बड़गूजर : भारत का गौरवशाली क्षत्रिय वंश

बड़गूजर : भारत का गौरवशाली क्षत्रिय वंश

बड़गूजर सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं। इनका गौत्र-वसिष्ठ तथा प्रवर-वसिष्ठ, अत्रि और सांकृति है। वेद-यजुर्वेद, शाखा-वाजसनेयी, सूत्र – पारस्कर, गृह्यसूत्र, कुलदेवी- कालिकाजी और इष्टदेव-लक्ष्मण हैं। इस वंश के क्षत्रिय स्वयं को राघव भी कहते हैं।.इस वंश का निकास सूर्यवंशी रामचन्द्र के पुत्र लव से है। ये ढूंढाड़ प्रदेश के शासक थे। ‘राजौर (अलवर राज्य में) तथा ‘दौसा (जयपुर राज्य में) इनकी राजधानियाँ रहीं।


गुजरात में वल्लभी का राजा शीलादित्य अयोध्या के महाराजा रामचन्द्रजी के पुत्र लव का वंशज था। ईस्वी 524 में शत्रुओ द्वारा उसका राज्य नष्ट कर दिया गया। उस समय उसकी एक रानी सुभागा जो कि गर्भवती थी, अम्बाजी के दर्शन करने गई हुई थी। जब उसे अपने पति के मारे जाने की खबर मिली तो वह मेवाड़ से नागदा आ गई। यहाँ उसके पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम गुहिल रखा गया। जन्म के बाद 10 दिन का होते ही गुहिल को उसने एक ब्राह्मण एवं अन्य सेवकों के सुपुर्द कर वह सती हो गई। गुहिल बड़ा होकर बड़ा तेजस्वी और प्रतापी राजा हुआ। उसका राज्य मेवाड़ के अलावा पाली, अजमेर, चाकसू, दौसा और आगरा तक फैला हुआ था। गुहिल का समय ईस्वी 568 के आस-पास का माना जाता है।
राजा गुहिल के वंशजों में एक ( ई. 593 के लगभग) राजौरगढ़ को अपनी राजधानी बनाकर वहाँ रहने लगा। उसके पूर्वज गुजरात से आए थे, इसलिए उसके वंशजब ड़गूजर कहलाए तथा राजौर में बसने के कारण राजौरा कहलाए और रघुवंशी होने के कारण अपने नाम के पीछे राघव लिखने लगे राजौर के बड़गूजरों की शाखाएँ देवती, मांचेडी, दौसा, तीतरवाड़ा, कोलासर, शंकरगढ़, भानगढ़ और सीकरी तक फैली हुई थी।


जहाँ इनके छोटे-छोटे राज्य कायम हो गए थे। इस समय उत्तर भारत पर सम्राट हर्षवर्धन का राज्य था, जिसकी राजधानी कन्नौज थी। वर्तमान अलवर जिले के टहला के अन्तर्गत एक गोलाकार पहाड़ी, प्राकृतिक दुर्ग के समान है। यहाँ बड़गूजर शासकों के बनाए गए मन्दिर कदम-कदम पर है। इसी क्षेत्र में कन्नौज के प्रतिहार साम्राज्य के समय के दो शिलालेख मिले हैं। प्रथम शिलालेख वैशाख बदी 13 वि.सं. 979 (ईस्वी 922) का शान्तिनाथजी के जैन मन्दिर में मिला, जिसमें राजौर के राजा महिपालदेव का नाम आता है और दूसरा शिलालेख नीलकंठ महादेव के मन्दिर के पास माघ सुदी 13 वि.सं. 1016 (ई. 960) का मिला, जिससे ज्ञात होता है कि उस समय राजौर पर महाराजाधिराज सावट के पुत्र महाराजाधिराज परमेश्वर मंथनदेव बड़गूजर राज्य करता था। वह कन्नौज के प्रतिहार सम्राट परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर क्षितिपालदेव (महीपाल) का सामंत था। मंथनदेव कन्नौज के प्रतिहार सम्राट महीपाल के बड़े सामंतों में था।


दौसा का आधा क्षेत्र तो बड़गूजरों के अधिकार में था और शेष इलाका मोरां के चौहान शासकों के अधिकार में था। नरवर के राजा सोढ़देव कछवाहा के का विवाह मोरां के चौहान शासक रालणसिंह की पुत्री से हुआ था | चौहानों और बड़गूजरों में अनबन थी। वे एक-दूसरे के गाँव दबाने में लगे हुए थे। अतः रालणसिंह ने अपनी सहायता हेतु दुलहराय को नरवर से बुलाया और चौहानों एवं कछवाहों ने मिलकर बड़गूजरों से दौसा का उनके हिस्से का क्षेत्र छीन लिया। आधा क्षेत्र जिस पर पहले से ही चौहानों का अधिकार था, वह भी उन्होंने अपने दामाद दुलहराय कछवाहा को दे दिया।

पुत्र दुलहराय इस प्रकार दौसा के पूरे क्षेत्र पर दुलहराय कछवाहा का अधिकार हो गया। दौसा वाले अपने भाई-बन्धुओं की सहायता के लिए देवती के बड़गूजरों की सेना आई, किन्तु उसे भी चौहानों और कछवाहों की सम्मिलित शक्ति के आगे हार कर वापस जाना पड़ा। राजौरगढ़ का रामराय बड़गूजर सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पिता अजमेर के शासक सोमेश्वर का सामंत था। जब सोमेश्वर ने मेवात के शासक मुदगलराय पर चढ़ाई की तो उस युद्ध में मुदगलराय के सामत कुरभ को रामराय ने द्वन्द् युद्ध में मारा। रामराय के अलावा पृथ्वीराज चौहान के सांमतों में ढूंढाड़ का कनकराय, विजयराय, चन्द्रसेन और संग्रामसिंह थे। सम्भवतः ये रामराय के परिवार के भाई-बन्धु होंगे। ईस्वी सन् 1183 में पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर चढ़ाई की, उस समय रामराय और कनकराय दोनों उसके साथ थे। गुजरात के राजा भीमदेव सोलंकी ने नागौर पर चढ़ाई की तो उसका रास्ता रोकने के लिए पृथ्वीराज ने जो सेना भेजी, उसके साथ रामराय भी था । इस युद्ध में रामराय की वीरता का ‘पृथ्वीराज रासो’ में वर्णन है ।

बड़गूजर : भारत का गौरवशाली क्षत्रिय वंश ( प्रतीकात्मक तस्वीर )
बड़गूजर : भारत का गौरवशाली क्षत्रिय वंश ( प्रतीकात्मक तस्वीर )


कवित्त : बड़गुज्जर राजैत, छत्र देखे पहनवै।
वै नीसांनी मार, घाट गिरवर पहनवै ।
अधरा खंडन खाग्ग, झग्ग झूरे सुपमारह ।
मनो सराली जंग, पांन कुहे गंमारह।
रा रामदेव देवत्त तुआ, जाजै जौरि जुहथ्थ किय।
नर नागदेव देवी बिहसि, पंजुलि पुंज अहास किय।॥
जिन थक्का जरि देव, सेव थक्की मातंगी।
धर थक्की धर भार, भार थक्यो शिव संगी ।
कर थक्क करिवार, वान थक्का कम्मांना।
मुख थक्का मुख मार, ठान थक्का तुरकांना।
थक्कान जैत जज्जर बलां, कलिन रामगुज्जर अरो ।
चालुक्क राव गुज्जर पतो, धाय धाय घुंमर परो।
(पृथ्वीराज रासो समय 12, पृष्ठ-509, 510)

शाहबुद्दीन गौरी ने नागौर पर चढ़ाई की तो उससे मुकाबला करने के लिए पृथ्वीराज स्वयं सेना लेकर गया। इस सेना के हरावल में कनकराय और दाहिने अंग पर रामराय था। सारूण्डा के निकट युद्ध हुआ, जिसमें राजपूतों की विजय हुई।
कवित्त
बडगुज्जर रा राम, उक्त. तत्तार मंडि रन ।
सार-धार उभरिय, श्रेन झंझरिय गगन तन।
लोह हड्ड उडडंन, हंस छुट्टत श्रोर सर।
फिरत रूंड बिन मुंड, दंत बिन सुंड सर।
अदभुत भयावह समर मचिय, रचिय रक्ति काली कहर।
इक लरत गिरत घुमंत घटत, भटकि नह मंडिय बहर।॥
(पृथ्वीराज रासो समय 11, पृष्ठ-529)

बिलोच पहाड़ ने हासी पर चढ़ाई की तो उसकी रक्षा के लिए पृथ्वीराज ने सेना भेजी, जिसमें रामराय और कनकराय दोनों थे। इसी प्रकार संयोगिता का हरण करने के लिए 106 सामंत और केवल 1100 सैनिक साथ लेकर पृथ्वीराज कन्नौज गया । उस समय रामराय, कनकराय, विजयराय और चन्द्रसेन, ये चारों बड़गूजर सामंत उसके साथnथे। ईस्वी 1191 में पृथ्वीराज द्वारा संयोगित का हरण करने पर जयचन्द की सेना ने उसका पीछा किया तो पृथ्वीराज के सामंतों ने जयचन्द की सेना का रास्ता रोक कर घमासान युद्ध किया, जिसमें जयचन्द का सामंत पहाड़राय बडगूजर लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। तीसरे दिन के युद्ध में कनकराय का मुकाबला जयचन्द के धाभाई वीरमराय में वीरमराय ने कनकराय के सिर पर तलवार का वार किया। जिससे घायल हुआ। युद्ध होने पर भी कनकराय ने उसका सिर काट डाला। इस प्रकार कड़ा संघर्ष करके कनकराय ने कननौज की सेना को कई घंटों रोके रखा, जिससे पृथ्वीराज को संयोगिता को लेकर वहाँ से 6 कोस (20 किलोमीटर) आगे निकल जाने का अवसर मिल गया। अन्त में कई घंटे युद्ध करने के बाद कनकराय लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ।

दोहा
सिन्धु जस्ति कमधज्ज दल, विवरी अनी अन लख्ख।
दिय आयस कर उंच करि, कनकराई परतखख |।
(पृथ्वीराज रासो समय 61, पृष्ठ 1870)
बड हथ्थह बडगुज्जरह, जूझिड गरयौ बैकुंठ ।
भीर सघन सामित परत, चख निढढुर अरि दिठ्ठ ।।
(पृथ्वीराज रासो समय 62, पृष्ठ 1904-1905)

ईस्वी सन् 1192 में शाहबुद्दीन गौरी ने एक लाख बीस हजार सैनिकों के साथ भारत पर चढ़ाई की। पृथ्वीराज भी उससे युद्ध करने के लिए 83 हजार सैनिक लेकर दिल्ली से चला। तराइन में दोनों सेनाओं का मुकाबला हुआ। युद्ध के पहले दिन रामराय ने रात्रि में शत्रु पर आक्रमण करने की सलाह दी थी, किन्तु चामुण्डराय और बड़गूजर बलभद्र कछवाहा ने उसकी सलाह नहीं मानने दी और उसे कायर कह कर उसकी हैंसी उड़ाई। युद्धmसाथ रामराय बड़गूजर, चंचराय गहलोत और पंचायतराय आदि सामंत दस हजार सैनिकों के साथ थे। युद्ध में रामराय सांग से शत्रु के हाथियों को मारने लगा। उस समय उसका सांग एक हाथी के शरीर में फस गया, जिसे निकालने का वह प्रयत्न कर रहा था कि उस पर शत्रु सैनिकों की तलवारों के वार हुए और वह टुकड़े-टुकड़े होकर वीरगति को प्राप्त के समय केन्द्र की सेना का नेतृत्व स्वयं पृथ्वीराज चौहान कर रहा था उसके हुआ।
दोहा
मंत मंत के दंत पर, हनी संग वर राम।
कढ्ढै कर उकढै नहीं, वकत्त कहत गए ताम।॥ 1440 ॥
(पृथ्वीराज रासो)

रामराय के बाद उसका पुत्र रणधीर राजौरगढ़ की गद्दी पर बैठा। रणधीर केnबाद राजौर के बड़गूजरों का कहीं भी स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता है। केवल देवती के बड़गूजरों का वर्णन मिलता है। इनके वर्णनों से यह अनुमान होता है कि ईस्वी । 192 से ईस्वी 1259 तक 67 वर्षों की कालावधि में मुसलमानों ने राजस्थान के इस क्षेत्र पर सात बार आक्रमण किए थे। कुतुबद्दीन ऐबक के समय ( ई. 1192) में अजमेर पर और ई. 1194 और 1195 में रणथम्भौर पर आक्रमण हुए। शमसुद्दीन अल्तमस के समय में ई. 1226 में रणथम्भौर और ई. 1230 में बयाना पर आक्रमण हुए। नासीरुद्दीन मोहम्मद के समय में ई. 1247 ई. में रणथम्भौर और ई. 1259 में मेवात पर आक्रमण हुए। इनमें से किसी एक अभियान में मुसलमान सेना ने राजौर के किले और नगर को पूर्णतया नष्ट कर डाला, जिसके आज मीलों तक खण्डहर बिखरे पड़े हैं। राजौर के नष्ट होने पर वहाँ से कुछ मील पूर्व में टहला और राजगढ़ के बीच देवती को बड़गूजरों ने अपनी नई राजधानी के रूप में विकसित किया।

आमेर के कछवाहा राजा राजदेव के पौत्र कल्हणदेव के पुत्र राजा कुन्तलजी का एक विवाह कोलासर तीतरवाड़ा के पूर्णमल बड़गूजर की पुत्री लाडारानी से हुआ था। कुन्तलजी ने देवती में मन्दिर और कुण्ड का निर्माण करवाया । वहीं देवती में तालाब में स्नान करते समय डूबने से कुन्तलजी की मृत्यु हो गई। यह खबर आमेर आने पर महारानी लाडारानी बड़गूजरजी आमेर में अम्बिकेश्वर महादेव के मन्दिर के पास सती हुई। लाडारानी की छतरी आज भी आमेर में मौजूद है। लाडारानी की गिनती बड़े ईश्वर भक्तों में होती है। उक्त समय दिल्ली में मोहम्मद बिन तुगलक का शासन था।

मांचेड़ी (जिला अलवर) की बावड़ी के वि.सं. 1439 (ई. 1382) वैशाख सुदी 6 के शिलालेख के अनुसार दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक के राज्य काल में मांचेड़ी पर बड़गूजर कुल के राजा आसलदेव के पुत्र महाराजाधिराज गोगदेव का शासन था। इस शिलालेख में ही बड़गूजर शब्द प्रयोग में आया है। इसी गोगदेव के समय वि.सं.न1421 और 1426 (ई. 1364 और 1369) के शिलालेख भी मिले हैं । गोगदेव फिरोजशाह तुगलक का सामंत था। मांचेड़ी से ही एक दूसरी बावड़ी में वि. 1515 (ई. 1458) का सुल्तान बहलोलशाह लोदी के समय का शिलालेख खंडित स्थिति में मिला है। इस लेख में बड़गूजर महाराजा रामसिंह के पुत्र महाराजा राजपालदेव का राज्य होना दर्शाया है। राजौर और मांचेड़ी के इन शिलालेखों से यह सिद्ध होता है कि उस प्रदेश पर ई. 960 से 1458 तक बड़गूजर वश का राज्य शासन था।

आमेर के कछवाहा राजा भारमल के समय में देवती के राजा ईसरदास बड़गूजर ने बिलोच की सहायता से ई. 1544 से 1556 के बीच किसी समय आमेर चुहड़खान पर चढ़ाई की, किन्तु कुवर भगवन्तदास से हार कर ईसरदास को वापस हटना पड़ा। भगवन्तदास और ईसरदास दोनों एक-दूसरे के हाथ से घायल हुए। इस युद्ध कछवाहा का पिता उदा वीरगति को प्राप्त हुआ। रामदास दिल्ली के सुल्तान शेरशाह सूरी का मंत्री हेमू डूसर देवती का रहने वाला था। उसके प्रभाव से देवती के राजा ईसरदास का भी पठानों से काफी संपर्क रहा। शेरशाह की मृत्यु के बाद पठान आपस में लड़ने लगे, जिसका लाभ उठाकर बादशाह हुमायूँ ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। जब ई. 1556 में हुमायूँ की मृत्यु हो गई तो हेमू डूसर ने पठानो और राजपूतों को संगठित करके दिल्ली पर चढ़ाई कर दी, तब अकबर केवल 14 वर्ष का था और वह उस समय पंजाब में ईस्वी 1556 के सितम्बर में हेमू 1000 हाथी, 51 तोपें और 500 जुजरबे सहित 50,000 सैनिकों की सेना लेकर बयाना से आगरा होता हुआ दिल्ली की तरफ बढ़ा। अलवर का हाजीखाँ पठान और देवती का राजा ईसरदास बड़गूजर भी उसकी सेना में आकर सम्मिलित हो गए। हेमू डूसर 6 अक्टूबर को तुगलकाबाद पर अधिकार करके 7।अक्टूबर को दिल्ली की तरफ बढ़ा, तो उसका मुकाबला मुगलों से युद्ध हुआ।


युद्ध के समय हेमू की सेना के हरावल का नेतृत्व रायहुसैन जलवानी, दाहिनी तरफ की सेना का नेतृत्व शादीखाँ और बायीं तरफ की सेना का नेतृत्व हाजीखाँ पठान कर रहे थे। हाजीखाँ के साथ मेवात के मेव और देवती का राजा ईसरदास आदि राजपूत थे। केन्द्र में हेमू डूसर स्वयं था। मुगल सेना के हरावल में अब्दुला उजबेग, लालखाँ और क्रिपाखाँ थे दाहिनी तरफ हैदर मुहम्मद, हैदरबरूशी, कासिम माखलिस और अली दोस्त थे। बायीं तरफ इस्कन्दखाँ था। केन्द्र का संचालन तरदीबेग कर रहा था; उसके साथ अफजलखाँ, असरफखाँ और पीर मोहम्मद थे। युद्ध आरम्भ होते ही अब्दुलाखाँ उजबेग और इस्कन्दखाँ ने हेमू की सेना के हरावल और दाहिनी सेना पर बड़े वेग से आक्रमण किया और उसे पलवल तक खदेड़तेनचले गए, जिसमें रायहुूसैन की सेना के 3000 सैनिक मारे गए और 400 हाथी मुगलों के हाथ लगे, किन्तु दूसरी तरफ हाजीखां पठान और ईसरदास बड़गूजर ने 300 हाथी और राजपूत, मेव और पठानों की घुड़सवार सेना के साथ मुगल सेना के केन्द्र पर आक्रमण किया, जिसे मुगल सेना सहन नहीं कर सकी और पीर मोहम्मद और तरदीबेग मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए, जिससे हेमू डूसर का दिल्ली पर अधिकार हो गया।
दिल्ली के युद्ध की हार का समाचार जब पंजाब में बेरामखाँ को मिला तो वह।अकबर को लेकर 20,000 सैनिकों सहित दिल्ली की तरफ बढ़ा। हेमू भी मुगलों से युद्ध करने के लिए अपनी सेना लेकर दिल्ली से चला। इस सेना में 1500 हाथी और 30,000 घुड़सवार थे। नवम्बर ईस्वी 1556 को दोनों सेनाओं का पानीपत में मुकाबला हुआ। हेमू की दाहिनी सेना का नेतृत्व शादीखाँ कांकर और बायीं ओर की सेना का नेतृत्व उसका भानजा रमैया कर रहे थे। हाथी पर सवार होकर केन्द्र का संचालन स्वयं हेमू कर रहा था।
युद्ध के समय जब हेमू की विजय होने ही वाली थी कि ऐन वक्त पर एक तीर हेमू की आँख में लगा, जिससे घायल होकर पीड़ा और दर्द का मारा हेमू हौदे में बैठ गया। इसी समय उसके दो सेनापति शादीखाँ कांकर और भगवानदास वीरगति को प्राप्त हो गए। हेमू को मरा हुआ समझकर उसका भानजा रमैया और भरतीजा महीपाल मैदान छोड़कर दिल्ली की तरफ चल दिए, जिससे हेमू की उस विशाल सेना में भगदड़ मच गई और हेमू पकड़ा जाकर मुगलों द्वारा कल्ल कर दिया गया।


दिल्ली से हेमू के परिवार वाले सारा खजाना और सोना हाथियों पर लादकर अलवर की तरफ भागे। मुगलों द्वारा पीछा करने के कारण घबराहट में कुछ खजाना तो रास्ते में जंगल और खेतों में बिखर गया, शेष बचे हुए को उन्होंने स्वामी -भक्त सेवकों में बांट दिया और वे स्वयं पहाड़ों में अकबर ने हेमू परिवार का पीछा करने हेतु दिल्ली पर अधिकार होने के बाद पीर मोहम्मद, सईदखाँ और हुसैनखाँ को सेना सहित भेजा। मुगल सेना ने पहले तो अलवर पर आक्रमण किया और वहाँ से हाजीखाँ पठान को निकाल कर ई. 1557 की जनवरी में देवती का शासक ईसरदास बड़गूजर जौहर करके बड़ी वीरता से युद्ध करता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। इस जौहर के कारण ईसरदास की बड़ी ख्याति हुई और जन कहावत में
यह प्रचलित हुआ कि ‘दाग न लाग्यो देवती, ईसर गयो निकलंक’। मुगल सेना ने देवती को नष्ट कर डाला और बड़गूजरों के अधिकार से देवती हमेशा के लिए छूट गई। इसके बाद बड़गूजरों ने मांचेड़ी को अपनी राजधानी के रूप में विकसित किया।


आमेर के राजा मानसिंह ने ई. 1597 में बड़गूजरों के विरुद्ध चढ़ाई की ।।बसवा के निकट कछवाहों और बड़गूजरों में युद्ध हुआ, जिसमें कछवाहों की जीत हुई।
राजा मानसिंह ने बडगूजरों से भानगढ़ छीनकर अपने छोटे भाई माधोसिंह को दे दिया ।
वीरनारायण बड़गूजर एक साधारण स्थिति का राजपूत था। वह कृषि और।शिकार से अपने परिवार का जीवनयापन करता था। एक बार दूसरे जानवर के भरोसे मेंनबादशाह अकबर का पालतू चीता मार डाला, जिसके कारण बादशाह के आदमी उसे पकड़कर अकबर के पास ले गए। अकबर ने सारा वृत्तांत सुना और वीरनारायण की बहादुरी और उसके अचूक निशाने को देखकर उसे माफ कर दिया और उसको अपने शिकारियों में नौकर रखकर शाही पालतू शिकारी चीतों की देखभाल पर नियुक्त कर दिया ई. 1629 में वीरनारायण का देहान्त हो गया। वीरनारायण का पुत्र अनोपसिंह बादशाह अकबर के निजी सेवकों में था और अकबर के अन्तिम दिनों में उसके निजी सेवकों का दरोगा नियुक्त हो गया था। ई. 1605 में जहाँगीर के गद्दीनशीन होने पर भी यह उसी पद पर बना रहा। अनोपरसिंह बड़गूजर जहाँगीर और शाहजहाँ के समय में पदोन्नत होता हुआ एक हजार जात छह सौ सवार के मनसब तक पहुँच गया।


बादशाह जहाँगीर ई. 1610 में बाड़ी (जिला धौलपुर) की तरफ चीतों के शिकार के लिए गया था शिकारियों द्वारा जंगली जानवरों का हाका दिए जाने पर एक बड़ा शेर निकल आया। सूर्य अस्त हो गया था, फिर भी बादशाह शेर की इत्तला मिलने पर शिकार करने हेतु चल दिया। बादशाह ने दो बार बन्दूक चलाई, परन्तु निशाना सही नहीं बैठा और शेर क्रोध से बिफर कर बादशाह पर झपटा, जिसके कारण बादशाह के सेवक घबराकर भाग गए और धक्का-मुक्की में बादशाह जमीन पर गिर पड़ा। शाहजादे ने तीर चलाया, परन्तु वह शेर को नहीं लगा। इसी अवसर पर शेर के बादशाह पर झपटने के साथ ही अनोपसिंह बड़गूजर ने शेर के सिर पर लाठी मारी, परन्तु शेर के धक्के से वह भी जमीन पर जा गिरा। अनोपसिंह ने शेर के मुँह में अपना हाथ डाल दिया और गले में दूसरे हाथ की बाँह का घेरा डालकर उसे दबा लिया। इतने में शाहजादे शाहजहाँ तथा रामदास कछवाहा के द्वारा तलवारों से वार करने पर शेर घायल होकर भागा। अनोपसिंह भागते हुए शेर पर पीछे से झपटा और तलवार का वार किया, शेर फिर आक्रमण पर उतारू हुआ, किन्तु अनोपसिंह की तलवार के दूसरे वार से शेर की आँख व मुख कट गया। इतने में अन्य लोगों ने भी वार किए, जिससे शेर धराशायी हो गया। अनोपसिंह की इस बहादुरी से बादशाह जहाँगीर बहुत प्रसन्न हुआ और उसे ‘अनीराय सिंहदलन’ की पदवी से विभूषित कर मनसब दिया और दोआब (गंगा-यमुना के मध्य का भाग) की जागीर दी। वहाँ पर अपने नाम से अनोपसिंह ने अनूपशहर बसाया।


एक बार बादशाह जहाँगीर ने किसी बात पर बिना गलती होते हुए भी अनोपसिंह को बुरा-भला कहा, जिस पर उसे इतनी ग्लानि हुई कि उसने अपने पेट में जमधर मार लिया, किन्तु जहाँगीर ने उसका इलाज करवाया और उसे बचा लिया। इस घटना के बाद वह बादशाह जहाँगीर का विशेष कृपा-पात्र बन गया, जहाँगीर ने इसे कई सैनिक अभियानों में भी भेजा। ई. 1629 में अनोपसिंह के पिता वीरनारायण की मृत्यु होने पर बादशाह शाहजहाँ ने अनोपसिंह को राजा का पद दिया। ई. 1636 में अनोपसिंह का देहान्त हो गया। इस समय उसका मनसब तीन हजारी जात 1500 सवार था।
अनोपसिंह के बाद उसका पुत्र राजा जयराम बड़गूजर अनूपशहर की गरद्दी परनबैठा। इस समय उसका मनसब एक हजारी जात एक हजार सवारों का था। ई. 1639
में राजा जयराम शाहजादे मुराद के साथ काबुल गया। वहाँ से ई. 1645 में वह शाहजादेनके साथ बलख की चढ़ाई पर गया। इस समय उसका मनसब 1500 जात 1500 सवार हो गया। बलख विजय के बाद बह बहादुरखां के साथ नजर मोहम्मद का पीछा करने के लिए नियुक्त हुआ। उजबकों के विरुद्ध युद्ध में उसने अच्छी बहादुरी दिखाई, तो उसका मनसब बढ़ाकर 2000 जात 1500 सवार कर दिया गया। ई. 1647 में बलख में ही जयराम की मृत्यु हो गई।


जयराम की मृत्यु के बाद बादशाह शाहजहाँ ने उसके पुत्र अमरसिंह बड़गूजर को राजा का पद और मनसब दिया। पिता के बाद ई. 1647 में अमरसिंह अनूपशहर की गद्दी पर बैठा।
ईस्वी 1709 में बादशाह बहादुरशाह ने बड़गूजरों का राजौर, देवती और मांचेड़ी का राज्य, जिसका क्षेत्रफल 3000 वर्ग मील था और जिसकी वार्षिक आय बड़गूजर 129 2,35,000 रुपयों की थी, आमेर के महाराजा सवाई जयसिंह को मनसब में दे दिया जो कि मिर्जा राजा जयसिंह के समय से ही आमेर के मनसब में चला आ रहा था। इस प्रक्रिया से मांचेड़ी का राजा रघुनाथसिंह बड़गूजर जयपुर (आमेर) के मातहत हो गया और वह महाराजा सवाई जयसिंह के 22 प्रमुख सामंतों में गिना जाने लगा रघुनाथसिंह के बाद मांचेड़ी की गद्दी पर उसका बड़ा पुत्र उधोतसिंह बैठा । वह भी सवाई जयसिंह के सामंतों में था और उसका विवाह चौमू के ठाकुर मोहनसिंह नाथावत की बहिन से हुआ था।


ई. 1741 में उधोतरसिंह अनूपशहर गया हुआ था। उसके छोटे भाई की अपनी भौजाई-चौमू के नाथावतजी से भोजन संबंधी बात-चीत पर कहा सुनी हो गई| इसी प्रसंगमें जयपुर के शासक सवाई जयसिंहजी पर भाले का वार करने का प्रण लेकर वह दस सवारों के साथ मारचेड़ी से चलकर जयपुर आया और शहर के दरवाजे के पास डेरा डालकर मौके की तलाश में लग गया। काफी दिन व्यतीत होने पर उसके साथी भी सब वापस चले गए और वह खर्ची से भी तंग हो गया। एक रोज उसको अवसर मिल गया जब महाराजा सवाई जयसिंह पालकी में सवार होकर नगर दरवाजे से बाहर आए तो उसने महाराजा पर अपने भाले से वार किया। वार नहीं लगा और महाराजा के अंगरक्षकों ने इस बड़गूजर राजकुमार को गिरफ्तार करके सवाई जयसिंहजी के पास पेश किया। जब महाराजा ने उससे भाला फैंकने का कारण पूछा तो उसने सम्पूर्ण वृत्तात कह सुनाया| इस पर महाराजा ने उसे छोड़कर वापस मार्चड़ी भिजवा दिया। इस घटना की जानकारी जब उसने अपनी भौजाई नाथावतजी को दी तो वह भावी अनिष्ट को समझ गई और उसने अपने पति की अनुपस्थिति में मांचेड़ी की सुरक्षा-व्यवस्था के उपाय किए।


उपर्युक्त घटनाक्रम के एक महीने बाद महाराजा सवाई जयसिंह ने ई. 1741 में बाटका के ठाकुर फतहसिंह बणवीरपोता को 5000 की सेना के साथ बड़गूजरों के विरुद्ध मांचेड़ी पर चढ़ाई करने भेजा। फतहसिंह ने गणगौर के पर्व के रोज अचानक मांचेड़ी पर आक्रमण करके बड़गूजरों को वहाँ से निकाल कर अधिकार कर लिया। इसनसमय उधोतसिंह तो वहाँ था नहीं, जबकि उसका छोटा भाई, जिसने महाराजा पर भाले से मारा गया। इस युद्ध इस घटना के बाद उधोतसिंह तो भरतपुर के राजा सूरजमल के पास चला गया। और उसके अन्य भाई-बन्धु महवा के निकट तालचिडी चले गए। राजा सूरजमल सहायता से उधोतसिंह ने बहरोड के निकट 36 गाँवों सहित तसींग पर अधिकार करके अपने लिए नया राज्य स्थापित किया, किन्तु उधोतरसिंह की मृत्यु के बाद कोटपूतलीनपरगने के 12 गाँव उनके हाथ से निकल गए, केवल 24 गाँव ही उनके अधिकार में रहे। ई. 1782 में अलवर के महाराज बख्तावरसिंह नरूका (कछवाहा) ने तसींग पर चढ़ाई कर दी। उधोतसिंह का पुत्र दौलतसिंह व उसकी सेना अलवर के आक्रमण का सामना अधिक समय तक नहीं कर सके और आत्मसमर्पण कर दिया। मेल-मिलाप के अनुसार 12 गाँव अलवर राज्य के अधिकार में चले गए । बख्तावरसिंह ने इन बड़गूजरों की शक्ति।को कमजोर करने के उद्देश्य से उधोतसिंह के चारों पुत्रों दौलतसिंह, गुमानसिंह, जोधसिंह और सांवतसिंह में बराबर बंटवारा करा कर तसींग में चार पाने बना दिए। इस प्रकार।एक-एक पाने में तीन-तीन गाँव बंट गए। इन गाँवों में बड़गूजरों की संतति है। बड़गूजरों की एक शाखा गुड़गाँव (हरियाणा) पहुँची। जिला गुड़गाँव का भौंड़सी नगर भूपसर बड़गूजर ने बसाया था। भूपसर के भाई रूपसर के पुत्र महद ने महदवार गाँव।बसाया। महद के पुत्र सावनसिंह ने सोहना बसाया । इस तरह हरियाणा के गुड़गाँव जिले के 24 गाँवों में से 12 गाँवों में भौंड़सी वाले और 12 गाँवों में सावनसिंह के वंशज हैं।


बड़गूजरों की सिकरवाल, खडाढ, लोतमिया, तापड़िया और मडाढ़ आदि प्रसिद्ध शाखाएँ राजौर (अलवर जिला) के बड़गूजरों की एक शाखा ने आगरा के निकट सीकरी में अपना राज्य कायम किया, जिससे इस शाखा के बड़गूजर सिकरवाल कहलाए। सीकरी में इनका राज्य बहुत लम्बे समय तक रहा। राजस्थान के धौलपुर, जयपुर, अलवर और दौसा जिलों तथा हरियाणा के गुड़गाँव जिले के अतिरिक्त आगरा, हरदोई, गोरखपुर, गाजीपुर, मोरेना, अजमगढ़, हजारीबाग, पलामू, गया, आरा, शाहबाद, सासाराम, सहरसानआदि जिलों एवं क्षेत्रों में बड़गूजरों की शाखाएँ फैली हुई हैं।

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