासक हुए। इसी वशक्रम में कुछ पीढ़ी बाद रामदेव हुआ।
रामदेव की मृत्यु के बाद वि.सं. 1821 (ई. 1764) में उसका पुत्र धर्मदेव शासक हुआ, जिसने अपने नाम से धरमपुर बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया।

बड़वानी

मध्यभारत में बड़वानी गुहिलवंशियों का राज्य था। इस राज्य के प्राचीन इतिहास की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं होती। यहाँ के शासक राणा भीम के बाद का इतिहास शृंखलाबद्ध मिलता है। धनुक (धुंधुक) का 29वाँ वंशधर मालरसिंह हुआ। उसके तीन पुत्र वीरमसिंह, भीमसिंह और अर्जुन हुए। वीरमसिंह अपने पिता का उत्तराधिकारी हुआ। उसके पुत्र कनकरसिंह ने अलीराजपुर राज्य और रतनमाल की बहुत-सी भूमि दबाकर अपना राज्य बढ़ाया। उसने आवासगढ़ का राज्य तो अपने चाचा भीमसिंह को दे दिया और स्वयं रतनमाल में रहने लगा, जो इनके वंशधरों के अधिकार में रहा।

तंजावर (तंजोर)

तंजोर गुहिलवंश की भौसला शाखा का राज्य था। वहाँ पर पहले नायक वंश के राजा राज्य करते थे। बीजापुर के सुलतान ने अपने सेनापति वेंकाजी भौंसले को, जो
छत्रपति शिवाजी का भाई था, तंजोर के शासक चौक्कनाथ पर दल-बल सहित भेजा।
उन्होंने तंजोर पर अधिकार कर लिया। कुछ समय बाद ईस्वी 1674 (वि.सं. 1731) के आसपास वेकाजी स्वयं तंजोर के स्वामी बन गए। उनकी मृत्यु के बाद उनका पुत्र शाहजी वहाँ का शासक हुआ। तत्पश्चात् उसका भाई शरफोजी उत्तराधिकारी जिसकी हुआ, निःसंतान मृत्युपरांत उसका भाई तुकोजी तजोर का शासक बना। इसके बाद क्रमशः येकोजी और सयाजी राजा बने । तुकोजी के दासी पुत्र ने सयाजी से राज्य छीन लिया।
फिर शिवाजी के समय में लार्ड डलहौजी ने इस राज्य को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया। नेपाल के शासक रावल रतनसिंह के समय में जब चित्तौड़ का प्रथम जौहर हुआ, तब रतनसिंह का छोटा भाई कुंभकर्ण बाहर चला गया था, जो कुमाऊं के पहाड़ी क्षेत्र में होते हुए पाल्पा में जा बसा। वहाँ उसने अपना राज्य बढ़ाना शुरू किया।

महाराजा पृथ्वीनारायण

शाह (ई. 1799-1831) ने नेपाल को विजय किया। तब से यही वंश वहाँ राज्य कर रहा है। मेवाड़ के प्रसिद्ध इतिहास ग्रंथ ‘वीरविनोद’ में कुंभकर्ण से पृथ्वीनारायण शाह तक की वंशावली दी गई है। इनके पाँच पीढ़ी बाद महाराजाधिराज राजेन्द्र विक्रमशाह (ई 1873-1904) हुए। उन्होंने ‘राजकल्पद्रुम’ नाम का तन्त्र ग्रन्थ लिखा है, जिसमें उन्होंने अपनी जो वंशावली दी है, वह ‘वीरविनोद’ की वंशावली से काफी मिलती-जुलती है।नउसमें भी उन्होंने अपने पूर्वज का चित्रकूट (चित्तौड़) से आना बताया है। आज विश्व में जो एक स्वतन्त्र राज्य हिन्दुओं का है, वह नेपाल है। यह वंश क्षत्रियों में गुहिलवंशियों का
है। पृथ्वीनारायण शाह ने ई. 1768 में नेपाल पर चढ़ाई की तथा काठमांडू को विजय कर उसे राजधानी बनाया। यह नेपाल का पहला महाराजाधिराज हुआ। बाद में उसने
पाटन और भाटगाँव के राज्यों को भी जीत लिया । इसमें उसके सेनापति राणा रामकृष्ण ने बड़ी कार्यकुशलता दिखलाई। राणा भी इसी वंश का था । ई. 1771 में महाराजाधिराज पृथ्वीनारायण शाह की मृत्यु हुई।

महाराजाधिराज गिरवाण विक्रमशाह के समय में नेपाल और अंग्रेजों का युद्ध हुआ। अग्रेजी सेना का संचालन जनरल ओक्टर लोनी कर रहा था और गोरखा सेना का सेनापति अमरसिंह थापा था । इस युद्ध में अंग्रेजों की हार हुई। उनका जनरल गिलेस्पी युद्ध में मारा गया। कुछ समय बाद फिर अंग्रेजों ने जनरल ओक्टर लोनी के नेतृत्व में नेपाल पर सेना भेजी। इस बार नेपाली सेना की हार हुई, जिससे ई. 1816 में नेपाल और
अंग्रेजों के बीच सन्धि हुई। महाराजाधिराज सुरेन्द्र विक्रमशाह ने राणा जंगबहादुर को अपना सचिव मन्त्री बनाया और उसे पूरे अधिकार दे दिए। बाद में धीरे-धीरे राणाओं का इतना प्रभाव बढ़ गया था कि महाराजाधिराज सिर्फ नाम के ही रह गए थे महाराजाधिराज, राणा मोहन शमशेरजंग के विरुद्ध नेपाल से निकलकर भारत में आ गए थे। पण्डित
जवाहरलाल नेहरू ने महाराजाधिराज का पक्ष लिया और अन्त में राणाओं को नेपाल से हटना पड़ा तथा महाराजाधिराज पूरे अधिकारों से नेपाल के स्वामी हुए । नेपाल के वर्तमान महाराजा वीरेन्द्र वीर विक्रमशाह हैं ।

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